Shubham Rai on The Founder's Dream podcast

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एक शख्स जो रेलवे सिग्नलिंग जैसे मल्टी-थाउजेंड करोड़ प्रोजेक्ट्स मैनेज करता था, अचानक अपनी जॉब छोड़कर लड्डू बेचने लग जाए — सुनने में अजीब लगता है, पर यही शुभम राय की सफलता की प्रेरक कहानी है। द फाउंडर्स ड्रीम जैसे बिजनेस पॉडकास्ट हिंदी शो में होस्ट अभिषेक व्यास के साथ बातचीत में शुभम ने बताया कि कैसे उन्होंने कॉर्पोरेट कम्फर्ट जोन छोड़ा, एक रिजाइनेशन को हाईकोर्ट तक ले गए, और आज लड्डूम ऑर्गेनिक्स के जरिए ट्रेडिशनल इंडियन न्यूट्रिशन को मॉडर्न फॉर्मेट में लोगों तक पहुंचा रहे हैं।

यह कहानी सिर्फ एक स्टार्टअप आइडिया की नहीं है। इसमें फाइनेंशियल प्लानिंग, इन्फ्लेशन का गणित, और यह फैसला भी शामिल है कि जॉब कब छोड़नी चाहिए — और कब नहीं।

शुभम राय की सफलता की प्रेरक कहानी: कॉर्पोरेट कम्फर्ट जोन से बाहर निकलने का फैसला

शुभम 2018 से रेलवे की सिग्नलिंग टेक्नोलॉजी को यूरोपियन ट्रेन कंट्रोल सिस्टम (ETCS) पर अपग्रेड करने वाले प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे। प्रोजेक्ट मैनेजर के तौर पर पूरा 4G-5G सिस्टम उन्हीं के कंट्रोल में था। लेकिन शुरू से ही उनके मन में यह साफ था कि उन्हें एक दिन अपना काम खड़ा करना है।

दिक्कत यह थी कि जॉब में रहते हुए बड़े फैसले टलते रहते हैं। शुभम इसे इस तरह समझाते हैं:

“प्रॉब्लम ये होती है जब आप जॉब में होते हो ना तो डिसीजन डिले होते चले जाते हैं। हम आपको कोई एक पॉइंट चाहिए होता है कि इस पॉइंट पे आप एग्जिट कर लो, अब वो आपकी मर्जी से नहीं आता है।”

उनके लिए वह पॉइंट तब आया जब उन्होंने रिजाइनेशन दिया। कंपनी ने उसे स्वीकार नहीं किया और उलटा उन्हें साउथ इंडिया ट्रांसफर करने का दबाव बनाया गया, जबकि उनका छोटा बच्चा था और प्रोजेक्ट के सारे स्टेकहोल्डर्स दिल्ली में थे। एक महीने तक मैनेजमेंट से टकराव चला, और आखिरकार शुभम को हाईकोर्ट जाना पड़ा। दो हियरिंग्स के बाद केस उनके पक्ष में आया और रिजाइनेशन तुरंत प्रभाव से स्वीकार करने की शर्त पूरी हुई।

फाइनेंशियल प्लानिंग: इन्फ्लेशन क्यों सेविंग्स को खा जाता है

शुभम की सफलता की प्रेरक कहानी में सबसे प्रैक्टिकल हिस्सा उनकी फाइनेंशियल प्लानिंग है। 2020 में कोविड के दौरान, जब उन्होंने देखा कि “फूड सेक्टर कभी डाउन नहीं होता” वाली धारणा भी गलत साबित हुई, तभी उन्होंने डिपेंडेंसी खत्म करने की सोच अपनाई। उनके शब्दों में:

“मुझे वहां पे मैंने इस पॉइंट पे सोचा कि मैं मेरे को डिपेंडेंसी रखनी ही नहीं है किसी पे। सिर्फ इंडिपेंडेंट होना है। इंडिपेंडेंट का मतलब है मैं खुद पढ़ लूं, मैं खुद समझ लूं और मैं खुद उससे अर्न कर लूं।”

उसी दौर में उन्होंने स्टॉक मार्केट की ट्रेनिंग ली और पूरी फाइनेंशियल प्लानिंग शुरू की। उनका सीधा गणित था — अगर इन्फ्लेशन 7% है और सेविंग्स अकाउंट सिर्फ 3-4% रिटर्न देता है, या एफडी भी मुश्किल से 6.5% तक जाती है, तो पैसे की असली वैल्यू हर दिन कम हो रही है। वे कहते हैं:

“फ्यूचर के खर्चे बढ़ते हैं, बढ़ते हैं, चीजें बढ़ती है, नई-नई चीज़ें आती है। सब पैसा खत्म होता है, आपको डेली पैसा बनाना पड़ेगा। हमेशा पैसा बनाते रहना पड़ेगा।”

उनकी सलाह सीधी है — जरूरत के टाइमलाइन के हिसाब से पैसा ब्लू चिप या फ्लेक्सी कैप म्यूचुअल फंड्स में लगाएं, और जैसे-जैसे टारगेट पास आए, उसे डेट या लिक्विड फंड में शिफ्ट कर दें। यह कोई एक दिन में सीखा जाने वाला हुनर नहीं, इसके लिए प्रॉपर ट्रेनिंग और नजर चाहिए।

लड्डूम ऑर्गेनिक्स की शुरुआत — घर की रेसिपी से ब्रांड तक

लड्डूम ऑर्गेनिक्स की जड़ें शुभम की पारिवारिक कहानी में हैं। जब उनकी पत्नी प्रेग्नेंट थीं, उनके ससुर — जो आयुर्वेदिक डॉक्टर रहे हैं — पोस्टपार्टम लड्डू बनाते थे, जिनमें अजवाइन, सौंफ और गोंद जैसे इंग्रेडिएंट्स होते थे। जब घर आने वाले मेहमानों ने ये लड्डू चखे, तो सबको स्वाद इतना पसंद आया कि शुभम को अंदाजा हुआ — मेट्रो शहरों में यह चीज ढूंढना मुश्किल है।

उनके ससुर ने पारंपरिक गोंद के लड्डू में बदलाव करते हुए आटे की जगह उड़द और मूंग दाल का इस्तेमाल किया, जिससे लड्डू ग्लूटेन-फ्री और प्रोटीन-रिच बन गया। यहीं से आइडिया आया कि न्यूक्लियर फैमिलीज़ में मिस हो रही न्यूट्रिशन की कमी को इसी पारंपरिक फॉर्मेट से पूरा किया जा सकता है।

ब्रांड अभी सिर्फ 10 महीने पुराना है और अभी तक B2C पर फोकस्ड रहा है — Amazon और JioMart जैसे प्लेटफॉर्म्स पर। दिलचस्प बात यह रही कि सबसे ज्यादा ऑर्डर गर्मियों में साउथ इंडिया से आए, जहां आमतौर पर गोंद के लड्डू की मांग कम मानी जाती है। अब कंपनी कॉर्पोरेट गिफ्टिंग और वेडिंग इंडस्ट्री के जरिए B2B में भी कदम रख रही है।

ट्रेडिशनल लड्डू बनाम मॉडर्न प्रोटीन बार

जब होस्ट अभिषेक व्यास ने पूछा कि इतनी बढ़िया niche पकड़ने के बाद शुभम इसे और सेगमेंट्स तक क्यों ले जाना चाहते हैं, तो शुभम का जवाब उनके विजन को साफ करता है — वे प्रोटीन बार की बजाय लड्डू को वापस मुख्यधारा में लाना चाहते हैं:

“हमारे यहां क्या चलता था? हमारे यहां घी चलता था, हमारे यहां लड्डू चलते थे, कभी प्रोटीन बार नहीं चलता था। तो हम इतना इन्फ्लुएंस हो गए हैं वेस्टर्न कल्चर से कि हम अपने ट्रेडिशन को भूलते जा रहे हैं।”

उनका तर्क है कि पहले दादी-नानी लड्डू सिर्फ स्वाद के लिए नहीं, पूरे न्यूट्रिशन के लिए बनाती थीं, लेकिन न्यूक्लियर फैमिलीज़ और शहरों में शिफ्ट होने के साथ यह ट्रेडिशन कमजोर पड़ता गया। लड्डूम ऑर्गेनिक्स का हर प्रोडक्ट कस्टमाइज़ेबल है — किसी को जैगरी चाहिए, किसी को वीगन, किसी को कम मिठास — और हर रिक्वेस्ट के लिए एक प्रॉपर SOP बनाई जाती है, अंदाजे से कुछ नहीं डाला जाता।

जॉब कब छोड़ें — एक उद्यमी की व्यावहारिक सलाह

यह सवाल हर नौकरी करने वाले के मन में कभी न कभी आता है, और शुभम इसका जवाब बड़ी स्पष्टता से देते हैं। वे साफ कहते हैं कि सिर्फ गुस्से या थकान में जॉब छोड़ना समाधान नहीं है:

“फ्रस्ट्रेशन कभी भी किसी जॉब को छोड़ने का आंसर नहीं होता। आपको यह देखना पड़ेगा आप सिर्फ जॉब से फ्रस्ट्रेटेड हैं या आपके सराउंडिंग से।”

उनके मुताबिक पहले यह पहचानना जरूरी है कि दिक्कत कहां है, फिर niche तय करनी है, और उसके बाद प्रॉपर प्लानिंग करनी है। इन्वेस्टर्स के पीछे भागने की जल्दी करने की बजाय पहले खुद यह सोचना चाहिए कि असल में जिंदगी में चाहिए क्या। एक सेल्फ ग्रोथ की तरह यह प्रोसेस धीरे-धीरे बनता है, रातोंरात नहीं।

वे यह भी मानते हैं कि एंटरप्रेन्योरशिप में असली फ्रीडम पैसे में नहीं, बल्कि अपने फैसले खुद लेने की क्षमता में है। बड़ी कंपनियों में SOPs और रूल्स के बीच एक अच्छा आइडिया भी टॉप तक पहुंचते-पहुंचते बदल जाता है, जबकि अपने बिजनेस में गलत फैसला भी जल्दी सुधारा जा सकता है।

अनिश्चितता के साथ जीना — फाउंडर की जर्नी का सच

शुभम यह नहीं छिपाते कि डर आज भी बना रहता है। वेडिंग इंडस्ट्री में एंट्री के वक्त वे और उनकी पत्नी रात-रात भर सोचते थे कि यह कैसे चलेगा। लेकिन उनका मानना है कि यही अनिश्चितता असली मजा है:

“मैं मेहनत कर रहा हूं और मुझे कुछ मिला उसके बाद तो मुझे उस चीज की वैल्यू होगी। अगर मुझे प्लैटर पे दे दिया तो मैं उसकी वैल्यू नहीं करूंगा।”

हर फाउंडर के लिए उनका मैसेज सीधा है — लगे रहो, एग्जिट का ऑप्शन मत रखो, क्योंकि किसी भी चीज को सेट होने में वक्त लगता है। यह सोच द फाउंडर्स ड्रीम पॉडकास्ट के हर एपिसोड में दिखती है, जहां अलग-अलग फाउंडर्स अपनी सफलता की कहानी और स्ट्रगल दोनों खुलकर बताते हैं।

शुभम राय की कहानी से मिलने वाले सबक

  • जॉब का कम्फर्ट जोन असली नहीं होता — यह भी उतना ही अनिश्चित है जितना बिजनेस।
  • फाइनेंशियल प्लानिंग जॉब छोड़ने से पहले शुरू कर देनी चाहिए, बाद में नहीं।
  • सिर्फ सेविंग्स अकाउंट या FD पर निर्भर रहना इन्फ्लेशन के आगे पैसे की वैल्यू घटाता रहता है।
  • अपने पारिवारिक ज्ञान या ट्रेडिशन में भी एक ठोस बिजनेस आइडिया छुपा हो सकता है।
  • कस्टमर के चेहरे की खुशी और फीडबैक ही वह चीज है जो प्रोडक्ट को बेहतर बनाती रहती है।

शुभम राय की यह कहानी बताती है कि उद्यमी बनने का रास्ता सीधा नहीं होता — इसमें कोर्ट केस भी आ सकता है, फाइनेंशियल प्लानिंग की मेहनत भी, और अनिश्चितता के साथ जीने की आदत भी। लेकिन जो लोग अपने विजन पर टिके रहते हैं, उनके लिए रास्ता खुद बनता चला जाता है।

होस्ट अभिषेक व्यास के साथ पूरी बातचीत देखिए द फाउंडर्स ड्रीम यूट्यूब चैनल पर, और हर हफ़्ते नए फाउंडर इंटरव्यू के लिए सब्सक्राइब कीजिए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

शुभम राय कौन हैं?

शुभम राय एक पूर्व कॉर्पोरेट लीडर हैं जिन्होंने रेलवे सिग्नलिंग जैसे बड़े टेक्नोलॉजी प्रोजेक्ट्स मैनेज किए और बाद में जॉब छोड़कर लड्डूम ऑर्गेनिक्स नाम से क्लीन न्यूट्रिशन ब्रांड शुरू किया।

लड्डूम ऑर्गेनिक्स क्या बनाती है?

लड्डूम ऑर्गेनिक्स ग्लूटेन-फ्री, प्रोटीन-रिच पारंपरिक लड्डू बनाती है, जैसे पोस्टपार्टम लड्डू और अजवाइन लड्डू, जो देसी खांड, जैगरी या वीगन विकल्पों में कस्टमाइज किए जा सकते हैं।

शुभम राय ने जॉब क्यों छोड़ी?

शुभम राय अपना बिजनेस शुरू करना चाहते थे, लेकिन कंपनी ने उनका रिजाइनेशन स्वीकार नहीं किया और उन्हें ट्रांसफर के लिए दबाव डाला, जिसके बाद उन्हें हाईकोर्ट में जाकर रिजाइनेशन एक्सेप्ट कराना पड़ा।

जॉब छोड़कर बिजनेस कब शुरू करना चाहिए?

शुभम राय के अनुसार सिर्फ फ्रस्ट्रेशन में जॉब नहीं छोड़नी चाहिए, बल्कि पहले यह पहचानना जरूरी है कि आप जॉब से परेशान हैं या माहौल से, और उसके बाद प्रॉपर फाइनेंशियल व बिजनेस प्लानिंग के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

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About the Host

Abhishek Vyas, creator of The Founder’s Dream, India’s top Hindi business podcast, delivers powerful storytelling and viral conversations with leading founders and creators. His show helps guests share authentic journeys, expand their brands, and connect with millions of engaged listeners.

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