एक आर्किटेक्चर स्टूडेंट पाँच साल डिज़ाइन सीखता है, दो साल मास्टर्स करता है, और बाहर निकलकर पहली जॉब ऑफर ₹35,000 की मिलती है। यहीं से अक्षय बंसल की संघर्ष से सफलता की कहानी शुरू होती है — एक ऐसी कहानी जिसमें टैलेंट था, लेकिन बिजनेस की समझ मार्केट में आकर बनी। The Founder’s Dream पॉडकास्ट पर होस्ट अभिषेक व्यास के साथ बातचीत में आर्किटेक्ट और एंटरप्रेन्योर अक्षय बंसल ने बताया कि कैसे उन्होंने डिज़ाइन स्टूडियो के सोच से निकलकर एक स्केलेबल कंपनी, द डिज़ाइनप्रेन्योर कलेक्टिव, खड़ी की।
अक्षय बंसल की संघर्ष से सफलता की कहानी शुरू कैसे हुई
अक्षय की फैमिली तीन जनरेशन से बिजनेस में है, लेकिन पैसा हमेशा साथ नहीं रहा। 2016 की डीमोनेटाइजेशन के दौरान उनकी फैमिली को भारी फाइनेंशियल नुकसान हुआ, और उसी समय वे अपने होमटाउन आगरा से गुड़गांव शिफ्ट हुए — एक नया शहर, कोई नाम नहीं, ज्यादा पैसे भी नहीं।
उस दौर में उन्होंने अपना मास्टर्स खुद स्पॉन्सर किया। वे एक साथ तीन-चार जॉब्स करते थे — कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर पढ़ाना, फ्रीलांस डिज़ाइन वर्क, और हफ्ते में एक दिन टीचिंग। 2018 में उन्होंने एक स्टार्टअप जॉइन किया, यह सोचकर कि कुछ साल जॉब करेंगे फिर अपना कुछ शुरू करेंगे। फिर कोविड आया, और उसी समय ने उन्हें चीज़ों को ठहरकर सोचने का मौका दिया।
पढ़ाई में डिज़ाइनर बने, बिजनेस मार्केट में सीखा
अक्षय मानते हैं कि आर्किटेक्चर की पढ़ाई ने उन्हें एक अच्छा डिज़ाइनर तो बनाया, लेकिन बिजनेस की असली समझ कहीं और से आई।
जो मैंने पढ़ा उसने मुझे एक अच्छा डिजाइनर तो बनाया लेकिन अच्छा बिजनेसमैन नहीं बनाया। वो अच्छा बिजनेसमैन वाला जो डेफिनेशन है ना वो मुझे मार्केट में आके पता चला।
डेढ़ साल एक हार्डकोर स्टार्टअप में काम करने के दौरान उन्हें सेल्स, मार्केटिंग, फाइनेंस, कॉन्ट्रैक्ट्स, लीगल्स और टैक्सेशन जैसी चीज़ों की हकीकत पता चली — ऐसी चीज़ें जो पढ़ाई के दौरान कभी सिखाई ही नहीं गईं। यही अनुभव बाद में उनकी किताब की नींव बना, जिसमें उन्होंने नीश चुनने से लेकर सेल्स-मार्केटिंग-फाइनेंस तक, 15 चैप्टर्स में अपने छह साल के अनुभव लिखे हैं।
आर्किटेक्चर इंटर्न्स के शोषण और इंडस्ट्री की सच्चाई
अक्षय इस बात को साफ कहते हैं कि आर्किटेक्चर इंडस्ट्री का रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट दूसरी इंडस्ट्रीज़ जैसा तुरंत नहीं मिलता। जहां एक अच्छे टेक कॉलेज से निकलते ही ऑन-कैंपस पैकेज मिल जाता है, वहीं आर्किटेक्चर में स्किल न हो तो कोई ₹5,000 भी नहीं देता।
इस इंडस्ट्री में इंटर्न्स को फ्री में रखा जाता है। आज भी बहुत सारी ऐसी सिटीज हैं जहां इंटर्न्स सिर्फ लर्निंग के लिए फ्री में काम करते हैं।
उनके मुताबिक उनके अपने बैच में सिर्फ 30% लोग ही आर्किटेक्ट के तौर पर काम कर रहे हैं, बाकी 70% बिल्डर, प्रॉपर्टी कंसलटेंट या किसी और फील्ड में चले गए। उनके पास बचते हैं तीन रास्ते — एकेडमिक्स में जाना, किसी स्टूडियो के साथ एक्सपर्टीज बढ़ाना, या अपना स्टूडियो शुरू करना। तीसरा रास्ता सबसे मुश्किल है क्योंकि स्टूडियो ओनर्स अक्सर अपने फंडामेंटल्स किसी के साथ शेयर ही नहीं करते।
यही गैप है जो CoA के आंकड़े भी दिखाते हैं
काउंसिल ऑफ आर्किटेक्चर, जो 1972 से लाइसेंस देने वाली गवर्निंग बॉडी है, ने पिछले कुछ सालों में 75 कॉलेज बंद किए हैं और पिछले दो साल में 12 कॉलेजों को सीट्स कम होने के कारण अनफिट घोषित किया है। अक्षय के लिए यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, उनका अपना पेन पॉइंट है — जिस स्कूल से वे पास आउट हुए, वह भी बंद हो चुका है।
स्टूडियो माइंडसेट से डिज़ाइनप्रेन्योर तक: बिजनेस आइडिया जो स्केल करता है
अक्षय का मानना है कि इंडिया को डिज़ाइनर्स नहीं, डिज़ाइन प्लेनर्स चाहिए। एक ट्रेडिशनल आर्किटेक्ट सिर्फ बिल्डिंग बनाता है, लेकिन डिज़ाइनप्रेन्योर अपनी कंपनी को इस तरह सिस्टम में ढालता है कि वह फाउंडर के बिना भी चल सके — जैसे नॉर्मन फॉस्टर या ज़ाहा हदीद जैसी फर्म्स, या इंडिया में हफीज़ कॉन्ट्रैक्टर, जिन्होंने गुड़गांव के बड़े हिस्से को आकार दिया।
डिज़ाइनर सिर्फ बिल्डिंग नहीं बना रहा है। डिज़ाइनर एक ब्रांड दे रहा है एक पूरे शहर को, एक पूरी कंट्री को।
यहीं से वे मुंबई 3.0 का उदाहरण देते हैं — अगर किसी मेगा प्रोजेक्ट को सिंगापुर की कंपनी को सौंप दिया जाए, तो सवाल उठता है कि क्या इंडिया में टैलेंट नहीं है।
इंडिया में टैलेंट है बॉस। इंडिया में बहुत टैलेंट है। बट इंडिया में टैलेंट जो है ना वो गिने-चुने लोगों पर है।
वे चंडीगढ़ का उदाहरण देते हैं, जहां नेहरू के सपने को एक फ्रेंच आर्किटेक्ट ने आकार दिया क्योंकि उस स्केल की एक्सपर्टीज बाहर टेस्टेड थी। उनका तर्क है कि अगर ज्यादा आर्किटेक्ट्स स्टूडियो माइंडसेट से निकलकर बिजनेस माइंडसेट में आएं, तो इंडिया के पास भी मेगा प्रोजेक्ट्स संभालने लायक कंपनियां होंगी।
रिटेल एक्सपेंशन और स्टैंडर्डाइजेशन का गणित
अपनी कंपनी की शुरुआत अक्षय ने रिटेल और B2B सेगमेंट से की — ठीक कोविड के बाद, जब दुकानें बंद थीं और यह सेगमेंट सबसे ज्यादा दबाव में था। उनका हाइपोथेसिस था कि रिटेल ही आगे बूम करेगा, और शुगर कॉस्मेटिक्स, Lenskart जैसे ब्रांड्स के ऑनलाइन से ऑफलाइन आने ने इसे सही साबित किया।
रिटेल में सबसे बड़ा चैलेंज टाइम है — ब्रांड्स को स्टोर 30, 60 या ज्यादा से ज्यादा 90 दिन में चाहिए होता है। अक्षय की टीम प्रोजेक्ट्स 30 दिन में डिलीवर करती है, जिससे क्लाइंट का रेंट बचता है और उनकी फीस उसी बचत से निकल आती है। वे बताते हैं कि 60 दिन में 20% मार्जिन और 30 दिन में 10% मार्जिन लगभग बराबर है, क्योंकि कम समय में दो प्रोजेक्ट करने पर मार्जिन कंपाउंड हो जाता है।
नए फाउंडर्स के लिए सबक: नीश, पोज़िशनिंग और AI
अक्षय का सुझाव साफ है — कोई भी उद्यमी अपनी नीश और पोज़िशनिंग जितनी जल्दी क्लियर कर ले, उतना अच्छा। सिर्फ “इंटीरियर डिज़ाइनर” होना काफी नहीं, बल्कि “₹50 लाख से ऊपर के रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट्स करने वाला डिज़ाइनर, सिर्फ एंटरप्रेन्योर्स के लिए” — यह पोज़िशनिंग कॉम्पिटिशन को पीछे छोड़ देती है।
- अपना आइडियल कस्टमर प्रोफाइल साफ रखें — क्लाइंट कौन है, उसका पेन पॉइंट क्या है।
- पैशन को कंट्रोल में रखें — अक्षय मानते हैं कि पैशन-ड्रिवन बिजनेस हमेशा प्रॉफिटेबल नहीं होते।
- लीडरशिप टीम में एक्सपर्ट्स हायर करें, हर काम खुद मत करें।
- AI को कॉम्पिटिटर नहीं, को-फाउंडर की तरह इस्तेमाल करें — वह कॉन्सेप्ट विज़ुअलाइज़ करने और प्रोसेस बनाने में मदद करता है, लेकिन प्रोफेशनल का अनुभव नहीं ले सकता।
अगर आप भी किसी बिजनेस आइडिया पर सोच रहे हैं और अपनी फाउंडर की जर्नी को लेकर यह तय नहीं कर पा रहे कि अकेले आगे बढ़ें या किसी के साथ मिलकर, तो ऐसी कई भारतीय उद्यमी की कहानी से प्रेरणा ली जा सकती है जिन्होंने यही सवाल झेला है। और अगर खुद को बेहतर बनाने, नए स्किल्स सीखने और ग्रोथ माइंडसेट पर काम करने में दिलचस्पी है, तो सेल्फ-ग्रोथ से जुड़ी स्टोरीज़ भी पढ़ने लायक हैं, क्योंकि अक्षय की तरह कई फाउंडर्स का शुरुआती सपोर्ट नेटवर्क और मेंटर्स से ही आता है।
आर्किटेक्ट्स को डॉक्टर और वकील जैसी पहचान क्यों चाहिए
अक्षय का एक सीधा सवाल है — हम एक आर्किटेक्ट को डॉक्टर या वकील की तरह क्यों नहीं देखते, जो सिर्फ सलाह देने के पैसे लेता है? उनका उदाहरण है दिल्ली में गिरी एक पांच मंज़िला PG बिल्डिंग, जो बिना फ्रेम स्ट्रक्चर के सिर्फ ईंटों पर खड़ी थी। उनके मुताबिक सही डिज़ाइन और आर्किटेक्ट की सलाह पैसा, समय और कई बार जान तक बचा सकती है।
वे दुबई का उदाहरण देते हैं — जब तेल की सप्लाई सीमित दिखी, तो दुबई ने टूरिज़्म और डिज़ाइन पर दांव लगाया, और आज बुर्ज खलीफा, बुर्ज अल अरब और दुबई मॉल जैसी पहचान बना चुका है। अक्षय का कहना है कि आर्किटेक्ट्स सिर्फ स्पेस नहीं, बल्कि इकोनॉमिक ब्रांडिंग बनाते हैं।
अपने मिशन के बारे में वे कहते हैं कि वे अब अपनी फ्रटर्निटी को वापस कुछ देना चाहते हैं — ऑन-कैंपस प्लेसमेंट बनाना, यंग प्रोफेशनल्स को बिजनेस साइड सिखाना, और इंडस्ट्री के बारे में जागरूकता फैलाना। यह अक्षय बंसल की संघर्ष से सफलता की कहानी का वह हिस्सा है, जहां निजी ग्रोथ, कम्युनिटी के लिए जिम्मेदारी में बदलती है।
होस्ट अभिषेक व्यास के साथ यह पूरा Akshay Bansal इंटरव्यू देखिए द फाउंडर्स ड्रीम यूट्यूब चैनल पर, और हर हफ़्ते नए फाउंडर इंटरव्यू के लिए सब्सक्राइब कीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
अक्षय बंसल कौन हैं?
अक्षय बंसल एक आर्किटेक्ट और एंटरप्रेन्योर हैं जिन्होंने द डिज़ाइनप्रेन्योर कलेक्टिव नाम की कंपनी बनाई है और रिटेल व होम इंटीरियर प्रोजेक्ट्स पर काम करते हैं।
अक्षय बंसल ने अपना बिजनेस कितने पैसों से शुरू किया था?
अक्षय बंसल ने अपनी पहली कंपनी एडिकॉन सिर्फ ₹5000 से शुरू की थी, उससे पहले वे कई जॉब्स और फ्रीलांसिंग कर रहे थे।
आर्किटेक्चर इंडस्ट्री में इंटर्न्स को लेकर क्या समस्या बताई गई है?
अक्षय बंसल के मुताबिक कई शहरों में आर्किटेक्चर इंटर्न्स को सिर्फ लर्निंग के नाम पर फ्री में काम कराया जाता है, जिससे इंडस्ट्री में फ्रेश टैलेंट का शोषण होता है।
डिज़ाइनप्रेन्योर और ट्रेडिशनल आर्किटेक्ट में क्या फर्क है?
ट्रेडिशनल आर्किटेक्ट सिर्फ बिल्डिंग और स्पेस बनाता है, जबकि डिज़ाइनप्रेन्योर स्केलेबिलिटी पर फोकस करता है ताकि कंपनी फाउंडर के बिना भी चल सके।
अक्षय बंसल की कंपनी ने अब तक कहां-कहां प्रोजेक्ट्स किए हैं?
अक्षय बंसल की कंपनी ने कश्मीर से लेकर कोची तक, और मुंबई, बेंगलुरु सहित कई शहरों में रिटेल व इंटीरियर प्रोजेक्ट्स पूरे किए हैं।



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