15 साल की उम्र में पिता की मौत, घर पर बैंक का केस, मां को कैंसर और फिर खुद चार बार फेशियल पैरालिसिस — अमित खन्ना की संघर्ष से सफलता की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट जैसी लगती है, फर्क सिर्फ इतना है कि यह सच है, एक ऐसी भारतीय उद्यमी की कहानी जो हर मोड़ पर प्रेरणा देती है। द फाउंडर्स ड्रीम के इस बिजनेस पॉडकास्ट हिंदी एपिसोड में होस्ट अभिषेक व्यास के साथ बातचीत में अमित खन्ना — इंटरनेशनल डायरेक्टर, टेडएक्स स्पीकर, ऑथर और एग्जीक्यूटिव लीडरशिप मेंटर — ने अपनी जर्नी, ऑफिस पॉलिटिक्स और AI की वजह से हो रही छंटनी पर बेबाक बात की।
अमित खन्ना की संघर्ष से सफलता की कहानी: 15 साल की उम्र से शुरुआत
अमित मुंबई में पैदा हुए, अपने माता-पिता की इकलौती संतान, और उनके शब्दों में बचपन “बड़े मजे” में बीता। लेकिन 15 साल की उम्र में उनके पिता गुजर गए और तभी पता चला कि घर मॉर्गेज पर था। पुलिस आई और घर खाली करने को कहा गया, जब तक करीब 18-19 लाख रुपये बैंक को न चुका दिए जाएं।
मां एक टिपिकल हाउसवाइफ थीं जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती थी और ज्यादा पढ़ी-लिखी भी नहीं थीं। इसी बीच उन्हें ब्रेस्ट कैंसर हो गया, वह भी लास्ट स्टेज में। अमित ने 15 साल की उम्र में ही काम शुरू कर दिया — बोरीवली के एक रेस्टोरेंट में कैशियर, फिर बार टेंडर, और साथ-साथ दो कॉलेज — सुबह डिग्री कॉलेज और शाम को वर्ली में टेक्सटाइल का कोर्स, क्योंकि परिवार का बैकग्राउंड टेक्सटाइल का था। उन्होंने एक साल फैक्ट्री में लेबरर्स के साथ भी काम किया, 12 घंटे की शिफ्ट में सिर्फ ₹33 रोज की सैलरी पर।
इस दौर को याद करते हुए उन्होंने कहा:
“जब डैड की डेथ हुई… सो वैसे मैंने तीन चार महीने गुजार लिए।”
18 साल की उम्र तक वे अंग्रेजी मीडियम में पढ़ने के बावजूद ठीक से अंग्रेजी नहीं बोल पाते थे, क्योंकि घर और पड़ोस में कोई अंग्रेजी नहीं बोलता था। यह उनकी बाद की इंटरनेशनल करियर को देखते हुए एक दिलचस्प डिटेल है।
एक इंसल्ट जिसने पूरी दिशा बदल दी
टर्निंग पॉइंट एक छोटी सी घटना से आया। फिजिक्स में एवरेज रहे अमित साठे कॉलेज, विले पार्ले में पढ़ते थे। उनकी आंट ने उन्हें ट्यूशन के ₹6000 दिए, लेकिन जब वे पैसे देने एचओडी के पास गए तो उन्हें सबके सामने मराठी में कहा गया कि उनकी कोचिंग क्लास किसी “ऐसे लड़के” पर बर्बाद नहीं होगी।
इस अपमान ने अमित को झकझोर दिया। उन्होंने कोचिंग नहीं ली, खुद पढ़ाई की, और एग्जाम में बैठे 73 बच्चों में से सिर्फ 33 पास हुए — अमित उनमें से एक थे। उनके शब्दों में:
“वह मेरे लिए स्टेपिंग स्टोन था कि अमित यू कैन डू एनीथिंग इन योर लाइफ।”
इस किस्म की सफलता की प्रेरक कहानी में सबसे अहम बात यह है कि सेल्फ बिलीफ सफलता से पहले आया, बाद में नहीं। अगर आप ऐसी ही उद्यमियों और प्रोफेशनल्स की उद्यमियों की कहानियाँ पढ़ना चाहते हैं जहां संघर्ष के बाद टर्निंग पॉइंट आया है, तो यह थीम बार-बार दोहराई जाती है।
फेशियल पैरालिसिस और IT करियर की चुनौतियां
अमित को अब तक चार बार फेशियल पैरालिसिस हो चुका है। दूसरी बार यह तब हुआ जब वे एक फॉरेन बैंक में आईटी साइड पर काम कर रहे थे और क्लाइंट लोकेशन पर जाते थे। उन्होंने बताया कि चेहरे का एक हिस्सा पूरी तरह टेढ़ा हो गया था — ब्रश करते समय पानी गिर जाता, खाना मुश्किल हो जाता, और इलाज के तौर पर इलेक्ट्रिक शॉक्स दिए जाते थे।
उन्होंने साफ कहा कि लोगों की प्रतिक्रिया अलग-अलग थी — कुछ जज करते, कुछ सिंपैथी देते। लेकिन बचपन से सिंपैथी से निपटना उन्हें पहले से आता था, इसलिए उन्होंने इसे अवॉइड किया और तीन-चार महीने में सामान्य स्थिति में लौट आए। यही दौर था जब उन्हें सात देशों में काम करने का मौका मिला और वे आईटी से लीडरशिप मेंटरशिप की तरफ बढ़े।
ऑफिस पॉलिटिक्स: जोकर और रिंग मास्टर
अमित के मुताबिक ऑफिस पॉलिटिक्स को लोग गलत समझते हैं — यह सिर्फ बैकस्टैबिंग या चमचागिरी नहीं है। उन्होंने एक दिलचस्प फ्रेमवर्क दिया: कंपनी में “जोकर” और “रिंग मास्टर” दोनों होते हैं।
- जोकर वो होता है जो बहुत बोलता है, बहुत काम करता है, लेकिन उसे एहसास नहीं होता कि वह सिर्फ एक “एंटरटेनिंग कैरेक्टर” बनकर रह गया है।
- रिंग मास्टर यानी इन्फ्लुएंसर वो होता है जो समझता है कि टीम में कौन इन्फ्लुएंस करता है, कौन ब्लॉक करता है और कौन डिसीजन लेता है।
उनका सुझाव सीधा है — सिर्फ अच्छा काम करना काफी नहीं, यह समझना जरूरी है कि संस्था में प्रभाव किसके पास है और उस व्यक्ति को अपनी बात सही तरीके से पिच करना सीखना जरूरी है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि टीम के भीतर कॉन्फ्लिक्ट होना बुरी बात नहीं, बल्कि जरूरी है:
“जहां पे भी कॉन्फ्लिक्ट आएगा वहां पे ग्रोथ होगा। कॉन्फ्लिक्ट चाहिए।”
लीडरशिप पर उनकी एक और अहम बात थी — टीम के टॉप लीडर की सोच नीचे तक असर डालती है, भले ही सीधे मैनेजर्स वैसे न बनें, लेकिन उनके सब-ऑर्डिनेट्स उसी पैटर्न को अपना लेते हैं।
AI लेऑफ: एंप्लॉई एसेट है या लायबिलिटी?
बातचीत में Oracle के 21,000 एंप्लॉई निकाले जाने का जिक्र आया। अमित ने इसे सिर्फ “AI की वजह से छंटनी” कहकर खारिज नहीं किया, बल्कि इसके पीछे की इन्फ्रास्ट्रक्चर इकोनॉमिक्स समझाई। उनके मुताबिक AI इन्फ्रास्ट्रक्चर में कंपनियां अरबों डॉलर इन्वेस्ट करती हैं, और उस निवेश पर रिटर्न दिखाने के लिए—उदाहरण के तौर पर हर साल करीब 32 मिलियन डॉलर का ROI सुनिश्चित करने के लिए—कहीं न कहीं कॉस्ट कट करनी पड़ती है, और वह कट अक्सर ह्यूमन हेडकाउंट पर आता है।
यहीं पर उन्होंने सबसे प्रोवोकेटिव बात कही, जो हर एंप्लॉई को सुननी चाहिए:
“मेरा कहना यह है कि एंप्लॉई लायबिलिटी है, एसेट नहीं है… एंप्लॉईज को क्या मिलता है? CTC, कॉस्ट टू द कंपनी।”
उनका तर्क है कि असली एसेट शेयरहोल्डर होता है, जो बिना गारंटी के रिस्क लेकर पैसा लगाता है। एंप्लॉई तभी एसेट बनता है जब वह अपनी कॉस्ट से ज्यादा रिटर्न कंपनी को देता है। उनकी सलाह साफ है — अपस्किल करते रहो, सर्टिफिकेशन लो, जो नॉलेज चाहिए हासिल करो, ताकि लायबिलिटी से एसेट बना जा सके। यह सलाह सेल्फ ग्रोथ पर काम करने वालों के लिए खासतौर पर काम की है — इस विषय पर सेल्फ ग्रोथ से जुड़े और लेख भी पढ़े जा सकते हैं।
ईगो, “नो ईगो अमित” और सॉफ्ट स्किल्स पर टेडएक्स टॉक
अमित ने एक दिलचस्प पर्सनल हैक शेयर किया। रयान हॉलिडे की किताब “ईगो इज द एनिमी” पढ़ने के बाद 2017 में उन्हें एहसास हुआ कि वे कहीं-कहीं ईगो में आ जाते हैं। इसे काबू में रखने के लिए उन्होंने “नो ईगो अमित” नाम की एक अलग ईमेल आईडी बना ली, ताकि हर बार कोई मैसेज देखते ही खुद को याद दिला सकें कि शांत रहना है।
उनका TEDx टॉक “Kill the Soft Skills” भी एक पर्सनल फ्रस्ट्रेशन से निकला। हर साल परफॉर्मेंस रिव्यू में उन्हें 4/5 रेटिंग मिलती थी और फीडबैक हमेशा “सॉफ्ट स्किल्स पर काम करो” होता, जिससे उनकी सैलरी इंक्रीमेंट एक-डेढ़ लाख रुपये कम हो जाती। उनका तर्क था कि अगर टोनी रॉबिंस जैसे लोग भी परफेक्ट सॉफ्ट स्किल्स पर 5/5 नहीं पा सकते, तो यह पैमाना ही गलत है।
किताब, करियर और आगे का रास्ता
अमित ने “कॉर्पोरेट सर्कस” नाम की किताब लिखी है, जो ऑफिस पॉलिटिक्स और कॉर्पोरेट लाइफ की सच्चाइयों पर आधारित है। फिलहाल वे फाउंडर बनने के बड़े प्लान के बजाय एक समय में सिर्फ दो-तीन इंडियन क्लाइंट्स को पर्सनल कोचिंग देना पसंद करते हैं, ताकि पूरा अटेंशन दे सकें। रैपिड फायर राउंड में उन्होंने “रिस्पेक्ट”, “कम्युनिकेशन”, “मीनिंगफुल वर्क” और “इम्प्रूव योरसेल्फ” को चुना — जो उनकी पूरी फिलॉसफी का सार हैं।
बातचीत के अंत में उन्होंने एक लाइन कही जो उनकी पूरी जर्नी को समेटती है:
“सब मेरे टूटने का इंतजार कर रहे थे पर उन्हें पता नहीं कि सितारे जब गिरते हैं तो सितारे ही रहते हैं।”
अमित खन्ना की फाउंडर की जर्नी बताती है कि कॉर्पोरेट दुनिया में सिर्फ टेक्निकल स्किल काफी नहीं, कम्युनिकेशन, डिप्लोमेसी और खुद को लगातार वैल्यूएबल बनाना ही असली सर्वाइवल स्किल है।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
अमित खन्ना कौन हैं?
अमित खन्ना इंटरनेशनल डायरेक्टर, टेडएक्स स्पीकर, ऑथर और एग्जीक्यूटिव लीडरशिप मेंटर हैं, जिन्होंने सात देशों में काम किया है और अब डिप्लोमेसी व लीडरशिप स्किल्स सिखाते हैं।
अमित खन्ना ने काम करना कब शुरू किया था?
अमित खन्ना ने 15 साल की उम्र में, पिता की मृत्यु और घर पर आर्थिक संकट आने के बाद बोरीवली के एक रेस्टोरेंट में कैशियर के तौर पर काम करना शुरू किया था।
अमित खन्ना के मुताबिक क्या एंप्लॉई कंपनी के लिए एसेट होते हैं?
अमित खन्ना का कहना है कि एंप्लॉई कंपनी के लिए लायबिलिटी होते हैं, एसेट नहीं, क्योंकि उन्हें CTC यानी कॉस्ट टू कंपनी मिलता है, जबकि असली एसेट शेयरहोल्डर होता है जो रिस्क लेकर कंपनी में पैसा लगाता है।
ऑफिस पॉलिटिक्स को अमित खन्ना कैसे समझाते हैं?
अमित खन्ना के अनुसार ऑफिस पॉलिटिक्स सिर्फ बैकस्टैबिंग या चमचागिरी नहीं है, बल्कि यह समझना है कि किसी टीम में कौन इन्फ्लुएंसर है, कौन ब्लॉक करता है और कौन डिसीजन लेता है।
अमित खन्ना की किताब का नाम क्या है?
अमित खन्ना ने ‘कॉर्पोरेट सर्कस’ नाम की किताब लिखी है, जो ऑफिस पॉलिटिक्स और कॉर्पोरेट जीवन की सच्चाइयों पर आधारित है।


