टीचिंग की नौकरी छोड़कर लॉन्ड्री जैसे “गंदे” समझे जाने वाले बिजनेस में उतरना आसान फैसला नहीं था। द फाउंडर्स ड्रीम पॉडकास्ट पर होस्ट अभिषेक व्यास के साथ बातचीत में Clean Craft के डायरेक्टर Himanshu Sehrawat की सफलता की कहानी इसी फैसले से शुरू होती है — एक ऐसा फैसला जिसने घर में झगड़ा खड़ा कर दिया था, लेकिन आज एक भरोसेमंद लॉन्ड्री फ्रेंचाइजी की बुनियाद बन चुका है।
यह एपिसोड सिर्फ एक बिजनेस की कहानी नहीं है, बल्कि एक सफलता की प्रेरक कहानी भी है। इसमें फ्रीलांसर, बिजनेस ओनर और बिजनेस बिल्डर के फर्क से लेकर विजय माल्या के उदाहरण तक, और ड्राई क्लीनिंग इंडस्ट्री में होने वाले धोखे से लेकर फ्रेंचाइजी खरीदने के प्रैक्टिकल नियम तक — बहुत कुछ है जो किसी भी उद्यमी के काम आ सकता है।
फ्रीलांसर, बिजनेस ओनर और बिजनेस बिल्डर — फर्क क्या है?
हिमांशु शुरुआत में ही एक जरूरी भेद साफ करते हैं। उनके मुताबिक हर शुरुआत करने वाले की तीन स्टेज होती हैं — पहले आप सेल्फ एंप्लॉयड होते हैं, फिर बिजनेस ओनर, और अगर सही नॉलेज हो तो बिजनेस बिल्डर। यही अंतर तय करता है कि कोई इंसान लंबे समय तक टिकेगा या हर कुछ महीनों में मोटिवेट-डीमोटिवेट होता रहेगा।
फ्रीलांसिंग सस्टेनेबल नहीं है। ठीक है? आपने देखा होगा रतन टाटा ने फ्रीलांसिंग नहीं की।
उनका तर्क सीधा है — जब तक डिसीजन में सिंपलिसिटी और स्टेबिलिटी नहीं है, तब तक कोई खुद को बिजनेस बिल्डर नहीं कह सकता। छोटी टीम के साथ महीने के चार-पांच लाख कमा लेना अलग बात है, और सेकंड लाइन ऑफ लीडरशिप खड़ी करके एक सिस्टम बना देना बिलकुल अलग बात है। यही वह जगह है जहां असली उद्यमी और सिर्फ पैसा कमाने वाले के बीच लकीर खिंचती है।
विजय माल्या का उदाहरण — पहचान का संकट क्या सिखाता है
बातचीत में अभिषेक जब विजय माल्या के पॉडकास्ट का जिक्र करते हैं, तो हिमांशु इसे एक “आइडेंटिटी क्राइसिस” के तौर पर देखते हैं। उनका कहना है कि जिस वक्त एयरलाइन डूब रही थी और पैसे नहीं थे, उसी वक्त माल्या अपनी बर्थडे पार्टी मना रहे थे — यही व्यवहार असल समस्या की जड़ है।
विजय माल्या वो पर्सन है जो पकड़े जाने के बाद कह रहा है आई एम नॉट श्योर… वो जो लेविश लाइफ वो दिखा रहा था, वो एक आइडेंटिटी क्राइसिस था कि यार भाई में कुछ दम है।
हिमांशु इसे मिडिल क्लास मानसिकता से भी जोड़ते हैं — जहां कमाई शुरू होते ही iPhone, गाड़ी और सोसाइटी को दिखाने की होड़ लग जाती है। उनके मुताबिक असली फर्क “लेगेसी क्रिएट करने वालों” और “फुकराबाजी करने वालों” के बीच है, और ज्यादातर लोग शॉर्ट टर्म पैसे के पीछे भागकर लंबी दौड़ हार जाते हैं।
Himanshu Sehrawat की सफलता की कहानी: टीचिंग से लॉन्ड्री बिजनेस तक
हिमांशु बताते हैं कि 2017 में उनकी गवर्नमेंट स्कूल में टीचर की नौकरी लगी थी, लेकिन घर में पैसों की तंगी थी।
मेरी फैमिली में पैसे की कमी थी। मैं अमीर बाप का गरीब बेटा था।
तीसरी पीढ़ी से टीचर परिवार में पले-बढ़े हिमांशु का पहला वेंचर एजुकेशन से जुड़ा था, लेकिन एक दोस्त के साथ शुरू हुआ लॉन्ड्री आइडिया उन्हें खींच ले गया। जब उन्होंने इस बिजनेस को रिसर्च किया तो पता चला कि इसमें 68% ग्रॉस मार्जिन और 32 से 38% तक नेट प्रॉफिट संभव है — यह आंकड़ा ही उनके लिए टर्निंग पॉइंट बना।
पहला वेंचर ‘होम्स वन’ पार्टनरशिप में शुरू हुआ लेकिन मॉडल गलत साबित हुआ और कोरोना ने रही-सही कसर पूरी कर दी। हिमांशु ने टीचिंग जारी रखते हुए दोबारा कोशिश की, आखिरकार 2022 में स्कूल की नौकरी पूरी तरह छोड़कर कंपनी का नाम बदलकर Clean Craft रखा और वेस्ट दिल्ली से नए सिरे से शुरुआत की। यह पूरा सफर बताता है कि किसी भी बिजनेस आइडिया को टिकाऊ बनाने में सालों का धैर्य लगता है, शॉर्टकट नहीं चलता।
ड्राई क्लीनिंग इंडस्ट्री का सच — कहां लुटता है पैसा
इस एपिसोड का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा वह है जहां हिमांशु बताते हैं कि असली ड्राई क्लीनिंग भारत में लगभग होती ही नहीं।
इंडिया में जो सबसे मिस लीडिंग टर्म है ना वो ड्राई क्लीनिंग है। इंडिया में 200 मशीनंस भी नहीं है ड्राई क्लीनिंग की क्योंकि ड्राई क्लीनिंग की जो मशीन है ना वो 48 लाख की आती है।
उनके मुताबिक असली मशीन इटली की Rajaki या Fabremetic कंपनियों से आती है और इंस्टॉलेशन के बाद इंडिया में करीब 27 लाख रुपये की पड़ती है। ज्यादातर दुकानों पर स्टेनलेस स्टील की बाल्टी में एरियल पाउडर डालकर कपड़े रगड़े जाते हैं और उसे ड्राई क्लीनिंग बताया जाता है — जबकि यह असल में सिर्फ लॉन्ड्री है। इसी तरह प्रेस के दौरान टेंपरेचर कंट्रोल न होने से कपड़े का फाइबर 30-35 प्रेस में ही घिस जाता है, और सस्ते डिटर्जेंट में यूरिया-कास्टिक जैसी चीजें मिलाकर कपड़े की उम्र कम की जाती है।
- ड्राई क्लीनिंग = ऑयल बेस्ड प्रोसेस, जो भारत में बहुत कम जगह असली रूप में होती है
- लॉन्ड्री = अल्कलाइन डिटर्जेंट से नॉर्मल धुलाई, डे-टू-डे कपड़ों के लिए ठीक
- वेट क्लीनिंग = पानी आधारित नया कॉन्सेप्ट, जो पर्क केमिकल बैन होने के बाद आया
हिमांशु का कहना है कि जब तक ग्राहक को यह नॉलेज नहीं मिलेगी, यह गड़बड़ी चलती रहेगी — इसीलिए उनकी टीम कंट्रोल्ड, एंजाइम बेस्ड डिटर्जेंट इस्तेमाल करने पर जोर देती है ताकि कपड़ा 100 वॉश के बाद भी खराब न हो।
फ्रेंचाइजी खरीदने से पहले क्या देखना चाहिए
फ्रेंचाइजी इंडस्ट्री में करीब एक दशक का अनुभव रखने वाले हिमांशु बताते हैं कि ज्यादातर फ्रेंचाइजी इसलिए फेल होती हैं क्योंकि पार्टनर कंपनी असल ट्रेनिंग नहीं देती।
वहां पे नौकर मालिक को बता रहा काम कैसे होगा? आपको लगता है यह चीज सर्वाइव करेगी।
Clean Craft की टीम में सेल्स टारगेट वाले लोग नहीं बल्कि ट्रेनर हैं, जो सॉर्टिंग, स्पॉटिंग, वाशिंग, आयरनिंग और पैकेजिंग जैसी कोर स्किल्स सिखाते हैं। हिमांशु यह भी मानते हैं कि हर फ्रेंचाइजी सीकर को मंजूरी नहीं दी जाती — फाइनेंशियल और बिहेवियर प्रोफाइल देखकर ही फैसला होता है, और उनकी वेबसाइट पर सात जरूरी बातें पहले से लिखी हैं जो फ्रेंचाइजी लेने से पहले हर खरीदार को पढ़नी चाहिए।
इसी बातचीत में एक और अहम सीख निकलती है — अलग दिखने की कोशिश छोड़कर बेहतर बनने पर फोकस करना।
प्रॉब्लम यह है कि क्वेश्चन ही गलत पूछा जाता है। वो क्वेश्चन ये होना चाहिए। आप दूसरों से बेहतर कैसे हैं?
यह सोच किसी भी उद्यमी के लिए काम की है, चाहे वह लॉन्ड्री में हो या किसी और सेक्टर में — कॉम्पिटिशन की कमजोरी को अपनी यूएसपी बनाना, नया आविष्कार करने से ज्यादा असरदार तरीका है।
एक भारतीय उद्यमी की कहानी से क्या सीखें
यह भारतीय उद्यमी की कहानी सिर्फ मोटिवेशन के लिए नहीं, बल्कि प्रैक्टिकल सबक के लिए सुनी जानी चाहिए। हिमांशु का अनुभव बताता है कि किसी भी बिजनेस को स्टेबल होने में तीन साल, मार्केट में पहचान बनने में पांच साल और असली स्केल तक पहुंचने में करीब दस साल लगते हैं — चाहे वह Zomato हो या कोई लॉन्ड्री ब्रांड। जो लोग यह मानकर बैठते हैं कि दो साल में सब कुछ हो जाएगा, वे अक्सर फ्रस्ट्रेट होकर बीच में ही छोड़ देते हैं।
- पहले नॉलेज गेन करें, फिर स्केल करने की सोचें
- बिजनेस चुनते वक्त सिर्फ यह न देखें कि “यह चल रहा है”, बल्कि यह देखें कि क्या आप इसे बिना किसी की मदद के चला सकते हैं
- फुल टाइम कमिटमेंट के बिना लंबी अवधि की स्थिरता मुश्किल है
- अपनी आइडेंटिटी एक जगह टिकाएं — पार्ट टाइम बिजनेसमैन और फुल टाइम कुछ और, यह मॉडल टिकता नहीं
ऐसे ही फाउंडर की जर्नी और कंटेंट सुनने-देखने वालों के लिए, अगर आप खुद पॉडकास्ट बनाने या एडिट करने में दिलचस्पी रखते हैं तो पॉडकास्ट एडिटिंग पर यह गाइड काम की हो सकती है। और अगर आप यह जानना चाहते हैं कि बिजनेस पॉडकास्ट हिंदी स्पेस में और कौन-कौन आगे बढ़ रहा है, तो 2026 के टॉप इंडियन पॉडकास्टर्स की यह लिस्ट देख सकते हैं।
होस्ट अभिषेक व्यास के साथ पूरी बातचीत देखिए द फाउंडर्स ड्रीम यूट्यूब चैनल पर, और हर हफ़्ते नए फाउंडर इंटरव्यू के लिए सब्सक्राइब कीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Himanshu Sehrawat कौन हैं?
Himanshu Sehrawat, Clean Craft के डायरेक्टर हैं और पहले गवर्नमेंट स्कूल में टीचर थे। उन्होंने 2017 के आसपास लॉन्ड्री इंडस्ट्री में कदम रखा और आज एक जानी-मानी लॉन्ड्री फ्रेंचाइजी चला रहे हैं।
Clean Craft की शुरुआत कैसे हुई?
शुरुआत एक पार्टनरशिप वेंचर ‘होम्स वन’ से हुई थी जो 2021 के आसपास ठीक से चल नहीं पाया और कोरोना में बंद हो गया। बाद में हिमांशु ने कंपनी का नाम बदलकर Clean Craft रखा और वेस्ट दिल्ली से दोबारा फुल टाइम शुरुआत की।
ड्राई क्लीनिंग में सबसे ज्यादा धोखा कहां होता है?
हिमांशु के मुताबिक असली ड्राई क्लीनिंग मशीन इटली से आती है और महंगी है, इसलिए ज्यादातर दुकानें एरियल पाउडर या सस्ते डिटर्जेंट से कपड़े धोकर उसे ड्राई क्लीनिंग बताती हैं, जबकि यह असल में लॉन्ड्री या वेट क्लीनिंग होती है।
फ्रेंचाइजी लेने से पहले क्या ध्यान रखना चाहिए?
हिमांशु कहते हैं कि फ्रेंचाइजी तभी चलती है जब कंपनी आपको असली ट्रेनिंग, कोर नॉलेज और गाइडेंस दे, सिर्फ फीस लेकर छोड़ न दे। खरीदने से पहले फ्रेंचाइजी फीस, अथॉरिटी और ट्रेनिंग स्ट्रक्चर साफ-साफ समझना जरूरी है।


