“हमारी पहचान बताने में तकलीफ होती है कि हम कौन हैं? हमारी जाति क्या है?” — यह सवाल किसी आम आदमी का नहीं, बल्कि एक ऐसे समाज का है जिसकी जड़ें हजारों साल पुरानी हैं, फिर भी सरकारी रिकॉर्ड में उसका कोई नाम नहीं है। द फाउंडर्स ड्रीम के होस्ट अभिषेक व्यास ने इस Mangal Singh Chavan इंटरव्यू में सोशल लीडर और नेशनल प्रेसिडेंट मंगल सिंह चावन से बात की, जिन्होंने आदिवासी समाज की पहचान, पंजीकरण और रूढ़िवादी परंपराओं पर खुलकर चर्चा की। यह संघर्ष से सफलता की कहानी किसी स्टार्टअप या बिजनेस की नहीं, बल्कि एक पूरे समाज को मुख्यधारा से जोड़ने की लड़ाई की है।
Mangal Singh Chavan कौन हैं?
मंगल सिंह चावन खुद को आदिवासी समाज से बताते हैं और सामाजिक सुधार को अपना मिशन मानते हैं। उनका लक्ष्य साफ है — समाज की हजारों साल पुरानी रूढ़िवादी परंपरा को बाजू में रखकर एजुकेशन के जरिए रोटी, कपड़ा और मकान पर “विजय प्राप्त करना”। वे बताते हैं कि उनका समाज बारवा समाज के नाम से जाना जाता है, जिसकी 12 उप-जातियां हैं — मुंगालिया, भटखानिया, डुनाडिया, काठड़िया, मेवातिया, डूंगरपरिया जैसी। इन सबकी रीति-रिवाज और परंपराओं को उन्होंने एक पुस्तिका में दर्ज भी किया है।
पहचान का संकट: क्यों 730 जातियां आज भी अपंजीकृत हैं
मंगल सिंह चावन के मुताबिक आज तक 730 जातियों का केंद्र सरकार में गैजेट पंजीकरण नहीं हुआ है। इसकी वजह वे हजारों साल के घुमंतु जीवन में बताते हैं — हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप के साथ रहे पूर्वज हों या बिरसा मुंडा की लड़ाई, उनका समाज हमेशा जंगल से जुड़ा रहा। समस्या यह है कि एक ही समाज अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है — महाराष्ट्र में चितौड़िया, चौहान, राजपूत या ठाकुर। वे कहते हैं:
“हमारा रोटी व्यवहार एक है। बेटी व्यवहार एक है। फिर भी हमको अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नाम से जाना जाता है।”
जाति का दाखिला लेने जाते ही 1947 से पहले के दस्तावेज़, जन्मपत्री और लिविंग सर्टिफिकेट मांगे जाते हैं — जो किसी के पास नहीं है क्योंकि डिलीवरी हमेशा घर पर ही हुई है, अस्पताल में नहीं। 2018 में मोदी सरकार के दौरान नेशनल कमीशन के तहत 1235 जातियों को गैजेट में जोड़ा गया था, लेकिन मंगल सिंह चावन मानते हैं कि अभी भी कई छोटी जातियों का सर्वे और पंजीकरण बाकी है।
रूढ़िवादी परंपराएं: ओलाख और बहू-बेटी का भेद
इस बातचीत का सबसे चुभने वाला हिस्सा ओलाख प्रथा का जिक्र है। मंगल सिंह चावन अपनी खुद की शादी का किस्सा सुनाते हैं, जब उनकी पत्नी की एक थाली से ठोकर लगने पर उसे फेंकने को कहा गया। उनके मुताबिक अगर किसी घर में औरत का लहंगा या साबुन किसी झगड़े में फेंक दिया जाए, तो पूरा घर “अछूत” मान लिया जाता है और घर में रखा सारा सामान — कपड़े, बर्तन, सब कुछ — फेंककर नया लाना पड़ता है। रोज की मजदूरी पर जीने वाले परिवार के लिए यह आर्थिक बोझ बहुत बड़ा है।
इसी तरह बेटी के हाथ का खाना मंजूर है, लेकिन बहू के हाथ का नहीं। मंगल सिंह चावन खुद इसे झेलते हैं — रिश्तेदारों के घर जाकर भी उन्हें खुद रोटी बनानी पड़ती है। वे मानते हैं कि अकेले अपने घर में यह परंपरा तोड़ने से समाज में बदनामी होगी, क्योंकि बच्चों की शादी समाज में ही करनी है। इसीलिए वे सामूहिक बदलाव की बात करते हैं, न कि व्यक्तिगत विद्रोह की।
प्रेम विवाह, अफवाह और पंचायत का न्याय
अगर कोई मां-बाप की मर्जी के खिलाफ शादी करता है, तो उसे पांच साल तक समाज में प्रवेश नहीं मिलता। वापसी के लिए पंच कमेटी को खाना खिलाना, गौ को चारा खिलाना, काशी विश्वनाथ जाकर दर्शन करना जैसी महंगी प्रक्रियाएं पूरी करनी पड़ती हैं — जो गरीब परिवार के लिए संभव ही नहीं। एक्सीडेंटल मौत पर मिलने वाला सरकारी मुआवजा लेने वाले को “हत्यारा” करार दिया जाता है, जिसके चलते कई परिवार मुआवजा लेने से ही मना कर देते हैं। मंगल सिंह चावन एक घटना याद करते हैं जहां उनके परिवार में ही यह हुआ था और बुजुर्गों ने इंश्योरेंस क्लेम नहीं लेने दिया।
झूठी अफवाहों का मुद्दा भी गंभीर है — किसी लड़की का वीडियो बनाकर व्हाट्सएप ग्रुप में डालकर बदनाम करना आम बात हो गई है, जिसकी सफाई में सालों लग जाते हैं। वे कहते हैं:
“समाज बनता ही क्यों है? दूसरों की मदद करने के लिए। समाज के लोग ही समाज के लोगों को काटेंगे तो समाज का उत्थान कैसे होगा?”
बेटियों की शिक्षा और संघर्ष से सफलता की कहानी का असली मकसद
पूरी बातचीत की जड़ में एक ही बात बार-बार लौटती है — बेटियों की पढ़ाई। मंगल सिंह चावन साफ कहते हैं:
“बेटियों को स्कूल पढ़ाना हमारे समाज में बहुत गुनाह है… अगर हम इस पीरियड में भी हजारों वर्षों की सोच लेके जिएंगे तो हमारी बेटी नहीं पढ़ेंगी तो घर कैसे डेवलप होगा साहब?”
उनके लिए यही Mangal Singh Chavan की सफलता की कहानी का केंद्र है — जब तक सोच नहीं बदलेगी, पंजीकरण और सरकारी मदद मिलने के बाद भी समाज आगे नहीं बढ़ पाएगा। वे यह भी मानते हैं कि मां-बाप की सेवा न करने वाले को संपत्ति से वंचित करने जैसी कुछ परंपराएं सही हैं, लेकिन ओलाख या बहू-बेटी के भेद जैसी परंपराएं बदलनी ही होंगी।
सरकार से उम्मीद और आगे का रास्ता
मंगल सिंह चावन केंद्र सरकार को दोषी नहीं मानते, बल्कि कहते हैं कि अब तक समाज से कोई सामाजिक कार्यकर्ता आगे आया ही नहीं था। वे चाहते हैं कि सरकार बिना पुराने जन्म दस्तावेज़ की शर्त के पूरे समाज का सर्वे कर पंजीकरण करे, क्योंकि घर पर डिलीवरी होने की वजह से यह दस्तावेज़ कभी बने ही नहीं। साथ ही वे रहने के लिए घर, जाति के दाखिले और सरकारी नौकरी में मदद की मांग करते हैं ताकि अगली पीढ़ी बेरोजगारी के चक्र से बाहर निकल सके।
उनकी यह पूरी जर्नी बताती है कि सामाजिक बदलाव की लड़ाई कितनी धीमी और थकाने वाली होती है, लेकिन यही असली सेल्फ ग्रोथ की मिसाल है — खुद को बदलना, फिर समाज को। जो लोग ऐसी ही संघर्ष और सामाजिक बदलाव की और उद्यमियों की कहानियाँ पढ़ना चाहते हैं, उनके लिए यह एपिसोड एक जरूरी नजरिया देता है कि असली बदलाव सिर्फ पैसे से नहीं, सोच से शुरू होता है।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
मंगल सिंह चावन कौन हैं?
मंगल सिंह चावन एक सोशल लीडर, नेशनल प्रेसिडेंट और सोशल रिफॉर्मर हैं जो आदिवासी समाज की पहचान, पंजीकरण और बेटियों की शिक्षा के लिए काम करते हैं।
आदिवासी समाज को सरकारी पहचान क्यों नहीं मिली है?
मंगल सिंह चावन के अनुसार 730 जातियों का आज तक केंद्र सरकार में गैजेट पंजीकरण नहीं हुआ है, क्योंकि समाज का बड़ा हिस्सा सदियों से जंगलों में घुमंतु जीवन जीता रहा है और उनके पास 1947 से पहले के दस्तावेज़ नहीं हैं।
ओलाख प्रथा क्या है?
ओलाख एक रूढ़िवादी परंपरा है जिसमें किसी महिला के किसी वस्तु से टकरा जाने, झगड़े में किसी का लहंगा घर पर फेंक दिए जाने या ऐसी ही घटनाओं पर घर और उसमें रखा सामान अछूत माना जाकर फेंक दिया जाता है।
मंगल सिंह चावन के समाज में बेटियों की शिक्षा की क्या स्थिति है?
मंगल सिंह चावन बताते हैं कि उनके समाज में बेटियों को स्कूल भेजना गुनाह माना जाता है और ऐसा करने वालों को जात से बाहर करने की धमकी दी जाती है, जिसे वे बदलना चाहते हैं।
सरकार से मंगल सिंह चावन की क्या मांग है?
वे चाहते हैं कि सरकार सर्वे करके आदिवासी समाज की सभी छोटी जातियों का पंजीकरण करे, बिना पुराने जन्म दस्तावेज़ों की शर्त के, ताकि बच्चों को शिक्षा और सरकारी नौकरी मिल सके।


