क्या श्रीनगर या मैसूर का कोई लड़का-लड़की बेंगलुरु में बैठे इंजीनियर जितना ही सक्षम हो सकता है? यह सवाल इस एपिसोड की जड़ में है। The Founder’s Dream नाम के इस बिजनेस पॉडकास्ट हिंदी एपिसोड में होस्ट अभिषेक व्यास ने SSGServ के फाउंडर और सीईओ Faizan Kanth से बात की, जो खुद श्रीनगर से बेंगलुरु आए एक उद्यमी हैं और पिछले 11 साल से Global Capability Centre (GCC) मॉडल पर काम कर रहे हैं।
यह बातचीत सिर्फ एक बिजनेस मॉडल की नहीं है, यह टियर 2 और टियर 3 शहरों में छुपे टैलेंट, बिना फंडिंग के बिजनेस खड़ा करने और एक उद्यमी के तौर पर मिली हार्ड लेसन्स की भी कहानी है।
Faizan Kanth: एक उद्यमी की SSGServ शुरू करने की कहानी
Faizan Kanth मूल रूप से श्रीनगर से हैं और पिछले 26 साल से बेंगलुरु में हैं। उन्होंने 37 ग्लोबल प्रोडक्ट्स पर काम करने के बाद 2015 में अपनी वेल-पेइंग जॉब छोड़कर SSGServ की शुरुआत की। आज उनकी कंपनी 50 से ज्यादा ब्रांड्स के साथ काम करती है और GCC इनेबलर के तौर पर काम करती है।
सीधी भाषा में समझें तो, अगर कोई अमेरिका बेस्ड कंपनी भारत में अपना ऑफिस खोलना चाहती है, तो उस ऑफिस को सपोर्ट करने के लिए जिस पार्टनर की जरूरत होती है, वह काम SSGServ करती है।
2015 में बिजनेस शुरू करना क्यों था “बहुत जल्दी”
Faizan मानते हैं कि उन्होंने अपना बिजनेस बहुत जल्दी शुरू कर दिया था, और जो लोग यह सोचते हैं कि स्टार्टअप कैसे शुरू करें, उनके लिए उनका यह अनुभव एक जरूरी सबक है। उस समय GCC का कांसेप्ट किसी को समझ ही नहीं आता था। पहले क्लाइंट्स से बात करते वक्त सबसे बड़ी दिक्कत यही थी कि उनके पास कोई प्रूफ ऑफ कांसेप्ट नहीं था।
“हर कोने में सरप्राइज़ होते हैं। हमें हर कर्व बॉल झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए। आप कभी रिलैक्स नहीं हो सकते कि आज दिन अच्छा गया, क्योंकि अगली सुबह कोई नई चुनौती खड़ी हो सकती है।”
पहले छह महीनों में ही उन्हें अपना पहला क्लाइंट मिल गया — एक 20 मेंबर की टीम वाला BOT (Build-Operate-Transfer) मॉडल, जिसकी वैल्यू तब करीब 8-9 लाख रुपये महीना थी। दिलचस्प बात यह है कि वह क्लाइंट आज भी उनके साथ है।
ट्रेडिशनल BPO बनाम GCC बनाम Micro GCC
इस एपिसोड का सबसे जरूरी हिस्सा यही फर्क समझना है। ट्रेडिशनल BPO सिर्फ कॉस्ट आर्बिट्रेज पर टिका होता है — कितना वॉल्यूम है, उसके लिए कितने लोग चाहिए, बस इतना ही हिसाब। GCC मॉडल में कंपनी सिर्फ वर्कफोर्स नहीं बल्कि पूरी कैपेबिलिटी को ओन करती है।
“बीपीओ में आपको 10,000 कॉल्स आ सकते हैं और वे आते रहेंगे। जीसीसी में हम आपको बता सकते हैं कि कितने कॉल्स रिपीट हो रहे हैं और कैसे हम कस्टमर सर्विस को एनहांस कर पाएंगे।”
Micro GCC मॉडल इसी आइडिया को छोटी कंपनियों तक ले जाता है। पहले GCC सिर्फ उन कंपनियों के लिए था जो 500 मिलियन से 1 बिलियन डॉलर रेवेन्यू करती थीं। Faizan की टीम अब 5 मिलियन से 500 मिलियन डॉलर रेवेन्यू वाली MSME और SME कंपनियों को यह सुविधा देती है — उन्हें 500 मेंबर टीम नहीं चाहिए, 20-30-40 मेंबर की टीम भी Micro GCC के तहत डिलीवर हो सकती है।
अगर आप B2B क्लाइंट्स के साथ इसी तरह भरोसा बनाना चाहते हैं, तो B2B लीड्स जनरेट करने की इस गाइड में प्रैक्टिकल तरीके मिलेंगे जो पॉडकास्ट और कंटेंट के जरिए क्रेडिबिलिटी बनाने पर केंद्रित हैं।
टियर 2-3 शहरों का टैलेंट: असली मौका कहां है
Faizan का मानना है कि ग्लोबल कंपनियां पहले सिर्फ कॉस्ट के लिए भारत आती थीं, लेकिन अब वजह बदल चुकी है।
“पहले क्या होता था, 10 साल पहले यह मोस्टली कॉस्ट था। अभी करेंटली यह मेनली टैलेंट है — वह अनटैप्ड टैलेंट जो इंडिया के पास है, चाहे वो इंजीनियरिंग में हो या बैक ऑफिस में।”
SSGServ का सबसे इंटरेस्टिंग एग्जांपल सऊदी अरेबिया के एक बड़े बिल्डर के साथ है, जो हॉस्पिटल और शॉपिंग मॉल बनाता है। जब उन्होंने भारत के ऑटोकैड और BIM इंजीनियर्स को चाइना और इजिप्ट के इंजीनियर्स के मुकाबले कॉम्पिटेंसी बेंचमार्किंग डेटा दिखाया, तो उस कंपनी के CEO ने खुद कहा कि उन्हें नहीं पता था भारत के पास इतनी शानदार इंजीनियरिंग टीम है।
यहीं पर Faizan एक बड़ा सवाल उठाते हैं — क्या श्रीनगर, मैसूर या किसी भी टियर 2-3 शहर का टैलेंट ट्रेनेबल है?
“यहां पे आप देख लें, बैंगलोर में देख लें, बॉम्बे में देख लें, किसी भी बड़ी फर्म में देख लें, और एक सेग्रगेशन कर दीजिए कि टियर 2 सिटी से कितने हैं और टियर 1 सिटी से कितने हैं — यहां पे भी तो वही लड़के लड़कियां हैं। तो जब वहां की बात आती है तो हम लोग क्यों ऐसा सोचते हैं?”
उनका मानना है कि फर्क टैलेंट में नहीं, ट्रेनिंग और मौके में है। बेंगलुरु में किसी ग्रेजुएट से सीधे काम की उम्मीद नहीं की जाती, उसे पहले ट्रेन किया जाता है। यही सिस्टम बाकी शहरों में भी अपनाने की जरूरत है। कर्नाटका सरकार के GCC पैनल के मुताबिक, 2029 तक कर्नाटका में करीब 50 और GCC आ सकते हैं, जो 3.5 लाख नई नौकरियां और 20 बिलियन डॉलर से ज्यादा का योगदान दे सकते हैं।
बिना फंडिंग, बिना पर्सनल ब्रांडिंग के 11 साल
SSGServ पूरी तरह बूटस्ट्रैप्ड है — कोई बाहरी फंडिंग नहीं ली गई। पिछले 11 साल में से 9 साल तक Faizan ने कोई पर्सनल ब्रांडिंग भी नहीं की।
“ऑनेस्टली, हम कोई ब्रांडिंग नहीं कर रहे थे लगभग नौ महीने पहले तक। पिछले 11 सालों में हम कांसेप्ट प्रूव करना चाहते थे, और अब हम अपने ब्रांड को खुलकर दिखाना चाहते हैं।”
वे मानते हैं कि अगर आज कोई 2026 में बिजनेस शुरू कर रहा है, तो पर्सनल ब्रांडिंग बिजनेस से पहले शुरू करनी चाहिए, वरना कुछ साल बाद फिर वही सवाल सामने आएगा। इसी सोच पर पॉडकास्ट के जरिए फाउंडर अथॉरिटी बनाने की यह गाइड गहराई से बात करती है कि क्यों एक फाउंडर की अपनी पहचान बिजनेस की क्रेडिबिलिटी से जुड़ जाती है।
सेल्स को लेकर उनकी राय साफ है — ऑपरेशन, फाइनेंस, सब कुछ सीखा जा सकता है, लेकिन सेल्स अंदर से आना चाहिए। उनके मुताबिक उन्हें आज तक कोई ऐसी किताब नहीं मिली जो सेल्स सिखा सके। इसी वजह से एक फाउंडर को सेल्स कभी पूरी तरह छोड़नी नहीं चाहिए।
रैपिड फायर से कुछ सीधी बातें
- फाउंडर का ईगो हमेशा एक लायबिलिटी है, एसेट नहीं।
- कॉर्पोरेट लाइफ में पैसा खोना रिकवर हो सकता है, लेकिन भरोसा खोना मुश्किल है।
- हायरिंग में टैलेंट से ज्यादा एटीट्यूड मायने रखता है।
- AI सिर्फ एक थ्रेट नहीं, एक वेकअप कॉल है।
AI का असर और आगे की राह
जब सवाल आता है कि GCC और Micro GCC मॉडल AI से कैसे बचेंगे, तो Faizan का जवाब बहुत ईमानदार है — इससे कोई पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। लेकिन उनका एक हल जरूर है।
“इसका तोड़ मैंने इतना ही सोचा है कि हमारे एंप्लॉईज को वैल्यू चेन के ऊपर रखना है। अगर अभी काम ईमेल लिखना है, तो उन्हें इस पर लाना है कि ईमेल को डिज़ाइन कैसे करना है, कंपोज करने के लिए कौन-कौन से टूल्स हैं — क्योंकि ईमेल तो अब AI भी लिख देगा।”
वे यह भी साफ करते हैं कि आईटी कंपनियां GCC की वजह से सिकुड़ नहीं रही हैं, बल्कि कई कंपनियां अभी भारत में अपना मॉडल टेस्ट कर रही हैं कि किस स्केल पर ऑपरेट किया जा सकता है।
अगले पांच साल में Faizan चाहते हैं कि SSGServ हर उस कंपनी का पहला नाम बने जो 5 मिलियन से 500 मिलियन डॉलर के बीच है और भारत में ऑपरेट करना चाहती है। उनकी निजी ख्वाहिश और भी बड़ी है — बेंगलुरु जितनी ग्रोथ स्टोरी श्रीनगर और मैसूर जैसे शहरों में भी दोहराई जाए।
यह भारतीय उद्यमी की कहानी इस बात की मिसाल है कि एक सही उद्यमी बाजार में भरोसा खुद क्लाइंट के ब्रांड के पीछे खड़े होकर भी बना सकता है, बिना स्पॉटलाइट के भी। अगर आप खुद एक फाउंडर की जर्नी शुरू करने की सोच रहे हैं, तो Faizan की यह सफलता की कहानी बताती है कि कैपेबिलिटी ही सबसे बड़ी मार्केटिंग है।
होस्ट अभिषेक व्यास के साथ पूरी बातचीत देखिए द फाउंडर्स ड्रीम यूट्यूब चैनल पर, और हर हफ़्ते नए फाउंडर इंटरव्यू के लिए सब्सक्राइब कीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Faizan Kanth कौन हैं?
Faizan Kanth SSGServ के फाउंडर और सीईओ हैं, जो श्रीनगर से बेंगलुरु आकर पिछले 11 साल से GCC और Micro GCC मॉडल पर काम कर रहे हैं और 50 से ज्यादा ब्रांड्स को सर्विस देते हैं।
GCC और ट्रेडिशनल BPO में क्या फर्क है?
ट्रेडिशनल BPO सिर्फ कॉस्ट आर्बिट्रेज और वॉल्यूम पर चलता है, जबकि GCC मॉडल में कंपनी अपनी पूरी टीम, कैपेबिलिटी और वर्क कल्चर को ओन करती है, यह सिर्फ आउटसोर्सिंग नहीं बल्कि कंपनी की अपनी एक्सटेंशन टीम है।
Micro GCC मॉडल किसके लिए बना है?
Micro GCC मॉडल खासतौर पर 5 मिलियन से 500 मिलियन डॉलर रेवेन्यू वाली MSME और SME कंपनियों के लिए बनाया गया है, जिन्हें पहले सिर्फ 500 मिलियन डॉलर से ऊपर की बड़ी कंपनियों जितना बड़ा होना पड़ता था।
क्या टियर 2 और टियर 3 शहरों का टैलेंट बेंगलुरु जितना सक्षम है?
Faizan Kanth के अनुसार श्रीनगर, मैसूर जैसे शहरों का टैलेंट ट्रेनेबल है और सही मौका मिलने पर बेंगलुरु के बराबर डिलीवर कर सकता है, फर्क सिर्फ अवसर और ट्रेनिंग सिस्टम का है।
AI से GCC जॉब्स पर क्या असर पड़ेगा?
Faizan Kanth मानते हैं कि AI से कुछ प्रोसेस जरूर प्रभावित होंगे, लेकिन बचाव का तरीका यह है कि एंप्लॉई को वैल्यू चेन में ऊपर ले जाया जाए ताकि वे सिर्फ बेसिक काम नहीं बल्कि उससे ऊपर की स्किल्स पर काम करें।


