क्या रोज़ ट्रैफिक में घंटों फंसी एक बड़ी कार से बेहतर कोई और तरीका हो सकता है दफ्तर पहुंचने का? द फाउंडर्स ड्रीम के इस एपिसोड में होस्ट अभिषेक व्यास ने इलेक्ट्रिक मोबिलिटी उद्यमी डीपक कार्तिकेयन से यही सवाल पूछा। डीपक इलेक्ट्रिक बाइसिकल और माइक्रोमोबिलिटी प्रोडक्ट्स के लिए एक ओम्नीचैनल रिटेल प्लेटफॉर्म बना रहे हैं, और उनकी बातचीत एक ऐसा इलेक्ट्रिक साइकिल बिजनेस आइडिया सामने रखती है जो सिर्फ ट्रेंड नहीं बल्कि लंबे समय की सोच पर टिका है।
इलेक्ट्रिक साइकिल बिजनेस आइडिया कैसे बना डीपक का मिशन
डीपक इंजीनियरिंग के बाद Infosys में जॉब कर रहे थे, लेकिन उनके मन में हमेशा एक सवाल था — कौन सी इंडस्ट्री अगले 20-30 साल में बड़ी बनने वाली है। करीब 7-8 साल की खोज के बाद उन्होंने इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और रिन्यूएबल एनर्जी को चुना।
शुरुआत में उन्होंने वाहन बनाने की सोची, लेकिन कॉस्टिंग करने पर पता चला कि सिर्फ शुरू करने के लिए ही 5 से 10 करोड़ रुपये चाहिए, और स्केल करना उससे भी ज़्यादा मुश्किल काम है। इसलिए उन्होंने सबसे सरल फॉर्म से शुरुआत की — साइकिल को इलेक्ट्रिक बनाना।
डीपक का मानना है कि इलेक्ट्रिक बाइसिकल सिर्फ एक अस्थायी ट्रेंड नहीं है:
इलेक्ट्रिक बाइसिकल कोई ट्रेंड नहीं है, यह हर किसी के लिए एक ज़रूरी चीज़ बनने वाली है। जब दो चीज़ें बिल्कुल एक जैसा काम करती हैं और एक में ज़्यादा वैल्यू मिलती है, तो लोग अपने आप उसी तरफ शिफ्ट हो जाते हैं।
उनका तर्क है कि इलेक्ट्रिक बाइसिकल में जैसे-जैसे बड़ा मोटर और बैटरी जुड़ेगी, यह धीरे-धीरे मोटरसाइकिल की जगह ले सकती है, क्योंकि फ्रेम थोड़ा बदलने भर से यह वही काम कर देती है, कम लागत में।
ओम्नीचैनल रिटेल मॉडल — मैन्युफैक्चरिंग से पहले डिस्ट्रिब्यूशन
जो लोग यह जानना चाहते हैं कि स्टार्टअप कैसे शुरू करें, उनके लिए डीपक का यह मॉडल एक अच्छा उदाहरण है — उनका बिजनेस मॉडल मैन्युफैक्चरिंग नहीं, बल्कि रिटेल और डिस्ट्रिब्यूशन पर टिका है। वे ऑनलाइन स्टोर और ऑफलाइन स्टोर दोनों चलाते हैं, और करीब 10 अलग-अलग ब्रांड्स के साथ टाई-अप करके उनके प्रोडक्ट्स बेचते और ऑफर करते हैं।
यह मल्टी-ब्रांड अप्रोच एक सोची-समझी रणनीति है। डीपक बताते हैं कि जब उन्होंने 2021 में शुरुआत की थी, तब जिन 4-5 ब्रांड्स के साथ वे जुड़े थे, वे आज मार्केट में नहीं बचे या संघर्ष कर रहे हैं — क्योंकि प्रोडक्ट बनाना और उसे बेचना, दोनों अलग-अलग मुश्किल काम हैं। एक ही कंपनी के लिए दोनों साथ करना बहुत कठिन हो जाता है, इसलिए उन्होंने सिर्फ बिक्री के इंफ्रास्ट्रक्चर पर फोकस करने का फैसला किया ताकि एक ब्रांड के बंद होने पर भी बाकी ब्रांड्स से ग्राहकों की ज़रूरत पूरी होती रहे।
अभी उनका एक स्टोर बेंगलुरु में है, लेकिन लक्ष्य पूरे शहर को कवर करने के लिए करीब 10 स्टोर खोलने का है, और आगे चलकर देशभर में 1,000 स्टोर तक पहुंचने का विज़न है।
किन ग्राहकों ने अपनाया यह इलेक्ट्रिक साइकिल बिजनेस आइडिया
शुरुआती सालों में सबसे बड़ी दिक्कत अवेयरनेस की थी — लोग जानते भी थे तो ट्रैफिक और सुरक्षा को लेकर झिझकते थे। लेकिन दो साफ ग्राहक सेगमेंट उभरकर सामने आए।
- स्कूल जाने वाले बच्चों के माता-पिता, जो हर दिन बस फीस के 40-50 हज़ार रुपये देने के बजाय 35 हज़ार की इलेक्ट्रिक साइकिल में निवेश करना पसंद कर रहे हैं।
- IT प्रोफेशनल्स, जो ट्रैफिक से बचने के साथ-साथ रोज़ की एक्सरसाइज़ भी इसी सवारी में पूरी कर लेते हैं।
इसीलिए सिर्फ ऑनलाइन बिजनेस आइडिया के तौर पर इसे देखना गलत होगा — दिलचस्प बात यह है कि ऑनलाइन सिर्फ रिसर्च के लिए इस्तेमाल होता है, असली खरीद ज़्यादातर ऑफलाइन स्टोर से होती है क्योंकि ग्राहक भरोसे और सर्विस की गारंटी चाहते हैं।
बैटरी, भरोसा और सर्विसिंग की असली चुनौतियां
डीपक मानते हैं कि इस बिजनेस में सबसे बड़ी बाधा प्रोडक्ट रिलायबिलिटी को लेकर ग्राहकों का भरोसा जीतना है। कई पार्ट्स चीन से इम्पोर्ट होते हैं, और कोई समस्या आने पर तुरंत रिप्लेसमेंट मुश्किल हो जाता है जब तक सप्लायर के पास पर्याप्त स्टॉक न हो।
हालांकि इलेक्ट्रिक बाइसिकल की बैटरी इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर्स जितनी बड़ी नहीं होती, इसलिए थर्मल रनअवे जैसा खतरा लगभग नहीं है। फिर भी ग्राहकों के मन में वही सवाल रहता है जो बड़े EV खरीदारों के मन में होता है — तीन-पांच साल बाद बैटरी बदलनी पड़ी तो कितना खर्च आएगा।
डीपक इसे उद्योग के लिए एक सीधी चुनौती मानते हैं — नया प्रोडक्ट बेचने के लिए मौजूदा विकल्प से बेहतर वैल्यू देना ज़रूरी है, वरना ग्राहक पुराने भरोसेमंद विकल्प पर ही टिके रहेंगे।
फंडिंग क्यों मुश्किल है — VC और इकोनॉमिक्स की सच्चाई
फिजिकल प्रोडक्ट बिजनेस की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इसे सॉफ्टवेयर की तरह बिना अतिरिक्त लागत के स्केल नहीं किया जा सकता — हर यूनिट बनाने में पूंजी और समय दोनों लगते हैं। डीपक इस फंडिंग गैप को साफ शब्दों में बताते हैं:
जब मैं सुनता हूं कि सात साल में निवेश को 100 गुना करना है, तो मुझे लगता है इसके पीछे कोई जादुई चीज़ होनी चाहिए। हर इंडस्ट्री को मेनस्ट्रीम बनने में 20-25 साल लगे हैं, लेकिन आज के VC उसी रफ्तार की उम्मीद हर स्टार्टअप से करते हैं।
वे यह भी बताते हैं कि निवेशक जोखिम कम करके रिटर्न ज़्यादा चाहते हैं, जो अर्थशास्त्र के मूल नियम के ही उलट है — ज़्यादा जोखिम का मतलब ही ज़्यादा रिटर्न होता है। यही वजह है कि इलेक्ट्रिक मोबिलिटी जैसे मैन्युफैक्चरिंग-हेवी सेक्टर में फंडिंग मिलना मुश्किल रहा है, और कई कंपनियां बंद होने के बाद निवेशक और सतर्क हो गए हैं। अगर आप भी ऐसे ही फाउंडर इंटरव्यू से सीखना चाहते हैं कि असली बिजनेस की दुनिया में निवेशकों से बातचीत कैसे होती है, तो बेस्ट हिंदी बिजनेस पॉडकास्ट्स की लिस्ट देख सकते हैं जहां ऐसी और कहानियां मिलेंगी।
2030 के बाद शहरी मोबिलिटी कैसी होगी
डीपक को भरोसा है कि आने वाले सालों में शहरी भारत का ट्रैफिक व्यवहार बदलेगा। अभिषेक व्यास के सवाल पर कि 2030 के बाद क्या बदलाव दिखेंगे, डीपक ने अपना अनुभव साझा किया:
कुछ समय बाद किसी के लिए इतने ट्रैफिक से भरी सड़क पर अकेले एक बड़ी कार चलाना बेवकूफी जैसा लगने लगेगा। लोग रोज़ एक-दो घंटे बर्बाद नहीं करना चाहेंगे, वे जल्द से जल्द दफ्तर पहुंचना चाहेंगे, और आसान विकल्प अपनाएंगे।
उनका मानना है कि पारंपरिक वाहन डिज़ाइन, जो इंटरनल कम्बशन इंजन के हिसाब से बना है, अगले 10-15 साल में बदलेगा क्योंकि इलेक्ट्रिक मोटर की सादगी वाहनों को बहुत सरल बना देती है। साथ ही वे मानते हैं कि मैन्युफैक्चरिंग स्केल और टेक्नोलॉजी में भारत, अमेरिका और चीन से कम से कम 30-40 साल पीछे है, इसलिए पूंजी के मुक्त प्रवाह और इंसानी हुनर के सही इस्तेमाल पर ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत है।
एंटरप्रेन्योर के लिए सबक: धैर्य और मिशन
बातचीत के आखिर में डीपक ने नए फाउंडर्स के लिए सीधी सलाह दी — सिर्फ पैसे के लिए बिजनेस मत करो:
अगर आप सिर्फ पैसे के लिए काम करते हैं, तो आप खुद को सीमित कर लेते हैं। एक बार थोड़ा पैसा या कम्फर्ट मिल जाए, तो दिमाग वैसी मेहनत करना बंद कर देता है जो ज़रूरी है।
डीपक के मुताबिक कई फाउंडर्स फंडिंग मिलने के बाद ही असफल होते हैं, क्योंकि उनका पूरा ध्यान पैसा जुटाने पर था, पैसा मिलते ही दिमाग काम करना बंद कर देता है। वे धैर्य को सबसे ज़रूरी गुण मानते हैं:
एक एंटरप्रेन्योर के लिए धैर्य बहुत ज़रूरी है। हम नतीजे तुरंत चाहते हैं, लेकिन बाज़ार ऐसे काम नहीं करता — आपको प्रोडक्ट बनाने के बाद मार्केट में जाकर लगातार उसके बारे में बोलते रहना पड़ता है।
डीपक की राय में औसतन सफल एंटरप्रेन्योर 60 साल की उम्र के आसपास पहुंचकर असली नतीजे देखते हैं, और बिजनेस में कम से कम 20-25 साल लगाने की तैयारी रखनी चाहिए। अगर आप भी ऐसी ईमानदार फाउंडर जर्नी सुनना चाहते हैं जहां ग्लैमर नहीं बल्कि असली संघर्ष दिखाया जाता है, तो पॉडकास्ट गेस्ट बनने से जुड़ा यह लेख भी पढ़ने लायक है।
यह इलेक्ट्रिक साइकिल बिजनेस आइडिया बताता है कि माइक्रोमोबिलिटी सिर्फ पर्यावरण का मसला नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के समय और सुविधा का सवाल है। डीपक की यह भारतीय उद्यमी की कहानी अभी पूरी सफलता की कहानी नहीं है — वे खुद कहते हैं कि वे अभी “प्रोसेस में” हैं — लेकिन उनका अनुभव उन सभी के लिए काम का है जो फिजिकल-प्रोडक्ट स्टार्टअप में उतरने की सोच रहे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
डीपक कार्तिकेयन कौन हैं?
डीपक कार्तिकेयन एक एंटरप्रेन्योर हैं जो इलेक्ट्रिक बाइसिकल और माइक्रोमोबिलिटी प्रोडक्ट्स के लिए ओम्नीचैनल, मल्टी-ब्रांड रिटेल प्लेटफॉर्म बना रहे हैं। उन्होंने इंजीनियरिंग के बाद Infosys में काम किया और फिर 2021 में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी सेक्टर में कदम रखा।
इलेक्ट्रिक साइकिल बिजनेस आइडिया में सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
डीपक के अनुसार सबसे बड़ी चुनौतियां हैं मैन्युफैक्चरिंग के लिए भारी पूंजी, ग्राहकों का भरोसा जीतना, बैटरी रिप्लेसमेंट की चिंता, और इम्पोर्टेड पार्ट्स पर निर्भरता जिससे सर्विसिंग में देरी होती है।
EV और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी स्टार्टअप्स को फंडिंग क्यों नहीं मिलती?
फिजिकल प्रोडक्ट बिजनेस में सॉफ्टवेयर जैसी स्केलेबिलिटी नहीं होती और रिटर्न आने में लंबा समय लगता है, जबकि ज़्यादातर VC 7 साल में 100x रिटर्न चाहते हैं। इस वजह से मोबिलिटी सेक्टर में निवेशक सतर्क रहते हैं।
क्या इलेक्ट्रिक साइकिल मोटरसाइकिल की जगह ले सकती है?
डीपक का मानना है कि जैसे-जैसे इलेक्ट्रिक साइकिल में बड़े मोटर और बैटरी जुड़ेंगे, यह मोटरसाइकिल जैसा ही काम कम कीमत में करने लगेगी, जिससे लोग स्वाभाविक रूप से इस ओर शिफ्ट होंगे।
एक नए एंटरप्रेन्योर के लिए डीपक की सबसे बड़ी सलाह क्या है?
डीपक कहते हैं कि सिर्फ पैसे के पीछे भागने की बजाय बिजनेस को एक मिशन या पैशन की तरह लेना चाहिए, क्योंकि धैर्य और लगातार मेहनत के बिना फिजिकल-प्रोडक्ट बिजनेस में टिकना मुश्किल है।


