Dr. Amit Saoji on The Founder's Dream podcast

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फुटबॉल खेलते वक्त अचानक घुटना मुड़ जाना, जिम में कंधा उतर जाना, या मैराथॉन की तैयारी में बिना वार्म अप दौड़ लगाना — आजकल हर दूसरे फिटनेस एन्थुजिएस्ट के साथ ऐसी कोई न कोई घटना हो रही है। द फाउंडर्स ड्रीम पॉडकास्ट के इस एपिसोड में होस्ट अभिषेक व्यास ने नागपुर के ऑर्थोपेडिक कंसलटेंट और स्पोर्ट्स इंजरी स्पेशलिस्ट डॉ. अमित साहजी से यही सवाल पूछा — आखिर भारत में स्पोर्ट्स इंजरी क्यों बढ़ रही है, और ACL टियर या शोल्डर डिस्लोकेशन होने पर एक आम इंसान को क्या करना चाहिए।

स्पोर्ट्स इंजरी भारत में इतनी तेजी से क्यों बढ़ रही है?

डॉ. साहजी के मुताबिक भारत अब सही मायने में एक स्पोर्ट्स कल्चर बन चुका है। बीस साल पहले सिर्फ चुनिंदा टीम गेम्स खेले जाते थे, आज कबड्डी, खो-खो से लेकर लोकल टूर्नामेंट्स और प्रीमियम लीग तक, हर स्तर पर खेल बढ़ गया है। जिम जाना, मैराथॉन दौड़ना और स्पोर्ट्स को करियर के तौर पर देखना भी आम हो गया है।

स्पोर्ट्स खेलना बढ़ता है तो इंजरी तो साथ में बढ़ना ही बढ़ना है।

लेकिन असली समस्या सिर्फ ज्यादा खेलना नहीं है। उनका कहना है कि लोग हफ्ते में एक बार टर्फ पर खेल लेते हैं या मैराथॉन में उतर जाते हैं, लेकिन शरीर को उसके लिए तैयार नहीं करते — न प्रॉपर स्ट्रेंथनिंग, न वार्म अप, न सही फुटवेयर। यही लापरवाही चोट को न्योता देती है।

टर्फ पर फुटबॉल खेलना ग्राउंड से ज्यादा खतरनाक क्यों है?

शहरों में बड़े मैदान कम होते जा रहे हैं, इसलिए दिनभर ऑफिस करने के बाद रात में टर्फ पर एक घंटा खेलना आम हो गया है। लेकिन टर्फ और ग्राउंड में बुनियादी फर्क है। टर्फ का सरफेस ज्यादा फ्रिक्शनल होता है और उसमें शॉक एब्जॉर्प्शन ग्राउंड जितना नहीं होता, जिससे पैर सतह पर चिपक जाता है और पूरी बॉडी घुटने के इर्द-गिर्द घूम जाती है। टर्फ का छोटा साइज भी बार-बार पिवोटिंग, कटिंग और सडन स्टॉप करवाता है, जो घुटने के लिगामेंट पर सीधा लोड डालता है — यही वजह है कि टर्फ इंजरी के मामले शहरों में तेजी से बढ़ रहे हैं। डॉ. साहजी इसमें सबसे जरूरी सलाह देते हैं — वही कपड़े और जूते दिनभर पहनकर रात को टर्फ पर उतरना बंद करें और सही फुटवेयर इस्तेमाल करें।

ACL टियर क्या है और इसके लक्षण कैसे पहचानें?

घुटने में चार मुख्य लिगामेंट होते हैं — ACL, PCL, MCL और LCL — साथ ही दो मिनिस्कस। इनमें ACL को डॉ. साहजी घुटने का “सीट बेल्ट” बताते हैं, जो घुटने को रोटेशनल रूप से स्टेबल रखता है और आगे की तरफ फिसलने से रोकता है। ज्यादातर ACL टियर दो स्थितियों में होता है — खेल के दौरान सडन स्टॉप या जंप लैंडिंग में, या रोड ट्रैफिक एक्सीडेंट में ट्विस्टिंग इंजरी से।

टियर के बाद लक्षण दो तरह के होते हैं — एक्यूट और क्रॉनिक। एक्यूट में तुरंत सूजन, तेज दर्द और चलने में असमर्थता आती है, जो कुछ हफ्तों में RICE थेरेपी (रेस्ट, आइसिंग, कंप्रेशन, एलिवेशन) से कम हो जाती है। लेकिन असली खतरा क्रॉनिक टियर में है:

अगर कंप्लीट टियर है एसीएल का तो आपका नी अनस्टेबल होता है… गिविंग वे जैसे सिम्टम्स आते हैं पेशेंट्स को।

यानी सीढ़ियां उतरते या दौड़ते वक्त अचानक लगता है कि घुटना मुड़कर गिरा देगा। इसे नजरअंदाज करने का नतीजा सिर्फ अस्थिरता नहीं है — हर बार घुटना ट्विस्ट होने से अंदर का कार्टिलेज धीरे-धीरे छिलता रहता है, और 20 साल की उम्र में हुआ टियर अगर 4-5 साल इग्नोर कर दिया जाए, तो समय से पहले अर्थराइटिस तक पहुंचा सकता है।

क्या हर ACL टियर में सर्जरी जरूरी है?

यहां डॉ. साहजी एक बड़ी गलतफहमी दूर करते हैं। उनके मुताबिक:

80 टू 90% एसीएल टियर में सर्जरी नहीं लगती है। हम ओनली 10% पेशेंट में ही एसीएल सर्जरी लगती है।

फैसला इस बात पर निर्भर करता है कि टियर पार्शियल है या कंप्लीट, पेशेंट को स्पोर्ट्स में वापस जाना है या नहीं, और एग्जामिनेशन में इनस्टेबिलिटी कितनी है। पार्शियल टियर या स्प्रेन में रिहैब और कभी-कभी PRP (प्लेटलेट रिच प्लाज्मा) थेरेपी से काम चल जाता है, लेकिन कंप्लीट टियर जिसमें इनस्टेबिलिटी और लक्षण दोनों हों, वहां रिकंस्ट्रक्शन सर्जरी ही एकमात्र रास्ता है। सर्जरी में आर्थ्रोस्कोपी (दूरबीन) तकनीक से शरीर के ही किसी हिस्से (हैमस्ट्रिंग, पेरोनियस लॉन्गस जैसे ग्राफ्ट) से नया लिगामेंट बनाया जाता है — बिल्कुल वैसे ही जैसे पुरानी रस्सी टूटने पर नई रस्सी बांधी जाती है। हाई लेवल एथलीट्स और रिवीजन केसेज में अतिरिक्त स्टेबिलिटी के लिए LET (लैटरल एक्स्ट्रा-आर्टिक्युलर टेनोडेसिस) भी जोड़ा जाता है, जिससे रिकवरी तेज होती है और ग्राफ्ट फेल होने का खतरा घटता है।

रिहैब के बिना सर्जरी अधूरी है

पूरी बातचीत में डॉ. साहजी ने जिस एक बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया, वह है रिहैबिलिटेशन। उनका कहना है:

अगर आप सिर्फ सर्जरी करके छोड़ देते हो तो सर्जरी फेल होने के चांसेस वेरी हाई है।

रिहैब सर्जरी से पहले भी होता है (प्री-रिहैब) और बाद में भी, स्टेज-वाइज — पहले दो हफ्ते सिर्फ दर्द और सूजन कम करने पर फोकस, चार से छह हफ्ते में पूरी मूवमेंट वापस लाना, फिर साइकलिंग, जॉगिंग और धीरे-धीरे रनिंग। स्पोर्ट्स में पूरी तरह वापसी के लिए कम से कम नौ महीने से एक साल का समय चाहिए। सबसे बड़ी गलती लोग यही करते हैं — तीन महीने में चलना-फिरना नॉर्मल लगने लगता है और वे जल्दी दौड़ना-कूदना शुरू कर देते हैं, जबकि तीन से छह महीने की अवधि में ही नया लिगामेंट हड्डी से जुड़ रहा होता है और सबसे कमजोर होता है। यही समझ अगर कोई फिटनेस को लेकर सेल्फ ग्रोथ की तरह अपनाए — धैर्य और अनुशासन के साथ — तो रीटियर और दोबारा सर्जरी जैसी स्थिति से बचा जा सकता है।

शोल्डर डिस्लोकेशन और फ्रोजन शोल्डर में फर्क

शोल्डर एक बॉल-एंड-सॉकेट जॉइंट है जो 360 डिग्री घूम सकता है, और जितनी ज्यादा मोबिलिटी उतना ही इंजरी का खतरा ज्यादा। एक बार डिस्लोकेशन होने पर सॉकेट के आसपास की हड्डी की “दीवार” का कुछ हिस्सा टूट जाता है। करीब 50% लोगों में दोबारा डिस्लोकेशन नहीं होता, लेकिन बाकी 50% में यह बार-बार होता रहता है — खासकर अगर पेशेंट खुद ही कंधा वापस जगह पर लगा लेने की आदत डाल ले, जिसे डॉक्टर हैबिचुअल डिस्लोकेशन कहते हैं। डॉ. साहजी इसे साफ शब्दों में खारिज करते हैं और कहते हैं कि इससे जॉइंट की अंदरूनी खराबी बढ़ती जाती है।

शोल्डर की दूसरी आम समस्या है रोटेटर कफ टियर, जो 50 की उम्र के बाद मसल्स कमजोर होने पर होता है, जिसमें हाथ उठाना या घुमाना मुश्किल हो जाता है। इससे अलग है फ्रोजन शोल्डर, जो ज्यादातर डायबिटीज के मरीजों में देखा जाता है — इसमें एक्टिव और पैसिव दोनों तरह की मूवमेंट बंद हो जाती है और रात में दर्द ज्यादा होता है। राहत की बात यह है कि ज्यादातर फ्रोजन शोल्डर बिना सर्जरी, सिर्फ एक्सरसाइज और मोबिलिटी वर्क से दो-तीन महीने में ठीक हो जाता है, सर्जरी की जरूरत बमुश्किल 1% केसेज में ही पड़ती है।

चोट से बचने के लिए क्या करें

  • खेलने से पहले प्रॉपर वार्म अप कभी न छोड़ें
  • टर्फ पर खेलने के लिए सही फुटवेयर इस्तेमाल करें, रोज के ऑफिस जूतों में न खेलें
  • स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और रिकवरी को उतनी ही गंभीरता से लें जितनी खेल को
  • घुटने या शोल्डर में दर्द, सूजन या अस्थिरता महसूस होते ही डॉक्टर से जांच कराएं, खुद इलाज न करें
  • सर्जरी हो या न हो, डॉक्टर के बताए रिहैब प्रोटोकॉल को पूरा समय दें

यह बातचीत सिर्फ एथलीट्स के लिए नहीं, हर उस इंसान के लिए काम की है जो जिम जाता है, वीकेंड फुटबॉल खेलता है या मैराथॉन की तैयारी कर रहा है। ऐसे ही प्रैक्टिकल, जमीनी इंटरव्यूज के लिए द फाउंडर्स ड्रीम पॉडकास्ट को सुनते रहें।

होस्ट अभिषेक व्यास के साथ पूरी बातचीत देखिए द फाउंडर्स ड्रीम यूट्यूब चैनल पर, और हर हफ़्ते नए इंटरव्यू के लिए सब्सक्राइब कीजिए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

एसीएल टियर क्या होता है?

एसीएल घुटने के अंदर का एक लिगामेंट है जो घुटने को रोटेशनल रूप से स्टेबल रखता है; इसके टूटने पर घुटना अनस्टेबल हो जाता है और ट्विस्ट होने पर गिरने जैसा महसूस होता है, जिसे डॉक्टर गिविंग वे सिम्टम बोलते हैं।

क्या एसीएल टियर में हमेशा सर्जरी करानी पड़ती है?

नहीं, डॉ. अमित साहजी के अनुसार 80 से 90 प्रतिशत एसीएल टियर में सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती, सिर्फ लगभग 10 प्रतिशत पेशेंट्स में ही रिकंस्ट्रक्शन सर्जरी की जरूरत होती है और बाकी रिहैब से ठीक हो जाते हैं।

एसीएल सर्जरी के बाद स्पोर्ट्स में वापस जाने में कितना समय लगता है?

सर्जरी के बाद पूरी स्पोर्ट्स एक्टिविटी में वापस जाने के लिए कम से कम 9 महीने से एक साल तक की रिकवरी और स्टेज-वाइज रिहैब जरूरी है, वरना ग्राफ्ट फेल होने का खतरा बढ़ जाता है।

शोल्डर बार-बार डिस्लोकेट क्यों होता है?

एक बार शोल्डर डिस्लोकेट होने पर सॉकेट के आसपास की हड्डी की दीवार टूट जाती है, जिससे लगभग 50 प्रतिशत लोगों में दोबारा डिस्लोकेशन का खतरा रहता है, खासकर अगर खुद ही बार-बार शोल्डर वापस लगाया जाए।

फ्रोजन शोल्डर किसे होता है और इसका इलाज क्या है?

फ्रोजन शोल्डर ज्यादातर डायबिटीज के मरीजों में देखा जाता है जिसमें शोल्डर की एक्टिव और पैसिव दोनों मूवमेंट रुक जाती हैं; ज्यादातर मामलों में यह बिना सर्जरी, सिर्फ एक्सरसाइज और रिहैब से ठीक हो जाता है।

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About the Host

Abhishek Vyas, creator of The Founder’s Dream, India’s top Hindi business podcast, delivers powerful storytelling and viral conversations with leading founders and creators. His show helps guests share authentic journeys, expand their brands, and connect with millions of engaged listeners.

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