भारत में हर बड़ा शहर रोज़ हज़ारों टन कचरा पैदा करता है, फिर भी हमारे पास इसे ठीक से मैनेज करने का कोई मुकम्मल सिस्टम नहीं है। इस Maninder Singh Nayyar इंटरव्यू में CEF Group के मनिंदर सिंह नैयर, द फाउंडर्स ड्रीम के होस्ट अभिषेक व्यास के साथ बैठकर बताते हैं कि यह समस्या सिर्फ गंदगी की नहीं बल्कि पॉलिसी, इकॉनमी और नीयत की है।
Maninder Singh Nayyar इंटरव्यू में सामने आया 45 अरब डॉलर का हिसाब
बातचीत की शुरुआत ही एक चौंकाने वाले आंकड़े से होती है। मनिंदर बताते हैं कि खराब वेस्ट मैनेजमेंट की वजह से भारत हर साल करीब 45 अरब डॉलर गंवा देता है। वजह सिर्फ गंदगी नहीं, बल्कि गलत जगह खर्च हो रहा पैसा है।
वी आर वैरी गुड एट मेकिंग पॉलिसीज ऑन पेपर बट वी आर इक्वली बैड व्हेन इट कम्स टू इम्लीमेंटेशन।
उनके मुताबिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च होने वाले बजट का करीब आधा हिस्सा उन्हीं पुरानी योजनाओं में लगता रहता है जो आज की ज़रूरत के हिसाब से बेकार हो चुकी हैं। जब वेस्ट मैनेजमेंट नहीं होती तो पूरा इकोसिस्टम गंदा रहता है, लोग बाहर निकलना कम कर देते हैं, खर्च घटता है और इसका सीधा असर देश की फिस्कल हालत पर पड़ता है।
टूरिज्म और सफाई का रिश्ता: पेरिस से मिला जवाब
अभिषेक का सवाल सीधा था — क्या गंदगी की वजह से टूरिस्ट भारत आने से डरते हैं? मनिंदर इसका जवाब एक निजी अनुभव से देते हैं, जब वे फ्रांस में वर्ल्ड टूर पर थे।
दे आर लाइक सॉरी सॉरी सर, वो वी आर नॉट वैरी कंफर्टेबल बिकॉज़ इंडिया इज वेरी डर्टी। आई डोंट नो यू गाइस डोंट क्लीन योर कंट्री, यू डोंट हेव अ गुड्स हाइजीन पैरामीटर्स।
उनके मुताबिक अकेला पेरिस पूरे भारत से ज़्यादा टूरिस्ट हर साल अपने यहां बुलाता है। भारत भले ही टूरिस्ट संख्या में दुनिया में छठे नंबर पर हो, लेकिन प्रति व्यक्ति आमदनी और असल आर्थिक फायदे के लिहाज़ से यह उपलब्धि उतनी बड़ी नहीं जितनी दिखती है। साफ-सुथरे मेट्रो शहर होने के बावजूद दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसी सिटीज़ पिछले दस साल की वर्ल्ड रैंकिंग में सबसे गंदे शहरों में शुमार रही हैं।
सेग्रिगेशन और इंसिनरेशन का सच — प्लांट क्यों नहीं लगते
मनिंदर बताते हैं कि साल 2000 में बनी वेस्ट मैनेजमेंट रूल बुक में इंसिनरेशन आधारित तकनीक और कंपोस्टिंग-RDF सिस्टम का ज़िक्र था। इंसिनरेशन में मिक्स कचरे को 1100 डिग्री पर जलाकर बिजली बनाई जाती है, लेकिन इससे निकलने वाले प्रदूषक इतने खतरनाक होते हैं कि इन्हें कंट्रोल करने के लिए महंगी तकनीक चाहिए, जो भारत के बिजली रेट पर सस्टेनेबल नहीं बैठती। नतीजा — लोकल विरोध के चलते ये प्लांट लगभग 2011 तक बंद हो गए।
इसके बाद कंपोस्टिंग-RDF मॉडल आया, जिसमें ट्रोमल मशीनों से गीला और सूखा कचरा अलग किया जाता है। मगर असल में गीले कचरे में 30-35% सूखा मिला रहता है और सूखे में 20% गीला, जिससे न तो बना RDF सीमेंट फैक्ट्री को बेचने लायक होता है और न ही कंपोस्ट किसान के खेत के लिए सुरक्षित। इसी वजह से गुड़गांव में सात साल में एक भी वेस्ट प्रोसेसिंग प्लांट नहीं लग पाया, और दिल्ली नगर निगम के पास तक प्लांट के लिए ज़मीन नहीं है।
टेंडर सिस्टम भी इस समस्या को गहरा करता है — L1 यानी सबसे सस्ती बोली वाली कंपनी को काम मिल जाता है, चाहे वह वैज्ञानिक तरीके से कचरा प्रोसेस करे या नहीं।
एवरीथिंग व्हिच इज़ बीइंग डन इज़ बीइंग डन जस्ट फॉर कंप्लायंस ऑन पेपर्स, नॉट फॉर एक्चुअल रिजल्ट ऑन द ग्राउंड।
सतत पॉलिसी: बायोगैस से CNG बनाने का मौका
इसी बातचीत का सबसे उम्मीद जगाने वाला हिस्सा है सतत पॉलिसी, जिसे अब CGD पॉलिसी कहा जाता है। मनिंदर 2014 से इस मॉडल की वकालत कर रहे थे — बिजली बनाने के बजाय ऑर्गेनिक वेस्ट से नेचुरल गैस बनाई जाए। ऑर्गेनिक कचरे से निकलने वाली बायोगैस में करीब 55-60% मीथेन होता है, और जब इसे प्यूरिफाई कर CO2 हटाया जाता है तो बचता है बायोमीथेन — जो वही गैस है जो गाड़ियों में CNG के रूप में इस्तेमाल होती है।
2017 में जब श्रीलंका की क्रिकेट टीम मास्क पहनकर दिल्ली में खेलने आई और विदेशी मीडिया ने भारत की हवा पर लिखना शुरू किया, तब सरकार हरकत में आई। तत्कालीन ऑयल एंड गैस मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के सामने प्रेजेंटेशन के बाद जर्मनी के एक मॉडल का दौरा हुआ और फिर सतत पॉलिसी बनी, जिसके तहत सरकार तय रेट पर कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) खरीदती है। शुरुआत में यह रेट 46 रुपये प्रति किलो था, जो अब बढ़कर 80-85 रुपये तक पहुंच चुका है।
मनिंदर के मुताबिक भारत सालाना करीब 2 लाख करोड़ रुपये की CNG इंपोर्ट करता है, जबकि देश की क्षमता 3 से 3.5 लाख करोड़ रुपये की CNG खुद बनाने और एक्सपोर्ट करने तक की है — बशर्ते ऑर्गेनिक वेस्ट का सही इस्तेमाल हो।
एथेनॉल बनाम बायोगैस: जल्दबाज़ी की कीमत
यहां अभिषेक एक ज़रूरी सवाल उठाते हैं — क्या एथेनॉल ब्लेंडिंग की तरह बायोगैस में भी बाद में कोई गड़बड़ी सामने आ सकती है? मनिंदर साफ करते हैं कि गैस में एनालाइज़र लगा होने से मीथेन की शुद्धता में कोई समझौता संभव नहीं, जबकि एथेनॉल में ऐसा नियंत्रण नहीं है।
असल समस्या यह हुई कि एथेनॉल प्लांट इतनी तेज़ी से लगे कि कच्चा माल सीमित पड़ गया, प्रोडक्शन ज़रूरत से ज़्यादा हो गया और फिर उसे जबरन पेट्रोल में मिलाया जाने लगा — बिना कार इंजन और रबड़ पार्ट्स को उस हिसाब से तैयार किए। इसी थ्रस्ट और फंडिंग का एक हिस्सा अगर नेचुरल गैस इंफ्रास्ट्रक्चर, पाइपलाइन और मशीनरी स्टैंडर्डाइजेशन में लगता, तो आज 200 की जगह करीब 1000 CNG प्लांट लग चुके होते।
- रूरल इंडिया में नई नौकरियां बनतीं
- विदेशी मुद्रा में होने वाला गैस इंपोर्ट कम होता
- ऑर्गेनिक खाद से केमिकल फर्टिलाइज़र की निर्भरता घटती
- किसान को पराली और एग्री वेस्ट से एक्स्ट्रा आमदनी मिलती
- प्रदूषण और पराली जलाने की समस्या भी कम होती
इंदौर मॉडल और अकाउंटेबिलिटी की कमी
बातचीत में इंदौर का ज़िक्र एक उम्मीद की तरह आता है। 2016 में आए एक अधिकारी ने पूरे शहर का ब्लूप्रिंट तैयार किया, प्रोफेशनल्स की टीम बनाई और एक वॉर रूम से हर कचरा गाड़ी का रूट लाइव ट्रैक किया। नतीजा — इंदौर पांच-छह साल में स्वच्छ भारत मिशन की रैंकिंग में देश का नंबर वन क्लीन सिटी बन गया। मगर मनिंदर यह भी बताते हैं कि उस अधिकारी को बाद में डिपार्टमेंट से हटा दिया गया।
इसी सिलसिले में वे सिस्टम की सबसे बड़ी खामी की ओर इशारा करते हैं — जवाबदेही का पूरी तरह गायब होना।
मैनेजमेंट ऑलवेज फ्लोस फ्रॉम द टॉप। अगर ऊपर से नहीं हो रहा तो नीचे वाले भी नहीं करते।
वे बताते हैं कि एक शहर में असल में 16 तरह का कचरा निकलता है — प्लास्टिक, टेक्सटाइल, हॉर्टिकल्चर वेस्ट, गाय का गोबर, कुकिंग ऑयल, कंस्ट्रक्शन डेमोलिशन वेस्ट, ई-वेस्ट और भी बहुत कुछ — जबकि नगर निगम आज भी सिर्फ तीन-चार बुनियादी कैटेगरी पर काम करता है। हर हिस्से का ठेका अलग-अलग कंपनी को बांट देने से कोई भी प्लांट व्यावसायिक रूप से टिकाऊ नहीं बन पाता। जो लोग स्टार्टअप और बिज़नेस बनाने के तरीकों में दिलचस्पी रखते हैं, उनके लिए द फाउंडर्स ड्रीम का Business Mindset Podcast यह समझने में मदद करता है कि सही सोच और सही सिस्टम के बिना कोई भी सेक्टर टिकाऊ नहीं बन सकता — चाहे वह वेस्ट मैनेजमेंट हो या कोई और उद्योग।
नागरिक के तौर पर क्या किया जा सकता है
बातचीत के आखिर में मनिंदर आम नागरिकों की ज़िम्मेदारी की भी बात करते हैं। शहर का सिस्टम अगर ऊपर से ठीक नहीं है तो नीचे के व्यवहार में भी सुधार मुश्किल है, फिर भी हर व्यक्ति कुछ बदलाव अपने स्तर पर कर सकता है।
- कम से कम कचरा पैदा करना और चीज़ों को दोबारा इस्तेमाल में लाना
- प्लास्टिक की पानी की बोतल की जगह स्टील या कॉपर की बोतल रखना
- हिल स्टेशनों पर प्लास्टिक के इस्तेमाल से पूरी तरह बचना
- घर का कुकिंग ऑयल नाली में बहाने की बजाय सही जगह देना
मनिंदर खुद गुड़गांव की सड़कों पर झाड़ू लेकर उतर चुके हैं, लेकिन मानते हैं कि जब तक शहर में पर्याप्त डस्टबिन और सार्वजनिक टॉयलेट नहीं होंगे, अकेले नागरिक व्यवहार बदलकर पूरा सिस्टम ठीक नहीं हो सकता। यह Maninder Singh Nayyar इंटरव्यू इसी वजह से सिर्फ शिकायत नहीं, बल्कि पॉलिसी, तकनीक और नीयत तीनों मोर्चों पर बदलाव की मांग करता है। ऐसी ही गहरी बातचीत के लिए द फाउंडर्स ड्रीम का बिज़नेस माइंडसेट पॉडकास्ट भी सुनने लायक है।
होस्ट अभिषेक व्यास के साथ पूरी बातचीत देखिए द फाउंडर्स ड्रीम यूट्यूब चैनल पर, और हर हफ़्ते नए फाउंडर इंटरव्यू के लिए सब्सक्राइब कीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
भारत हर साल कचरे की वजह से कितना नुकसान झेलता है?
Maninder Singh Nayyar के मुताबिक खराब वेस्ट मैनेजमेंट की वजह से भारत को हर साल लगभग 45 अरब डॉलर का नुकसान होता है, जिसकी बड़ी वजह गलत जगह खर्च होने वाला इंफ्रास्ट्रक्चर बजट और रुकी हुई इकॉनमिक एक्टिविटी है।
भारत में वेस्ट सेग्रिगेशन क्यों सफल नहीं हो पाया?
क्योंकि सोर्स पर सेग्रिगेशन होता ही नहीं, ट्रोमल जैसी मैकेनिकल मशीनें गीले और सूखे कचरे को सही तरीके से अलग नहीं कर पातीं जिससे बना कंपोस्ट और RDF दोनों की क्वालिटी इतनी खराब होती है कि कोई खरीदार तैयार नहीं होता।
सतत पॉलिसी क्या है और यह कैसे काम करती है?
सतत यानी अब की CGD पॉलिसी के तहत ऑर्गेनिक वेस्ट, पराली या एग्रो-इंडस्ट्रियल वेस्ट से बायोगैस बनाकर उसे प्यूरिफाई कर बायोमीथेन यानी CNG जैसी गैस बनाई जाती है, जिसे इंडियन ऑयल जैसी कंपनियां तय रेट पर खरीदती हैं।
इंदौर देश का सबसे साफ शहर कैसे बना?
2016 में आए एक अधिकारी ने पूरे शहर का ब्लूप्रिंट बनाया, वॉर रूम से हर कचरा गाड़ी का रूट ट्रैक किया और प्रोफेशनल टीम के साथ पांच-छह साल में सिस्टम को व्यवस्थित किया, जिसके बाद इंदौर नंबर वन क्लीन सिटी बना।
आम नागरिक वेस्ट मैनेजमेंट सुधारने में क्या कर सकता है?
कम कचरा बनाना, चीजों को दोबारा इस्तेमाल करना, प्लास्टिक की बोतलों की जगह स्टील या कॉपर की बोतल रखना और सार्वजनिक जगहों को गंदा न करना ऐसे छोटे कदम हैं जिनसे फर्क पड़ता है।


