सांस लेना इतना ऑटोमेटिक लगता है कि हम इसके बारे में कभी सोचते ही नहीं। लेकिन The Founder’s Dream — एक बिजनेस पॉडकास्ट हिंदी में — के इस एपिसोड में होस्ट अभिषेक व्यास ने जब रमेश करंदीकर से पूछा कि ब्रह्मविद्या असल में है क्या, तो जवाब सांस, प्राण और सोच के उस विज्ञान तक पहुंचा जिसे ज्यादातर लोग जिंदगी भर छूते तक नहीं। अगर आप जानना चाहते हैं कि Ramesh Karandhikar कौन हैं, तो यह Ramesh Karandhikar इंटरव्यू आपको उनकी पूरी सोच और सफर से रूबरू कराता है। इस लेख में हम यह भी जानेंगे कि Brahmavidya Sadhak Sangh की शुरुआत कैसे हुई, यह ज्ञान भारत से तिबेट होते हुए वापस भारत कैसे लौटा, और रोजमर्रा की जिंदगी में यह किस काम आता है।
ब्रह्मविद्या क्या है — ब्रह्मांड का एक तयशुदा ऑर्डर
रमेश करंदीकर ब्रह्मविद्या को किसी धर्म से नहीं जोड़ते। उनके शब्दों में ब्रह्मा वह शक्ति है जो पूरे ब्रह्मांड को नियंत्रित करती है, चाहे आप भगवान में विश्वास रखें या न रखें। उनका तर्क है कि ग्रह-तारों, वनस्पति और प्राणियों की दुनिया में एक स्पष्ट ऑर्डर है, और वैज्ञानिक नियम उसी ऑर्डर पर आधारित हैं।
उनके मुताबिक इंसान ही एकमात्र प्राणी है जहां यह ऑर्डर टूटता हुआ दिखता है, क्योंकि हमें बुद्धि और आजादी दोनों मिली है। बाकी सारी सृष्टि — पेड़-पौधे, जानवर — अपने आप उस ऑर्डर से जुड़े रहते हैं, लेकिन इंसान को खुद यह चुनना पड़ता है कि वह जुड़े या नहीं।
सांस और अस्तित्व का रिश्ता — प्राण ऊर्जा की असली ताकत
रमेश करंदीकर के मुताबिक जन्म के साथ सांस शुरू होती है और सांस खत्म होते ही जिंदगी खत्म हो जाती है, फिर भी ज्यादातर लोगों को सांस के बारे में कुछ पता नहीं होता। वे बताते हैं कि सांस में सिर्फ ऑक्सीजन नहीं, बल्कि एक कॉस्मिक एनर्जी भी आती है जिसे प्राण कहा जाता है, और यही शरीर का तापमान व संतुलन बनाए रखती है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 20-30 साल की उम्र के बाद ज्यादातर लोग अपने फेफड़ों की क्षमता का सिर्फ 10% इस्तेमाल करते हैं। यानी ऑक्सीजन और प्राण दोनों का इनटेक बहुत कम रह जाता है, जिसका सीधा असर एनर्जी लेवल पर पड़ता है।
“वर्किंग आउट इन जिम डजंट गिव यू द गारंटी ऑफ हेल्थ। बट इफ यू वर्क आउट विद ब्रह्मविद्या आई एसोर यू द 100% हेल्थ।”
उनका कहना है कि दिन में सिर्फ दो मिनट डीप ब्रीदिंग करने से भी तुरंत रिचार्ज महसूस होता है, क्योंकि हमारे पास इतनी ताकत है जिसका हम इस्तेमाल ही नहीं करते।
प्राण वायु और प्राण शक्ति में फर्क
- प्राण वायु यानी ऑक्सीजन खून के जरिए हर अंग और सेल तक पहुंचती है।
- प्राण शक्ति नर्वस सिस्टम के जरिए सीधे हर सेल तक पहुंचती है।
- डीप ब्रीदिंग से दोनों का इनटेक बढ़ता है और हर सेल एक्टिवेट होता है।
विचार आपकी सेहत और मेटाबॉलिज्म को कैसे बदलते हैं
रमेश करंदीकर एक बहुत सरल उदाहरण देते हैं। हर बच्चे को बारिश में भीगना अच्छा लगता है, लेकिन पेरेंट्स डर के मारे मना कर देते हैं कि बीमार हो जाओगे। असल में यह कोई नियम नहीं है, लेकिन बचपन से यह इनपुट दिमाग में इतनी गहराई से बैठ जाता है कि पूरा सिस्टम उसी हिसाब से काम करने लगता है।
“इलनेसेस टेंशन आर क्रिएटेड बाय मी, नॉट बाय द गॉड।”
वे कहते हैं कि अगर सुबह उठकर आप खुद को बीमार या उदास मान लें तो पूरा मेटाबॉलिज्म उसी सोच पर काम करने लगता है, और अगर आप खुद को स्वस्थ और खुश मानें तो सिस्टम वैसे ही काम करता है। इसी संदर्भ में एक बात याद दिलाई गई कि मृत्यु के अलावा बाकी सारी हार मानसिक होती है।
“मृत्यु के अलावा सारी हार मानसिक है। इवन मृत्यु भी मानसिक है… 60 नजदीक आता है तो मैं तैयारी कर देता हूं।”
यह बात उम्र और मौत को लेकर बने पारिवारिक और सामाजिक “प्रोग्रामिंग” की तरफ इशारा करती है — जो हमने खुद स्वीकार कर रखी है, जबकि उसे बदला जा सकता है।
यूथ में स्ट्रेस क्यों बढ़ रहा है और इसका हल क्या है
आज के दौर की सबसे बड़ी समस्या पर रमेश करंदीकर बेबाकी से बात करते हैं। उनके मुताबिक युवा इतना ज्यादा स्ट्रेस ढो रहे हैं कि अक्सर उन्हें खुद पता नहीं होता कि वे स्ट्रेस में हैं।
“यूथ आर कैरिंग सो मच स्ट्रेस। एंड मेनी टाइम्स वी डोंट नो दैट आई एम कैरिंग द स्ट्रेस। ये सबसे बड़ी दिक्कत है। इट इज अ साइलेंट किलर।”
वे 40 और 50 की उम्र में बड़े एग्जीक्यूटिव्स के अचानक कोलैप्स होकर गुजर जाने की खबरों का जिक्र करते हैं और कहते हैं कि यह किसी की किस्मत में लिखा नहीं है, इसे बदला जा सकता है। सबसे बड़ी वजह वे तुलना को बताते हैं — दूसरों की प्लेट देखने की आदत।
“भला उसकी कमीज मेरे कमीज़ से सफेद क्यों? आई एम ऑलवेज लुकिंग एट अदर्स प्लेट, रादर देन लुकिंग एट माय प्लेट।”
उनका कहना है कि 90% बीमारियां साइकोसोमेटिक यानी मानसिक जड़ों वाली होती हैं, और अगर 8 घंटे की चैन की नींद मिल जाए तो इंसान को सच में खुश माना जा सकता है — जबकि आज ज्यादातर लोग स्लीप डिसऑर्डर से जूझ रहे हैं।
Brahmavidya Sadhak Sangh की शुरुआत कैसे हुई — नालंदा से महाराष्ट्र तक का सफर
यह जानना दिलचस्प है कि Brahmavidya Sadhak Sangh की शुरुआत कैसे हुई, क्योंकि इसकी जड़ें करीब 1200 साल पुरानी हैं। रमेश करंदीकर बताते हैं कि यह पूरा ज्ञान मूल रूप से भारतीय है और नालंदा विश्वविद्यालय में गुरु-शिष्य परंपरा से सिखाया जाता था। जब विदेशी आक्रमणों का खतरा बढ़ा, तो यह ज्ञान तिबेट ले जाया गया, जहां यह परंपरा आगे बढ़ती रही।
पिछली सदी में इंग्लैंड में जन्मे एडविन जॉन डिंगल किसी अनजान वजह से सिंगापुर, फिर भारत और आखिर में तिबेट पहुंचे, जहां उन्हें गुरु मिले। उन्होंने अपनी किताब में लिखा है कि यह यात्रा उन्होंने खुद नहीं चुनी थी।
“आई वाज़ नेवर वांटेड टू गो बट आई वाज़ फोर्स टू गो। देयर आई लर्न हाउ मैन कैन बिकम द मास्टर ऑफ ही ओन लाइफ।”
तिबेट में उन्हें डिंगलेमी नाम दिया गया, और वापस लौटकर उन्होंने कैलिफोर्निया के यूका वैली में इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल फिजिक्स की स्थापना की, जहां उन्होंने दुनिया भर के करीब 26,000 लोगों को यह ज्ञान सिखाया। भारत में इसे के एस रामनाथन, जिन्हें गुरु ज्योतिर्मयानंद कहा जाता है, लेकर आए — उन्होंने 30 साल तक डिंगलेमी से पत्राचार के जरिए यह सीखा। इसके बाद रमेश करंदीकर के गुरु जैन देवेकर जी, जो खुद IIT से पढ़े थे और बिड़ला ग्रुप जैसे बड़े बिजनेस हाउस में काम कर चुके थे, 30 साल की उम्र में इस खोज में जुड़े और उन्होंने पूरा साहित्य मराठी में अनुवाद किया। यही वजह है कि आज यह कोर्स मराठी, हिंदी, गुजराती और अंग्रेजी — चार भाषाओं में सिखाया जाता है।
रोजमर्रा की जिंदगी में ब्रह्मविद्या कैसे अपनाएं
ब्रह्मविद्या का बेसिक कोर्स छह महीने का होता है, हफ्ते में एक दिन डेढ़ घंटे की क्लास के साथ। इसके अलावा रोज करीब 20 मिनट ब्रीदिंग एक्सरसाइज और 20 मिनट मेडिटेशन जरूरी होता है। जिनके पास इतना समय नहीं है, उनके लिए आरोहण आश्रम में छह दिन का रेजिडेंशियल कोर्स भी उपलब्ध है।
- यह कोई योगासन नहीं है — मुख्य फोकस सांस और पूरे शरीर की गतिविधि पर है।
- सांस और प्राण शक्ति फ्री हैं, लेकिन इनका सही इस्तेमाल करना एक आदत बनानी पड़ती है।
- 8 साल से ऊपर कोई भी सीख सकता है — रमेश करंदीकर के पास 90 साल तक के छात्र हैं।
- नॉनवेज खाने वालों को भी आत्म-साक्षात्कार हो सकता है, यह कोई बंधन नहीं है।
“जो चीजें फ्री है, आपको वही सबसे महंगी है। सबसे महंगी है, वी डोंट रियलाइज दैट। और रियलाइज जब करते हैं तब समझ आ जाता है।”
रमेश करंदीकर साफ कहते हैं कि यह कोई मेडिसिन नहीं बल्कि एक जीवनशैली है, जिससे इंसान धीरे-धीरे सृष्टिकर्ता और ब्रह्मांड से जुड़ना सीखता है। ब्रह्मविद्या सिखाने वाले किसी टीचर को कोई पारिश्रमिक नहीं मिलता — यह ब्रह्मविद्या सादर चैरिटेबल ट्रस्ट के तहत चलता है, और हर टीचर ने पहले खुद इसका फायदा अनुभव किया है, इसीलिए वह इसे आगे बांटता है।
यह बातचीत सिर्फ स्पिरिचुअलिटी की बात नहीं करती, बल्कि यह भी दिखाती है कि कैसे एक फोकस्ड, नीश आइडिया — चाहे वह बिजनेस हो या ज्ञान की परंपरा — पीढ़ियों तक टिक सकता है। यह एपिसोड एक मोटिवेशनल पॉडकास्ट अनुभव भी है, जो सुनने वाले को अपनी सोच और आदतें बदलने के लिए प्रेरित करता है। अगर आपको ऐसे फोकस्ड और नीश कंटेंट के आइडिया पसंद आते हैं, तो यह सोचने लायक है कि गहराई हमेशा चौड़ाई से ज्यादा टिकाऊ होती है। ऐसे ही अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों की बातचीत के लिए आप The Founder’s Dream के बाकी गेस्ट्स की लिस्ट भी देख सकते हैं।
होस्ट अभिषेक व्यास के साथ पूरी बातचीत देखिए द फाउंडर्स ड्रीम यूट्यूब चैनल पर, और हर हफ़्ते नए फाउंडर इंटरव्यू के लिए सब्सक्राइब कीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
ब्रह्मविद्या क्या है?
ब्रह्मविद्या वह ज्ञान है जो बताता है कि ब्रह्मांड की हर चीज एक दूसरे से और सृष्टिकर्ता से जुड़ी हुई है, और यह जुड़ाव सांस, प्राण ऊर्जा और विचारों के जरिए समझा जा सकता है।
Brahmavidya Sadhak Sangh की शुरुआत कैसे हुई?
यह ज्ञान नालंदा विश्वविद्यालय से तिबेट पहुंचा, वहां एडविन जॉन डिंगल (गुरु डिंगलेमी) ने इसे सीखा और कैलिफोर्निया में पढ़ाना शुरू किया, फिर के एस रामनाथन (गुरु ज्योतिर्मयानंद) और जैन देवेकर जी के जरिए यह भारत आया, जहां रमेश करंदीकर अब इसे सिखाते हैं।
ब्रह्मविद्या का कोर्स सीखने में कितना समय लगता है?
बेसिक कोर्स छह महीने का होता है, हफ्ते में एक दिन डेढ़ घंटे की क्लास के साथ, और रोज करीब 20 मिनट ब्रीदिंग एक्सरसाइज व 20 मिनट मेडिटेशन का अभ्यास जरूरी होता है।
क्या ब्रह्मविद्या सीखने के लिए नॉनवेज छोड़ना जरूरी है?
नहीं, रमेश करंदीकर के अनुसार यह तथ्य नहीं है कि स्पिरिचुअलिटी और नॉनवेज साथ नहीं चल सकते, आत्मा की शांति के हिसाब से जो अच्छा लगे वही करना चाहिए।
ब्रह्मविद्या यूथ के स्ट्रेस में कैसे मदद कर सकती है?
रमेश करंदीकर कहते हैं कि युवा बहुत ज्यादा स्ट्रेस ढो रहे हैं और अक्सर उन्हें पता भी नहीं होता, ब्रह्मविद्या सांस और विचारों पर काम करके व्यक्ति को अपने जीवन का मास्टर बनने की ठोस प्रक्रिया सिखाती है।


