₹100 करोड़ टर्नओवर वाली कंपनी में एक मजबूत पोजीशन छोड़कर, सिर्फ ₹5-6 करोड़ के ऑर्गेनाइजेशन की तरफ कदम बढ़ाना — यह किसी को भी डरा सकता है। द फाउंडर्स ड्रीम पॉडकास्ट पर होस्ट अभिषेक व्यास के साथ बातचीत में नेहा त्रिवेदी, जो इंडस्ट्रियल ऑटोमेशन कंपनी Alens की फाउंडर हैं, अपनी संघर्ष से सफलता की कहानी खुलकर बताती हैं — पांच साल की उम्र के फैक्ट्री बनाने के सपने से लेकर अडानी और अमूल जैसे क्लाइंट्स के साथ काम करने तक।
पांच साल की उम्र का सपना और करियर पर लगा दांव
नेहा की कहानी किसी MBA क्लासरूम से नहीं, बचपन से शुरू होती है। वह बताती हैं कि पांच साल की उम्र में ही उनके मन में एक बात बिल्कुल साफ थी:
“मुझे भी फैक्ट्री बनानी है।”
यह सपना सालों तक एक कोने में दबा रहा, जब तक उन्होंने एक इलेक्ट्रिकल कंपनी में करीब 13 साल काम नहीं किया। वहीं उन्होंने पैनल बनाना, प्रोजेक्ट मैनेज करना और इंडस्ट्री को अंदर से समझना सीखा। जब कंपनी का टर्नओवर ₹100 करोड़ के आंकड़े पर पहुंचा, उसी साल उन्होंने रिजाइन दे दिया। इस फैसले की कीमत क्या थी, इसे वह बिना झिझक बताती हैं:
“पूरा करियर मैंने दांव पे लगा दिया था टू बी वेरी फ्रैंक, बिकॉज़ 100 सीआर छोड़ के आई एम अगेन गोइंग टू अ फाइव सिक्स सीआर ऑर्गेनाइजेशन… नहीं चला तो आई डोंट नो व्हाट आई वुड हैव डन।”
यह सिर्फ करियर का जोखिम नहीं था। नेहा ने एक व्यक्तिगत स्तर पर भी मुश्किल दौर देखा — उनका डिवोर्स हुआ, लेकिन उन्होंने उसे नकारात्मक रूप से नहीं लिया बल्कि एक सीख की तरह देखा। अमेरिका में वक्त बिताते हुए उन्हें यह एहसास हुआ कि महिला होने की वजह से हर बात पर सफाई देने की जरूरत नहीं — एक सोच जो भारत में उन्हें अक्सर “क्रेज़ी” कहलवाती थी।
फैक्ट्री क्यों बंद होती हैं: सिर्फ डिमांड काफी नहीं
भारत में डिमांड की कमी नहीं है — चाहे वह टेबल बनाने की फैक्ट्री हो, प्लास्टिक कप की या चिप मैन्युफैक्चरिंग की। फिर भी ज्यादातर फैक्ट्रियां एक-दो साल में बंद हो जाती हैं। अभिषेक व्यास के इस सवाल पर कि क्या यह सेल्स की कमी है या ऑपरेशनल गलतियां, नेहा का जवाब सीधा है — असली वजह लीडरशिप और एम्प्लॉई माइंडसेट के बीच का फर्क है।
“फैक्ट्री बंद होने के रीज़न्स है — लीडरशिप टीम जो है, वो एम्प्लॉई काम करने लगे।”
वह इसे एक उदाहरण से समझाती हैं: अगर PLC में कोई प्रॉब्लम आती है, तो एक इंजीनियर सोचेगा कि प्रॉब्लम सुलझाकर उसका काम खत्म। लेकिन एक बिजनेस ओनर यह सोचेगा कि PLC ठीक होने के बाद भी क्या ग्राहक को वह नतीजा मिल रहा है जो उसे चाहिए था। जब तक टीम के भीतर यह सोच “मर्ज” नहीं होती, फैक्ट्री ऑपरेशनल स्तर पर कमजोर बनी रहती है — भले ही बाजार में मांग कितनी भी हो।
इसी वजह से Alens में शुरुआत से ही काम का बंटवारा साफ रखा गया है — सेल्स-मार्केटिंग नेहा देखती हैं, टेक्निकल हिस्सा उनके पार्टनर मौलिक भाई और टीम के बाकी लोग। वह मानती हैं कि अकेले चलने से एक सीमा तक ही पहुंचा जा सकता है, इसलिए पार्टनरशिप में कंपनी चलाना उन्हें बेहतर लगता है — क्योंकि किसी एक इंसान के पास पूरी एक्सपर्टीज़ नहीं होती।
आफ्टर-सेल्स सर्विस: वो USP जो बड़ी कंपनियां नहीं देतीं
Alens की पहचान एक “टर्नकी” मॉडल से बनती है — इलेक्ट्रिकल, इंस्ट्रूमेंटेशन और ऑटोमेशन, सब एक छत के नीचे। नेहा बताती हैं कि बड़ी कंपनियां अक्सर ₹10-15 करोड़ के मिड-साइज़ प्रोजेक्ट्स को छोड़ देती हैं क्योंकि उनका फोकस बड़े प्रोजेक्ट्स पर होता है, जबकि छोटी कंपनियों के पास इतनी क्षमता नहीं होती। नेहा ने इसी गैप को पकड़ा और अपनी टीम को मिड-रेंज प्रोजेक्ट्स के हिसाब से तैयार किया।
क्लाइंट के हिसाब से काम का तरीका भी बदलता है। अडानी के साथ ग्रेन साइलो जैसे प्रोजेक्ट टाइमलाइन-बेस्ड होते हैं, लेकिन अमूल और बनास जैसे कंटीन्यूअस-प्रोसेस प्लांट्स में सर्विस रुकनी नहीं चाहिए। नेहा इसे रोज़मर्रा की जिंदगी से जोड़ते हुए समझाती हैं कि अगर सुबह चाय-कॉफी न मिले तो दिन खराब हो जाता है — ठीक वैसे ही इन प्लांट्स के लिए 24/7 इंजीनियर उपलब्ध रखना जरूरी है, चाहे रात के दो बजे ही क्यों न कॉल आए।
यह दृष्टिकोण महिला उद्यमियों के लिए एक व्यावहारिक सबक भी है कि सर्विस और भरोसा ही लंबी अवधि में प्रोजेक्ट लाते हैं, न कि सिर्फ कीमत। इस विषय पर भारत की अन्य महिला उद्यमियों की यात्रा जानने के लिए PNK Beauty की सफलता की कहानी भी पढ़ी जा सकती है, जो इसी तरह की चुनौतियों से होकर गुजरी हैं।
फाइनेंशियल गलतियां जो हर बिजनेस को टालनी चाहिए
नेहा खुलकर मानती हैं कि शुरुआती दौर में उनकी टीम से एग्रेसिव और इमोशनल फैसले हुए, जो महंगे पड़े।
“हम लोग बहुत एग्रेसिव और इमोशनल डिसीजन ले लेते हैं, जो नहीं लेना चाहिए… एक कस्टमर बोलता है कि भाई मुझे अभी के अभी चाहिए, सब कुछ एयर फ्रेट करवा दो… जो हमने कभी कॉस्टिंग में गिना ही नहीं था।”
इसी तरह इंजीनियरिंग अप्रूवल से पहले प्रोक्योरमेंट शुरू कर देने से भी बजट पर असर पड़ा — कस्टमर ने बाद में मॉडल या केबल बदलने को कहा, और पहले से खरीदा हुआ सामान बेकार हो गया। अब टीम ग्राहक को समय रहते सच्चाई बताती है — अगर प्रोजेक्ट चार हफ्ते की जगह पांच हफ्ते में पूरा होगा, तो यह बात पहले या दूसरे हफ्ते में ही बता दी जाती है, आखिरी वक्त में नहीं। यही पारदर्शिता भरोसे का आधार बनती है।
- इमरजेंसी डिलीवरी के लिए एक्स्ट्रा लॉजिस्टिक्स कॉस्ट पहले से कॉस्टिंग में शामिल करें।
- इंजीनियरिंग अप्रूवल पूरा होने से पहले प्रोक्योरमेंट शुरू न करें।
- डिले की जानकारी ग्राहक को जितनी जल्दी हो सके दें, आखिरी हफ्ते तक न रोकें।
- हर प्रोजेक्ट मुनाफे में नहीं जाता — कभी-कभी वेंडर रजिस्ट्रेशन या एंट्री पाने के लिए घाटे में भी ऑर्डर लेना पड़ता है।
AI, डेटा और भारतीय फैक्ट्रियों का अगला कदम
नेहा के मुताबिक ज्यादातर भारतीय कंपनियां सेमी-ऑटोमेटेड हैं और उनके पास डेटा तो है, लेकिन जब तक उस डेटा को AI के साथ इंटीग्रेट नहीं किया जाता, प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस का असली फायदा नहीं मिलता। मोटर पर लगे टेम्परेचर सेंसर और वाइब्रेशन पैड का उदाहरण देते हुए वह बताती हैं कि सिर्फ रीडिंग मिलने से कंपनी अनुभव के आधार पर अंदाज़ा लगाती है, लेकिन AI के साथ यह साफ पता चलता है कि मोटर अभी नॉर्मल है, एबनॉर्मल है या बदलने की जरूरत है।
वह यह भी साफ करती हैं कि ऑटोमेशन से इंजीनियरों की जरूरत खत्म नहीं होगी, बल्कि सिर्फ दोहराव वाले काम (रिपीटेटिव जॉब्स) कम होंगे — जिस मशीन को ग्लास उठाने जैसा काम करना है वह करेगी, लेकिन मशीन खराब होने पर उसे ठीक करने के लिए इंजीनियर का दिमाग ही चाहिए।
महिला उद्यमियों के लिए संदेश
नेहा की सलाह व्यावहारिक और सीधी है। वह मानती हैं कि दिमाग का एक हिस्सा हमेशा नेगेटिव सोच देता है, और जितना ज्यादा हम किसी फैसले को लेकर सोचते हैं, उतना ही वह डर बढ़ता जाता है।
“हमने लाइफ में यह सुना है कि अगर जो हमको बड़ा बनना है या बहुत आगे जाना है तो किसी के साथ चलो… अकेले वॉक करोगे तो एक लेवल तक ही पहुंच पाओगे।”
यह सलाह सिर्फ उद्यमी बनने की चाह रखने वाली महिलाओं के लिए नहीं, हर उस व्यक्ति के लिए है जो अपने दम पर कुछ शुरू करने की सोच रहा है। अपनी कहानी को आगे लोगों तक पहुंचाने के तरीकों में दिलचस्पी रखने वालों के लिए पॉडकास्ट को मार्केटिंग के लिए इस्तेमाल करने वाले फाउंडर्स की रणनीति भी एक उपयोगी रेफरेंस है।
फैसला चाहे कितना भी बड़ा हो, नेहा के पिता की एक सीख उन्हें हमेशा याद रहती है — फैसला खुद सोच-समझकर लिया है तो आस-पास के लोग क्या सोचेंगे, इसकी चिंता करने की जरूरत नहीं। आज Alens सिर्फ तीन साल की उम्र में फ्लिपकार्ट के वेयरहाउस से लेकर अडानी के ग्रेन साइलो प्रोजेक्ट तक पहुंच चुकी है, और नेहा का अगला लक्ष्य इसे सिर्फ एक इंजीनियरिंग कंपनी नहीं, बल्कि एक ऐसी जगह बनाना है जहां इंजीनियर कुछ नया सीखें और उनकी प्रोडक्टिविटी बढ़े।
होस्ट अभिषेक व्यास के साथ पूरी बातचीत देखिए द फाउंडर्स ड्रीम यूट्यूब चैनल पर, और हर हफ़्ते नए फाउंडर इंटरव्यू के लिए सब्सक्राइब कीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
नेहा त्रिवेदी कौन हैं?
नेहा त्रिवेदी इंडस्ट्रियल ऑटोमेशन कंपनी Alens की फाउंडर हैं, जिन्होंने एक इलेक्ट्रिकल कंपनी में 13 साल काम करने और ₹100 करोड़ टर्नओवर की जिम्मेदारी संभालने के बाद अपनी खुद की टर्नकी इलेक्ट्रिकल, इंस्ट्रूमेंटेशन और ऑटोमेशन कंपनी शुरू की।
Alens कंपनी क्या काम करती है?
Alens टर्नकी प्रोजेक्ट्स करती है जिसमें इलेक्ट्रिकल, इंस्ट्रूमेंटेशन और ऑटोमेशन पैनल बनाना, पूरा शॉप फ्लोर मैन्युफैक्चरिंग और इंजीनियरिंग डिजाइनिंग शामिल है, जैसे Flipkart के वेयरहाउस और अडानी के ग्रेन साइलो प्रोजेक्ट्स।
नेहा त्रिवेदी के अनुसार फैक्ट्रियां क्यों बंद हो जाती हैं?
नेहा के मुताबिक डिमांड होने के बावजूद फैक्ट्रियां लीडरशिप और एम्प्लॉई माइंडसेट के फर्क की वजह से बंद होती हैं — इंजीनियर सिर्फ अपनी समस्या सुलझाकर संतुष्ट हो जाता है जबकि बिजनेस ओनर को ग्राहक के नतीजे तक सोचना पड़ता है।
नेहा त्रिवेदी का बिजनेस किन बड़े क्लाइंट्स के साथ काम करता है?
Alens अडानी, अमूल, बनास डेयरी और AMNS जैसी कंपनियों के साथ काम करती है, जहां अडानी के साथ प्रोजेक्ट-आधारित टाइमलाइन पर और अमूल-बनास जैसे कंटीन्यूअस प्रोसेस प्लांट्स में 24/7 आफ्टर-सेल्स सर्विस पर काम होता है।


