Prabhakar Mishra on The Founder's Dream podcast

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The Founder’s Dream (TFD podcast) पर होस्ट अभिषेक व्यास ने इस बार एक अलग विषय पर बातचीत की — क्यों जिंदगी में एक ही तरह की समस्याएं बार-बार लौटती हैं। इस Prabhakar Mishra इंटरव्यू में लाइफ कोच और पैटर्न हीलिंग एक्सपर्ट प्रभाकर मिश्रा ने बताया कि रिश्ते, पैसा, करियर और सेहत से जुड़ी ज्यादातर परेशानियों की जड़ बचपन में बन चुके पैटर्न और मेमोरीज़ होती हैं। बातचीत होपोनोपोनो नाम की एक हवाई हीलिंग तकनीक से शुरू होकर इनर चाइल्ड हीलिंग, मनी माइंडसेट और लॉ ऑफ अट्रैक्शन तक जाती है।

Prabhakar Mishra इंटरव्यू में होपोनोपोनो क्या है और यह कैसे काम करता है

प्रभाकर मिश्रा ने होपोनोपोनो की कहानी 1986 के हवाई द्वीप के एक मेंटल असाइलम हॉस्पिटल से शुरू की, जहां दुनिया भर के “क्रिमिनल पागल” घोषित मरीजों को भेजा जाता था। डॉक्टर ह्यूलिन नाम के एक साइकोलॉजिस्ट ने वहां मरीजों से मिलने के बजाय उनकी फाइलें पढ़ीं और अपने मन में उठने वाले भावों को चार वाक्यों से साफ करना शुरू किया — आई एम सॉरी, प्लीज फॉरगिव मी, थैंक यू, आई लव यू।

नतीजा यह हुआ कि छह महीने के भीतर उग्र मरीज सामान्य होने लगे, दवाइयां लेने लगे और स्टाफ का डर कम हुआ। चार साल के भीतर सभी मरीज अपने घर भेज दिए गए और पांच साल में वह हॉस्पिटल बंद हो गया। प्रभाकर इसका सार एक लाइन में समझाते हैं:

जितनी देर कोई भी मेमोरी हमारे अंदर रहेगी वो हमको ही नुकसान पहुंचाएगी।

यानी होपोनोपोनो कोई जादू नहीं, बल्कि मन में जमा नेगेटिव भावों को लगातार “क्लीन” करने की एक प्रक्रिया है।

बचपन के अनुभव कैसे बनाते हैं जीवन भर के पैटर्न

प्रभाकर के मुताबिक पैटर्न बनने की उम्र तय है — जब बच्चे का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स डेवलप होने लगता है, यानी लगभग 8 से 10 साल की उम्र, तभी से लॉजिकल रीजनिंग और जजमेंट बनना शुरू होता है। इस उम्र में बच्चे की हर बात को टोकना, उसकी ड्राइंग को “बकवास” कह देना, उसके छोटे-छोटे फैसलों पर सवाल उठाना — यह सब आगे चलकर बड़े पैटर्न में बदल जाता है।

उदाहरण के लिए, बच्चा अपनी क्रिएटिविटी की सराहना चाहता है और अगर उसे डांट मिलती है, तो वह सीख लेता है कि जब तक चीज परफेक्ट न हो, दिखाना ही नहीं है। यही आदत 28 साल की उम्र में परफेक्शनिज्म और फेलियर के डर के रूप में सामने आती है — वीडियो अपलोड न करना, बिजनेस शुरू न करना, प्रोजेक्ट को कभी “रेडी” न मानना।

  • बच्चे के छोटे-छोटे फैसलों पर बार-बार सवाल उठाने से परफेक्शनिज्म का पैटर्न बनता है
  • घर में पैसों को लेकर बहस देखने से बड़े होकर अमीर बनने का डर बनता है
  • भाई-बहन के बीच तुलना से रिजेक्शन और असुरक्षा का पैटर्न बनता है

रिश्तों में बार-बार वही पैटर्न क्यों लौटता है

प्रभाकर ने एक केस साझा किया जिसमें एक महिला हर नए रिलेशनशिप में एक जैसा ही व्यक्ति आकर्षित कर लेती थीं — नाम और शरीर बदल जाता, सोच और बिहेवियर वही रहता। जांच करने पर पता चला कि 13 साल की उम्र में उनकी मां का तलाक हुआ था और नए पार्टनर का व्यवहार भी वैसा ही था। इस अनुभव ने दिमाग में एक छाप छोड़ी और वह बार-बार सोचती रहीं “मुझे ऐसा हस्बैंड नहीं चाहिए।”

यहीं लॉ ऑफ अट्रैक्शन का मूल सिद्धांत सामने आता है, जिसे प्रभाकर इस तरह बताते हैं:

यू डोंट अट्रैक्ट व्हाट यू वांट। यू अट्रैक्ट व्हाट यू आर।

इनर चाइल्ड हीलिंग के जरिए मां से जुड़ी पुरानी मेमोरीज़ की फीलिंग्स को डाइल्यूट करने के बाद, महिला को पहली बार यह साफ हुआ कि उन्हें असल में कैसा पार्टनर चाहिए — रिस्पेक्टफुल, केयरिंग और नॉन-जजमेंटल। तीन महीने के कोर्स के बाद उन्होंने वही गुण अपने अंदर भी अपनाना शुरू किया और कुछ महीनों बाद उनकी शादी उसी तरह के व्यक्ति से हुई।

पैसों को लेकर सोच बचपन में ही बन जाती है

प्रभाकर बताते हैं कि पैटर्न सबसे ज्यादा असर पैसों और रिश्तों पर डालते हैं। बचपन में अगर बच्चे ने देखा कि फीस भरने पर घर में झगड़ा होता है, या पड़ोसी की नई गाड़ी को लेकर “दो नंबर का पैसा” जैसी बातें होती हैं, तो बड़े होकर वह अमीर बनना तो चाहता है लेकिन अंदर से डरता है कि पैसा उसे “बिगाड़” देगा या लोग उसे लालची कहेंगे।

इसी डर को समझाते हुए वह कहते हैं:

इंसान के पास पैसों की कमी नहीं है। इंसान के पास विल की कमी है। हमें उस विल को बदलना है।

यही वजह है कि कोई व्यक्ति BMW चाहता तो है, लेकिन जिस ग्रुप में बैठकर वह BMW की सर्विसिंग और खर्चों की बातें सुनता है, वही नर्वस सिस्टम को “सेफ” रहने के लिए डरा देता है — और शरीर खुद ही उस चाहत को रिपेल करने लगता है।

पैटर्न कैसे टूटता है — मेडिटेशन, वाइब्रेशन और असली केस

प्रभाकर के मुताबिक पैटर्न सिर्फ लॉजिक से नहीं टूटता, क्योंकि सामने बैठा व्यक्ति सोच-समझकर जवाब देना शुरू कर देता है। इसीलिए वे मेडिटेशन के जरिए प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स को शांत कर सबकॉन्शियस माइंड से सीधे बात करते हैं। उन्होंने एक 28 साल के युवक का केस बताया जिसे एक आदत छोड़ने में पूरा एक साल लगा, बीच में दो-तीन महीने कोई रिस्पॉन्स भी नहीं मिला, लेकिन आखिर में सफलता मिली और 2025 में उसकी शादी भी हुई।

शब्दों की वाइब्रेशन पर बात करते हुए उन्होंने डॉक्टर मसारो इमोतो के वाटर एक्सपेरिमेंट का हवाला दिया — गंदे पानी को प्यार भरे शब्द बोलने पर उसके क्रिस्टल सुंदर आकार में बने, जबकि साफ पानी को नफरत के शब्द बोलने पर उसके क्रिस्टल बदरंग हो गए। इसी सिद्धांत पर उन्होंने सिगरेट और गुटखे जैसी लत के केस भी संभाले, जहां जड़ में अकेलेपन की भावना निकली, न कि सेहत की चिंता।

पैटर्न को स्वीकार करने के तरीके पर वे साफ कहते हैं:

यू टेक द कंप्लीट फुल रिस्पांसिबिलिटी ऑफ़ द सिचुएशन।

यही सोच रमेश करंधीकर के इंटरव्यू में ब्रह्म विद्या पर हुई बातचीत से भी मिलती है, जहां आत्म-जिम्मेदारी और भीतर की समझ को बदलाव की पहली शर्त बताया गया था।

लॉ ऑफ अट्रैक्शन: सिर्फ मांगने से कुछ नहीं मिलता

प्रभाकर के मुताबिक लॉ ऑफ अट्रैक्शन एक असली नियम है, जैसे गुरुत्वाकर्षण या सूर्य का पूर्व से निकलना, लेकिन ज्यादातर लोग इसे बिना प्रोसेस के इस्तेमाल करते हैं। उनके तीन कदम हैं — पहला, क्या चाहिए इसकी पूरी क्लेरिटी; दूसरा, उससे जुड़े पुराने पैटर्न और डर को क्लीन करना; और तीसरा, उसी दिशा में सही एक्शन लेना, जिसे वे “अलाइंड एक्शन” कहते हैं।

उनका मानना है कि सिर्फ 369 टेक्निक, वॉटर टेक्निक या जर्नलिंग से कुछ नहीं बदलता जब तक भीतर का पैटर्न वही रहता है। इसी वजह से वे करियर और रिलेशनशिप के केसों में पहले ब्लॉक ढूंढते हैं, फिर उसे होपोनोपोनो और पॉजिटिव सेल्फ-टॉक से क्लियर करते हैं, तभी नया एक्शन असर दिखाता है। इस विषय पर गहराई से समझने के लिए द फाउंडर्स ड्रीम के बाकी गेस्ट्स के इंटरव्यू भी सुने जा सकते हैं, जहां मनी माइंडसेट और सेल्फ-अवेयरनेस जैसे विषयों पर अलग-अलग नजरिए मिलते हैं।

होस्ट अभिषेक व्यास के साथ पूरी बातचीत देखिए द फाउंडर्स ड्रीम यूट्यूब चैनल पर, और हर हफ़्ते नए फाउंडर इंटरव्यू के लिए सब्सक्राइब कीजिए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

होपोनोपोनो क्या है?

होपोनोपोनो एक हवाई प्रेयर तकनीक है जिसमें ‘आई एम सॉरी, प्लीज फॉरगिव मी, थैंक यू, आई लव यू’ चार वाक्यों को बोलकर मन में जमा नेगेटिव मेमोरीज़ और भावों को साफ किया जाता है।

बचपन में पैटर्न किस उम्र में बनते हैं?

प्रभाकर मिश्रा के अनुसार जब बच्चे का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स डेवलप होने लगता है, यानी लगभग 8 से 10 साल की उम्र में, तभी से सोचने और जजमेंट करने के पैटर्न बनना शुरू हो जाते हैं।

इनर चाइल्ड हीलिंग कैसे काम करती है?

इनर चाइल्ड हीलिंग में बचपन की उस मेमोरी में वापस जाकर छोटे बच्चे को भावनात्मक सपोर्ट दिया जाता है, जिससे उससे जुड़ी नेगेटिव फीलिंग डाइल्यूट होकर आज के व्यक्ति के परसेप्शन और व्यवहार को बदल देती है।

लॉ ऑफ अट्रैक्शन असल में कैसे काम करता है?

प्रभाकर मिश्रा बताते हैं कि लॉ ऑफ अट्रैक्शन में सिर्फ विजुअलाइजेशन या जर्नलिंग काफी नहीं है, इसके लिए क्लेरिटी, पुराने पैटर्न को क्लीन करना और फिर उसी दिशा में सही एक्शन लेना जरूरी है।

पैसों को लेकर डर वाला पैटर्न कैसे बनता है?

बचपन में पैसों को लेकर घर में होने वाली बातचीत, जैसे फीस पर झगड़े या अमीर लोगों को लेकर की गई नकारात्मक टिप्पणियां, बड़े होकर पैसा कमाने के डर और अमीर बनने से जुड़े गिल्ट का पैटर्न बना देती हैं।

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About the Host

Abhishek Vyas, creator of The Founder’s Dream, India’s top Hindi business podcast, delivers powerful storytelling and viral conversations with leading founders and creators. His show helps guests share authentic journeys, expand their brands, and connect with millions of engaged listeners.

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