भारत में हर साल करीब 20 लाख स्ट्रोक के मामले रिपोर्ट होते हैं, लेकिन इलाज सिर्फ 300 के आसपास मरीजों तक पहुंच पाता है। यह भारतीय उद्यमी की कहानी है पीयूष कगदड़ा की, जिन्होंने इस गैप को देखकर न्यूरोवस्कुलर मेडिकल डिवाइस बनाने का रास्ता चुना। होस्ट अभिषेक व्यास के साथ द फाउंडर्स ड्रीम पॉडकास्ट पर हुई इस बातचीत में पीयूष ने स्ट्रोक, गोल्डन आवर्स और भारत के मेडिकल डिवाइस इकोसिस्टम की असली तस्वीर खोलकर रखी।
भारतीय उद्यमी की कहानी: एक्सीडेंटल फार्मासिस्ट से न्यूरो इनोवेटर तक
पीयूष की शुरुआत बिल्कुल अलग रास्ते से हुई थी। वो कंप्यूटर इंजीनियर बनना चाहते थे, लेकिन अच्छे कॉलेज में एडमिशन नहीं मिला। मेंटर्स की सलाह पर उन्होंने फार्मेसी चुनी, जहां जल्दी ही पता चला कि केमिकल्स से उन्हें एलर्जी है।
आई एम अ एक्सीडेंटल फार्मासिस्ट। आई नेवर वांट टू बी अ फार्मासिस्ट।
यहीं से उनका रुख मेडिकल डिवाइस सेक्टर की तरफ मुड़ा, और पहली ही नौकरी में उन्हें इंटरवेंशन थेरेपी से जुड़ा काम मिला। पिछले 18 साल से वो इसी न्यूरो स्पेस में काम कर रहे हैं। उनका मानना है कि एक बार कोई न्यूरो फील्ड में आ जाए तो हर केस, हर चुनौती इतनी गहराई से जोड़ती है कि कोई और रास्ता आकर्षक नहीं लगता।
स्ट्रोक को समझना: टाइम इज ब्रेन
स्ट्रोक में ब्रेन के किसी हिस्से तक खून की सप्लाई रुक जाती है, या तो क्लॉट की वजह से या एथेरोस्क्लेरोसिस की वजह से। जिस हिस्से में सप्लाई बंद होती है, उसके टिश्यू मरना शुरू हो जाते हैं। पीयूष इसे मेडिकल भाषा में समझाते हैं कि पहले टिश्यू डीऑक्सीजनेटेड स्टेट में जाता है जिसे पेनुमरा कहते हैं, और समय पर इलाज न मिले तो यह परमानेंट डैमेज यानी इंफार्क्ट बन जाता है।
हम स्ट्रोक में बोलते हैं टाइम इज ब्रेन। जितना हो सके उतना जल्दी इलाज हो।
ब्रेन का डैमेज दूसरे ऑर्गन्स की तरह ठीक नहीं होता, यह नॉन-रिवर्सिबल होता है। लेकिन अगर 24 घंटे के भीतर सही इलाज मिल जाए तो मरीज के सामान्य जीवन में लौटने के बहुत अच्छे चांस होते हैं। लेफ्ट ब्रेन शरीर के राइट साइड को कंट्रोल करता है और राइट ब्रेन लेफ्ट साइड को, इसलिए डैमेज के हिसाब से हाथ-पैर का पैरालिसिस, फेशियल ड्रूपिंग या स्पीच में दिक्कत जैसे लक्षण दिखते हैं।
FAST पहचानें, देर न करें
- F — फेस (चेहरे का टेढ़ा होना)
- A — आर्म (हाथ में कमजोरी)
- S — स्पीच (बोलने में दिक्कत)
- T — टाइम (तुरंत इमरजेंसी में पहुंचें)
स्ट्रोक सिर्फ बुजुर्गों की बीमारी नहीं है
यह आम धारणा है कि स्ट्रोक सिर्फ बढ़ती उम्र में होता है। ICMR के हालिया पब्लिकेशन ने इसे गलत साबित कर दिया है।
जितने भी परसेंट स्ट्रोक है उसमें से क्लोज टू 30% स्ट्रोक अंडर द एज ऑफ़ 50 के रिपोर्ट हुए हैं। इट इज अ बिग प्रॉब्लम व्हिच इज नाउ आइडेंटिफाई।
पीयूष इसके पीछे जियोपॉलिटिकल सिचुएशन, एनवायरमेंटल फैक्टर और कॉर्पोरेट स्ट्रेस को ट्रिगर मानते हैं। उदाहरण के तौर पर उन्होंने एंटरप्रेन्योर नितिन कामथ का जिक्र किया, जिन्हें डेढ़ साल पहले ही स्ट्रोक हुआ था। एक और बड़ी समस्या यह है कि स्ट्रोक को अक्सर हार्ट अटैक के साथ जोड़ दिया जाता है, जबकि स्ट्रोक पूरी तरह ब्रेन की बीमारी है। अवेयरनेस की कमी की वजह से कई मौतें गलत तरीके से हार्ट अटैक की गिनती में चली जाती हैं।
बिना सिर खोले इलाज: मिनिमली इनवेसिव न्यूरोइंटरवेंशन
पारंपरिक ओपन सर्जरी में क्रेनियोटॉमी होती है, यानी खोपड़ी का फ्लैप निकाला जाता है, जिसमें रिकवरी महीनों तक चलती है और इंफेक्शन का रिस्क भी ज्यादा रहता है। पीयूष बताते हैं कि ओपन सर्जरी से जुड़ी मोर्टेलिटी और मोर्बिडिटी दर 35 से 40% तक हो सकती है।
इसकी जगह आज थाई या रिस्ट के रास्ते एक स्पेशलाइज्ड डिवाइस ब्रेन की वेसल तक भेजा जाता है, जो क्लॉट को पकड़कर बाहर निकाल देता है — बिना सिर खोले। इस प्रोसीजर को थ्रोम्बेक्टोमी कहा जाता है और यह आज क्लास वन एविडेंस के साथ गोल्ड स्टैंडर्ड ट्रीटमेंट मानी जाती है।
- सफलता दर: 90 से 95%
- जुड़ा हुआ रिस्क: सिर्फ 5 से 7%
- रिकवरी: सही केस में मरीज चौथे-पांचवें दिन घर लौट सकता है
भारत में मेडिकल डिवाइस बनाना: शून्य से शुरुआत की चुनौतियां
भारत में कार्डियोलॉजी डिवाइस सेक्टर ने काफी मुकाम हासिल किया है, लेकिन न्यूरो इंटरवेंशन में कोई कंपनी आगे नहीं आई। पीयूष इसकी सबसे बड़ी वजह ट्रीटमेंट रेट को मानते हैं।
इंडिया में अभी जो ट्रीटमेंट रेट है वो सिर्फ 1% या उससे भी कम है। 20 लाख पेशेंट में से सिर्फ 300 को ही इलाज मिल रहा है।
बड़ी कंपनियों के लिए यह मार्केट छोटा दिखता है, इसलिए कोई रिस्क लेने को तैयार नहीं था। दूसरी बड़ी दिक्कत स्किल्ड मैनपावर की है — न्यूरो इंटरवेंशन का टैलेंट पूल भारत में मौजूद ही नहीं था, इसलिए टीम को ट्रेन करना पड़ा। तीसरी चुनौती रॉ मटेरियल की सोर्सिंग थी, क्योंकि स्पेसिफिक ग्रेड के वायर और पॉलीमर भारत में उपलब्ध नहीं हैं।
सरकार की मेडिकल डिवाइस पार्क स्कीम को लेकर भी पीयूष की एक साफ शिकायत है — नई कंपनियों को प्रायर हिस्ट्री न होने के कारण जगह नहीं मिलती, जबकि जिन्हें सपोर्ट की जरूरत नहीं वो पहले से ही बड़ी बन चुकी हैं। इस वजह से उनकी कंपनी को अपना स्टेरिलाइजेशन और कोटिंग प्लांट भी खुद ही बनाना पड़ा।
डॉक्टरों का भरोसा जीतना: इंडियन डिवाइस बनाम इंटरनेशनल
भारत में बने मेडिकल डिवाइस को लेकर एक मानसिक बाधा आज भी मौजूद है।
शायद वही चीज हम जब इंडियन डिवाइस को लेके ओपिनियन नहीं होगा कि हमने प्राउडली बोले कि हमने इंडियन डिवाइस यूज़ किया तो मेंटली वो एक ब्लॉक बना हुआ है।
इस धारणा को तोड़ने के लिए पीयूष की टीम ने लंदन में हुई एक कॉन्फ्रेंस में ब्लाइंड स्टडी में हिस्सा लिया, जहां फिजिशियन को बताए बिना उनके डिवाइस को एक वेल-एस्टैब्लिश्ड इंटरनेशनल प्रोडक्ट के साथ कंपेयर कराया गया। नतीजा यह रहा कि ज्यादातर डॉक्टरों ने इसे कंपेरेबल या उससे बेहतर रेट किया, किसी ने भी इसे कमतर नहीं बताया।
यह सफलता की प्रेरक कहानी सिर्फ एक डिवाइस बनाने की नहीं है, बल्कि भारत में एक नया इकोसिस्टम खड़ा करने की है जहां डॉक्टर और हॉस्पिटल इंडियन इनोवेशन पर उतना ही भरोसा करें जितना विदेशी टेक्नोलॉजी पर करते हैं। अगर आप भी ऐसे उद्यमियों की फाउंडर की जर्नी से प्रेरणा लेना चाहते हैं जिन्होंने मुश्किल सेक्टर में स्टार्टअप कैसे शुरू करें इसका रास्ता खुद बनाया, तो उद्यमियों की कहानियाँ पढ़ना फायदेमंद रहेगा।
पीयूष की यह सफलता की कहानी यह भी दिखाती है कि हर उद्यमी को अपना रास्ता किस्मत से नहीं, बल्कि लगातार एक्सप्लोर करके मिलता है। द फाउंडर्स ड्रीम पॉडकास्ट पर ऐसे ही कई सेल्फ ग्रोथ और हेल्थकेयर इनोवेशन से जुड़े इंटरव्यू उपलब्ध हैं।
होस्ट अभिषेक व्यास के साथ पूरी बातचीत देखिए द फाउंडर्स ड्रीम यूट्यूब चैनल पर, और हर हफ़्ते नए फाउंडर इंटरव्यू के लिए सब्सक्राइब कीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
स्ट्रोक होने पर इलाज के लिए कितना समय मिलता है?
पीयूष कगदड़ा के अनुसार स्ट्रोक में हर सेकंड मायने रखता है, लेकिन अगर 24 घंटे के अंदर सही इलाज मिल जाए तो मरीज के पूरी तरह ठीक होने के बहुत अच्छे चांस होते हैं क्योंकि ब्रेन का डैमेज नॉन-रिवर्सिबल होता है।
क्या स्ट्रोक सिर्फ बुजुर्गों को होता है?
नहीं, ICMR की हालिया रिपोर्ट के अनुसार लगभग 30% स्ट्रोक केस 50 साल से कम उम्र के लोगों में रिपोर्ट हुए हैं, जिसकी वजहें स्ट्रेस, कॉर्पोरेट लाइफस्टाइल और एनवायरमेंटल फैक्टर बताई जाती हैं।
क्या स्ट्रोक और हार्ट अटैक एक ही चीज़ है?
नहीं, यह एक बड़ी गलतफहमी है। स्ट्रोक ब्रेन की बीमारी है जबकि हार्ट अटैक दिल से जुड़ा है, लेकिन अवेयरनेस की कमी की वजह से कई मौतें गलती से हार्ट अटैक से जोड़ दी जाती हैं।
बिना सिर खोले ब्रेन का ब्लॉकेज कैसे हटाया जाता है?
थाई या रिस्ट से आर्टेरियल रूट के जरिए एक स्पेशलाइज्ड डिवाइस ब्रेन की वेसल तक पहुंचाया जाता है जो क्लॉट को कैप्चर करके बाहर निकाल देता है। इसे मिनिमली इनवेसिव न्यूरोइंटरवेंशन कहा जाता है और इसकी सफलता दर 90-95% तक है।
भारत में इंडियन मेडिकल डिवाइस को डॉक्टर कितना अपना रहे हैं?
पीयूष कगदड़ा के अनुसार अभी भी एक मेंटल ब्लॉक है कि विदेशी डिवाइस ही बेहतर होते हैं, लेकिन लंदन में हुई एक ब्लाइंड स्टडी में डॉक्टरों ने उनके डिवाइस को इंटरनेशनल प्रोडक्ट्स के बराबर या बेहतर रेट किया।


