हर “संघर्ष से सफलता की कहानी” की शुरुआत एक मामूली मोड़ से होती है — किसी के लिए वो मोड़ कॉलेज खत्म होने के बाद तीन महीने तक नौकरी न मिलना होता है। द फाउंडर्स ड्रीम एक लोकप्रिय बिजनेस पॉडकास्ट हिंदी में है, और इसी के इस एपिसोड में होस्ट अभिषेक व्यास ने Smart IT Box के फाउंडर शैलेंद्र सिंह से बात की — एक ऐसे शख्स की कहानी जो डाटा एंट्री ऑपरेटर से शुरू होकर आज बिजनेस प्रोसेस ऑटोमेशन आर्किटेक्ट बन चुके हैं, और जो आज AI से बने ऐप्स पर आंख मूंदकर भरोसा करने के खिलाफ खुलकर बोलते हैं।
डाटा एंट्री ऑपरेटर से आईटी ऑफिसर बनने तक की संघर्ष से सफलता की कहानी
शैलेंद्र सिंह का BCA पूरा होने के बाद तीन महीने जॉब सर्च में निकले, कैंपस से प्लेसमेंट नहीं हुई। मौका मिला सोसाइटी में रहने वाले एक सीनियर के जरिए, जिन्होंने उन्हें जयश्री रसायन उद्योग लिमिटेड के AVP भूपेंद्र कौशिक से मिलवाया। 2014 में ₹10,000 महीने की सैलरी पर शुरू हुई इस जॉब में पहले दिन ही एक शर्त रखी गई थी।
मैं तुझे एक चांस दे रहा हूं, 1 महीने का। एंड लेट्स सी तू क्या कर सकता है।
कभी मेरे सामने ना पे सैलरी के लिए मत आइयो। सैलरी तुझे कभी मुझसे मांगनी नहीं पड़ेगी। तेरा काम तेरी सैलरी डिसाइड करेगा।
30 दिन का टारगेट उन्होंने 20 दिन में पूरा कर दिया, फिर 10 दिन का टारगेट 7 दिन में। इसी काम के दम पर उन्हें जम्मू के साभा इंडस्ट्रियल एरिया में IT ऑफिसर बनाकर भेजा गया, जहां उन्होंने पूरी यूनिट का ERP सिस्टम लाइव किया। इसके बाद कई कंपनियों में — स्टोर इंचार्ज से लेकर प्रोडक्शन तक — अलग-अलग भूमिकाएं निभाईं, सिर्फ इसलिए कि सीखने का मौका मिले।
कोविड लॉकडाउन में शुरू हुआ Smart IT Box
आखिरी नौकरी वर्गो लैमिनेट्स में करते हुए कोविड लॉकडाउन आया। ज़ूम मीटिंग्स में बिजनेस ओनर्स अपने-अपने Google Sheet सिस्टम दिखाने लगे, और शैलेंद्र के बॉस ने उनका बनाया सिस्टम दिखाया, जो बाकियों से बेहतर निकला। यहीं से क्लिक हुआ — अप्रैल 2020 में इस्तीफा दे दिया, क्रेडिट कार्ड से लैपटॉप खरीदा और अकेले काम शुरू किया।
पहला क्लाइंट ज़ूम मीटिंग के रेफरेंस से आया, जिसने एक महीने में ₹35,000 की कॉस्ट पर ऑर्डर-टू-डिलीवरी सिस्टम बनवाया। उसी महीने वर्ड ऑफ माउथ से 17 नए क्लाइंट्स मिल गए, और सितंबर में कंपनी औपचारिक रूप से Smart IT Box के नाम से रजिस्टर हुई। पहले साल का रेवेन्यू करीब ₹19 लाख रहा, जो अगले सालों में क्रमशः 37 लाख, 43 लाख और 56 लाख तक पहुंचा — चार साल तक यह सब अकेले संभाला गया, उसके बाद पहला एम्प्लॉई हायर किया गया। ऐसे फाउंडर्स की और भी प्रेरक कहानियां जानने के लिए आप How to Grow Business from India: Lessons from Murtaza Abbas पढ़ सकते हैं, जहां एक और उद्यमी का सफर विस्तार से बताया गया है।
Google Sheet या ERP: छोटे बिजनेस के लिए सही चुनाव कैसे करें
Smart IT Box आज दो तरह की टेक्नोलॉजी पर काम करता है — Google Sheet और MERN स्टैक। शैलेंद्र का साफ सुझाव है कि छोटे बिजनेस पहले Google Sheet पर जाएं, और जब सिस्टम 6 महीने से एक साल तक स्थिर चल जाए, तभी बड़े ERP जैसे सिस्टम की तरफ बढ़ें।
उनके क्लाइंट्स तीन तरह के हैं — एक जिसका बिजनेस चल तो रहा है पर कोई स्ट्रक्चर नहीं, दूसरा जिसने बिजनेस कोचिंग पर 15-20 लाख खर्च कर दिए पर रिजल्ट नहीं मिला, और तीसरा जो बहुत कन्फ्यूज्ड है कि शुरू कहां से करे। दिलचस्प बात यह है कि Google Sheet सिर्फ छोटे बिजनेस का टूल नहीं है।
हमने उन बिजनेसेस को भी ऑटोमेट किया है Google Sheet पर जिनका रेवेन्यू 25-30 लाख है, और उन बिजनेसेस को भी जिनका रेवेन्यू ₹300 करोड़ है।
यानी टूल छोटा या बड़ा नहीं होता, सही फिट मायने रखता है। जो लोग यह जानना चाहते हैं कि स्टार्टअप कैसे शुरू करें, उनके लिए यह सबक काम का है — पहले सिस्टम समझो, फिर खर्च करो।
AI से बना ऐप कब डूबा देता है आपका पैसा
एपिसोड का सबसे चेतावनी भरा हिस्सा AI-जनरेटेड एप्लिकेशन्स को लेकर है। शैलेंद्र एक वाकया बताते हैं जहां एक बिजनेस ओनर ने 6 महीने AI टूल से अपना प्लेटफॉर्म बनाया, लेकिन लाइव होने के बाद जब बदलाव करने थे तो दिक्कत शुरू हुई।
अब उसमें किसी भी दूसरे स्टेप में जाके कुछ चेंजेस करने हैं, अब वो अपने कोड को ही रीड नहीं करता।
एक और उदाहरण में किसी ने AI से पूरी साइट और एप्लिकेशन 2 महीने में बना ली, लेकिन कॉस्ट पूछने पर पता चला कि ₹1 लाख खर्च हो गए — और आउटपुट आखिर में काम का नहीं निकला। शैलेंद्र का सुझाव साफ है: AI प्रॉम्प्टिंग से बनी एप्लिकेशन शुरुआती MVP या टेस्टिंग के लिए ठीक है, पर बिना कोड समझे उसे लाइव प्रोडक्शन में डालना खतरनाक है। MakeMyTrip के AI चैटबॉट से अपनी सीट बदलवाने की कोशिश में 15-20 मिनट बर्बाद होने का अनुभव सुनाते हुए वे कहते हैं कि आखिर में बात इंसान से ही करनी पड़ी — यानी AI अभी भी इंसान का विकल्प नहीं, सिर्फ सहायक है।
फ्रेशर vs एक्सपर्ट: टेक्निकल नॉलेज क्यों मायने रखती है
यहीं से बातचीत एक जरूरी सवाल तक पहुंचती है — क्या AI के दौर में एक्सपीरियंस की जरूरत कम हो गई है? शैलेंद्र का जवाब न में है। उनका मानना है कि प्रॉम्प्टिंग करने वाला अगर एक्सपर्ट है तभी वो जान पाएगा कि कौन-सा कोड सही है और कौन-सा आगे चलकर क्रैश करेगा।
10 गधे पालने से बेटर है दो घोड़े पाल लो।
इसी सोच के साथ उन्होंने अपनी टीम को AI से कॉस्ट-कटिंग के लिए नहीं, बल्कि काम को आसान बनाने के लिए ट्रेन किया — कोडिंग का बोझ कम करने के लिए, पूरी तरह उस पर निर्भर होने के लिए नहीं। उनका तर्क है कि फ्रेशर्स को मौका न देने वाले बिजनेस ओनर्स यह भूल जाते हैं कि एक्सपर्टीज़ कॉलेज में नहीं, प्रैक्टिकल अनुभव से बनती है। जो लोग अपना खुद का उद्यम शुरू करने की सोच रहे हैं, उनके लिए यह एक अहम सबक है कि टीम बनाना एक धीमी, जानबूझकर की गई प्रक्रिया है, शॉर्टकट नहीं।
पर्सनल ब्रांडिंग और सही मानसिकता
शैलेंद्र मानते हैं कि आज का कस्टमर कंपनी के नाम से ज्यादा फाउंडर के चेहरे पर भरोसा करता है। इसी बात को समझाने के लिए वे एक उदाहरण देते हैं।
आज की डेट में स्पेस एक्स पे कोई ट्रस्ट नहीं करता, ईलॉन मस्क पे ट्रस्ट करता है क्योंकि उसका थॉट प्रोसेस डिफरेंट है।
छोटे बिजनेस को पहले प्रोडक्ट और सिस्टम पर फोकस करना चाहिए, और जब लगे कि बिजनेस हाथ से निकल रहा है — यानी ऑफिस में क्या चल रहा है इसका अंदाजा न रहे — तभी तीन-चार डायनामिक Google Sheet मॉडल बनाकर ऑर्डर, इन्वेंटरी और इनवॉइस ट्रैक करना शुरू करना चाहिए। वे यह भी जोड़ते हैं कि अपने हायर किए लोगों पर उतना भरोसा मत करो जितना खुद की एक्सपर्टीज़ पर करना चाहिए — क्योंकि अगर टीम कल छोड़ दे, तो काम रुकना नहीं चाहिए। पॉडकास्ट और बिजनेस कंटेंट से सीखने में दिलचस्पी रखने वालों के लिए Business Podcast Benefits: The Founder’s Dream पर ऐसी ही व्यावहारिक सीख मिलती रहती है।
शैलेंद्र सिंह की यह संघर्ष से सफलता की कहानी बताती है कि टेक्नोलॉजी सिर्फ हाइप का जरिया नहीं, असली समस्या सुलझाने का औजार होनी चाहिए — चाहे वो Google Sheet हो या AI, सही इस्तेमाल तभी होगा जब पीछे की समझ भी मजबूत हो।
होस्ट अभिषेक व्यास के साथ पूरी बातचीत देखिए द फाउंडर्स ड्रीम यूट्यूब चैनल पर, और हर हफ़्ते नए फाउंडर इंटरव्यू के लिए सब्सक्राइब कीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
शैलेंद्र सिंह कौन हैं?
शैलेंद्र सिंह Smart IT Box के फाउंडर हैं, जो बिजनेस प्रोसेस ऑटोमेशन और कस्टम सॉफ्टवेयर सलूशंस बनाते हैं। उन्होंने अपना करियर डाटा एंट्री ऑपरेटर के तौर पर ₹10,000 महीने की सैलरी से शुरू किया था।
Smart IT Box की शुरुआत कैसे हुई?
शैलेंद्र सिंह ने अप्रैल 2020 में कोविड लॉकडाउन के दौरान नौकरी छोड़कर Smart IT Box शुरू की। पहला क्लाइंट ज़ूम मीटिंग में रेफरेंस से मिला और उसी महीने वर्ड ऑफ माउथ से 17 नए क्लाइंट्स जुड़ गए।
Smart IT Box का पहले साल का रेवेन्यू कितना था?
पहले साल में कंपनी का रेवेन्यू लगभग ₹19 लाख रहा, जो दूसरे साल बढ़कर 37 लाख, तीसरे साल 43 लाख और चौथे साल 56 लाख तक पहुंच गया।
क्या AI से बनाया गया ऐप बिजनेस के लिए सुरक्षित है?
एपिसोड में बताया गया है कि AI से बने ऐप्स शुरुआती टेस्टिंग या MVP के लिए ठीक हो सकते हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर लाइव प्रोडक्शन में बिना टेक्निकल एक्सपर्टीज के ये क्रैश होने और भारी नुकसान का जोखिम रखते हैं।
छोटे बिजनेस को Google Sheet या ERP में से क्या चुनना चाहिए?
शैलेंद्र सिंह के मुताबिक छोटे बिजनेस को पहले Google Sheet पर सिस्टम बनाना चाहिए, और जब वो 6 महीने से एक साल तक स्थिर चल जाए तभी ERP जैसे भारी सिस्टम की तरफ बढ़ना चाहिए।


