Suresh Bhawan on The Founder's Dream podcast

Read this article in English

पूरा एपिसोड देखिए

82 साल की उम्र में इंजीनियरिंग, एस्ट्रोलॉजी और क्रिया योग को एक साथ जीने वाला कोई शख्स कैसे सोचता है? यही सवाल द फाउंडर्स ड्रीम पॉडकास्ट के होस्ट अभिषेक व्यास ने वैदिक एस्ट्रोलॉजी एक्सपर्ट और क्रिया योगा प्रैक्टिशनर सुरेश भवन के सामने रखा। यह Suresh Bhawan इंटरव्यू भगवद गीता के कर्मयोग, एस्ट्रोलॉजी की असली भूमिका, और आत्मबोध की उस यात्रा की बात करता है जिसमें उन्हें खुद क्लेरिटी पाने में करीब 60-70 साल लगे।

Suresh Bhawan इंटरव्यू: विरासत से जिम्मेदारी तक

सुरेश भवन के ग्रेट ग्रैंड फादर पंडित गोकुल जी का नाम आज भी जंतर मंतर की दीवारों पर मौजूद है। जयपुर की वेधशाला में बना 27 मीटर का यंत्र आज भी सूर्य की छाया से 2 सेकंड की सटीकता में समय बताता है, और यह भारत के उन 43 वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स में शामिल है जिनकी गिनती दुनिया भर में होती है।

सुरेश भवन बताते हैं कि इस विरासत ने बचपन से ही एक बेंचमार्क खड़ा कर दिया था। वे कहते हैं:

“जो कुछ मिल रहा है जो कुछ हो रहा है मेरे जीवन में… मैं ये मानता हूं कि लब्ध प्रतिष्ठित परिवार में जन्म लेना सौभाग्य हो सकता है लेकिन ये एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी भी आ जाती है।”

यही सोच उन्हें पिछले 50-60 सालों से एस्ट्रोलॉजी पर एक ग्रंथ लिखने की तरफ ले गई, जिसमें वे माइक्रो एस्ट्रोलॉजी यानी नाड़ी शास्त्र पर काम कर रहे हैं — एक ऐसी विधा जो नब्ज़ की धड़कन के आधार पर व्यक्ति के जीवन को समझने की कोशिश करती है।

क्रिया योग क्या है और यह गीता से कैसे जुड़ा है

सुरेश भवन क्रिया योग की जड़ें भगवद गीता में बताते हैं। उनके अनुसार भगवान कृष्ण ने इसका उल्लेख अध्याय चार के श्लोक 29 और अध्याय छह के पहले श्लोक में किया है, जहां कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि यह ज्ञान पहले विवस्वान, मनु और इक्ष्वाकु को दिया गया था, पर समय के साथ खो गया।

आधुनिक युग में इसे फैलाने का श्रेय वे महावतार बाबा को देते हैं, जिनसे होते हुए यह ज्ञान लाहिड़ी महाशय और फिर परमहंस योगानंद तक पहुंचा — जिनकी किताब “ऑटोबायोग्राफी ऑफ अ योगी” 50 से ज्यादा भाषाओं में अनूदित हो चुकी है। सुरेश भवन खुद बताते हैं कि यह किताब पढ़कर ही उनके मन में क्रिया योग सीखने की जिज्ञासा जगी थी।

यह जिज्ञासा तब हकीकत बनी जब राजस्थान के डायरेक्टर मेडिकल हेल्थ डॉक्टर विश्वनाथ शर्मा के जरिए उनकी मुलाकात जयपुर आए क्रिया योगी पहाड़ी बाबा हरिहरानंद गिरी से हुई — जो नेताजी सुभाष चंद्र बोस के समकालीन थे और जिन्होंने डॉक्टर बी.सी. राय (जिनके नाम पर भारत में डॉक्टर्स डे मनाया जाता है) को भी दीक्षा दी थी। सुरेश भवन इसे अपनी जिंदगी का मोड़ बताते हैं, जिसने उनकी पूरी स्पिरिचुअल जर्नी बदल दी।

एस्ट्रोलॉजी भाग्य नहीं, संभावना बताती है

इस बातचीत का सबसे व्यावहारिक हिस्सा वह है जहां सुरेश भवन एस्ट्रोलॉजी और मेडिकल साइंस की तुलना करते हैं। उनका अपना अनुभव इसे साबित भी करता है — एक डॉक्टर दोस्त ने उनका ग्लूकोस टॉलरेंस टेस्ट करके बताया था कि 21-22 साल की उम्र में उन्हें डायबिटीज होने की संभावना है अगर लाइफस्टाइल नहीं बदली। ठीक उसी उम्र के आसपास, 2001 में यूके ट्रेनिंग के दौरान उन्हें डायबिटीज हुई भी।

इसी उदाहरण से वे अपनी बात साफ करते हैं:

“एस्ट्रोलॉजी इज नॉट फेटलिस्टिक… इट ओनली टेल्स अस इन अ वे दिस इज पॉसिबल, बट इफ इट इज गोइंग टू बी मैनिफेस्ट या नॉट, लार्जली डिपेंड्स अपॉन योर एफर्ट।”

गीता के प्रसिद्ध श्लोक “कर्मण्यवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” का हवाला देते हुए वे समझाते हैं कि परमात्मा ने हर व्यक्ति को कर्म करने का अधिकार दिया है, फल पर नहीं। परिणाम प्रकृति के तीन गुणों — सत, रज, तम — के अधीन चलते हैं, और यही वजह है कि आदतें और संस्कार बार-बार वही नतीजे दोहराते हैं, ठीक वैसे ही जैसे पुराने किलों में बहते पानी का निशान एक ही रास्ते पर बार-बार बनता है।

यह विषय उस Ramesh Karandhikar के इंटरव्यू में ब्रह्म विद्या की चर्चा से भी जुड़ता है, जहां भारतीय अध्यात्म के मूल सिद्धांतों को इसी तरह रोज़मर्रा की भाषा में समझाया गया है।

इच्छा, पुनर्जन्म और संस्कारों का गणित

सुरेश भवन एक दिलचस्प उदाहरण से समझाते हैं कि इच्छाएं पूरी तो होती हैं, पर अपने समय पर। अगर कोई गर्मी के महीने में जयपुर में बर्फ गिरने की इच्छा करे, तो वह इच्छा पूरी होगी, पर दिसंबर-जनवरी में, क्योंकि प्रकृति का अपना नियम है। वे स्वामी रामतीर्थ का हवाला देते हुए कहते हैं कि हर इच्छा पूरी होने के लिए बाध्य है, बस उसके लिए सही परिस्थितियां बननी जरूरी हैं।

इसी संदर्भ में वे जीवन की गहरी परिभाषा देते हैं:

“ये हमारा जीवन क्या है? हम ये हमारे ऋणों का अनुबंध है। कुछ डेबिट है, कुछ क्रेडिट है। हमें वो देनी है और हमें वो पानी पड़ेगा।”

यही सिद्धांत उनके अनुसार पुनर्जन्म के चक्र की जड़ है — जब तक इच्छाएं बाकी हैं, जन्म का सिलसिला चलता रहता है, और क्रिया योग को वे इसी चक्र से तेज़ी से बाहर निकलने का रास्ता, यानी “जेट स्पीड ट्रैवल मोड ऑन द पाथ ऑफ स्पिरिचुअलिटी” बताते हैं।

सफलता की असली कुंजी: सिंसियरिटी

पहाड़ी बाबा से मिली एक सीख सुरेश भवन को आज भी शब्दशः याद है। जब उन्होंने ध्यान-साधना के साथ जीवन को संतुलित करने की सलाह मांगी, तो बाबा ने सिर्फ एक वाक्य लिखा:

“सिंसियरिटी लीड्स टू सेल्फ रियलाइजेशन… जीवन में भी आप देखिए बिना सिंसियरिटी के आपके फाउंडेशन में आप अगर संलग्न नहीं रहेंगे तो यू कैन नॉट एक्सपेक्ट सक्सेस।”

वे इसे मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई से जोड़ते हैं — एमबीबीएस के बाद एमएस-एमडी, फिर डीएम-एमसीएच तक पहुंचने में 10-20 साल की सिंसियरिटी लगती है, तभी सफलता मिलती है। यही सिद्धांत वे रिश्तों पर भी लागू करते हैं, जहां रिश्ता बनाए रखने का मूल मंत्र भी यही ईमानदारी है।

शरीर, समय और प्राण शक्ति का ध्यान

बातचीत के आखिर में सुरेश भवन आज की जनरेशन के लिए दो व्यावहारिक बातें रखते हैं:

“हम सबको जीवन में दो चीजें मिली हैं… शरीर में हमें मिली है एनर्जी शक्ति और दूसरा समय। ये दोनों लिमिटेड हैं। ना हम शरीर को व्यर्थ करें, ना हम समय को व्यर्थ करें।”

अपने नाना जी, जो जयपुर के राजवैद्य थे, से मिली सीख के तौर पर वे चार आदतें साझा करते हैं:

  • हर खाने के बाद 15-20 मिनट बाईं करवट लेटना
  • खाने के बाद लघु शंका जरूर करना, ताकि किडनी पर बैक प्रेशर न बने
  • रात को सोने से पहले घर में ही करीब 1000 कदम चलना
  • दोपहर के खाने के बाद छाछ या लस्सी, रात के खाने के बाद दूध लेना

इसके बाद वे सांस और प्राण शक्ति के फर्क पर आते हैं, जो शायद इस पूरे Suresh Bhawan इंटरव्यू का सबसे गहरा हिस्सा है:

“हमें जो प्राण शक्ति मिल रही है, ये हमें स्वास रूपी बर्तन में मिल रही है। यह बिना पैसा खर्च किए हुए मुफ्त की चीज़ है… आप इस पे ध्यान रखो कि सांस आ रही है, सांस जा रही है, तो एक अद्भुत करिश्मा हो जाता है।”

उनका तर्क है कि दिमाग एक साथ दो जगह नहीं ठहर सकता — अगर मन को सांस पर टिका दिया जाए, तो वह भटकना बंद कर देता है। यही सिद्धांत ध्यान और आत्म-अवलोकन का आधार है, जिसकी गहराई द फाउंडर्स ड्रीम के अन्य विचारकों और गेस्ट्स की बातचीत में भी बार-बार सामने आती है।

होस्ट अभिषेक व्यास के साथ पूरी बातचीत देखिए द फाउंडर्स ड्रीम यूट्यूब चैनल पर, और हर हफ़्ते नए फाउंडर इंटरव्यू के लिए सब्सक्राइब कीजिए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्रिया योग क्या है?

सुरेश भवन के अनुसार क्रिया योग का वर्णन भगवद गीता में अध्याय चार के श्लोक 29 और अध्याय छह के पहले श्लोक में भगवान कृष्ण ने किया है, और इसका पूर्ण रहस्य किसी क्रिया योगी से सीखा जा सकता है, किताबों से नहीं।

सुरेश भवन कौन हैं?

सुरेश भवन एक वैदिक एस्ट्रोलॉजी एक्सपर्ट, क्रिया योगा प्रैक्टिशनर और वेलनेस गाइड हैं, जो 82 साल की उम्र में साइंस और स्पिरिचुअलिटी को साथ लेकर चलते हैं और जंतर मंतर से जुड़े परिवार से आते हैं।

क्या एस्ट्रोलॉजी भाग्यवादी है?

नहीं, सुरेश भवन कहते हैं कि एस्ट्रोलॉजी मेडिकल साइंस की तरह है, यह सिर्फ संभावना बताती है कि कुछ हो सकता है, पर वह मैनिफेस्ट होगा या नहीं यह काफी हद तक व्यक्ति के अपने एफर्ट पर निर्भर करता है।

गीता का कर्मण्यवाधिकारस्ते श्लोक क्या सिखाता है?

यह श्लोक बताता है कि हर इंसान को कर्म करने का अधिकार दिया गया है लेकिन फल पर उसका अधिकार नहीं, और परिणाम प्रकृति के तीन गुणों सत, रज, तम के अधीन होते हैं।

क्रिया योग सीखने की शुरुआत सुरेश भवन ने कैसे की?

सुरेश भवन ने पहाड़ी बाबा हरिहरानंद गिरी से क्रिया योग सीखा, जो डॉक्टर विश्वनाथ शर्मा के माध्यम से संभव हुआ, और यह घटना उनकी पूरी स्पिरिचुअल जर्नी को बदलने वाली साबित हुई।

Author Profile

About the Host

Abhishek Vyas, creator of The Founder’s Dream, India’s top Hindi business podcast, delivers powerful storytelling and viral conversations with leading founders and creators. His show helps guests share authentic journeys, expand their brands, and connect with millions of engaged listeners.

Leave A Comment

All fields marked with an asterisk (*) are required