क्या आपके घर में भी दो लोग एक ही कमरे में बैठे हैं, पर एक की स्क्रीन चल रही है और दूसरे का टीवी रिमोट? द फाउंडर्स ड्रीम पॉडकास्ट के इस एपिसोड में होस्ट अभिषेक व्यास ने Life Coach और Motivational Speaker Dr. Surbhi Agarwal से यही सवाल पूछा कि आजकल इतने घरों में साइलेंट डिवोर्स क्यों पहुंच गया है। इस Dr. Surbhi Agarwal इंटरव्यू में बातचीत सिर्फ शादीशुदा जिंदगी तक सीमित नहीं रही, इसमें एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स, सोशल मीडिया कंपैरिजन और हेलीकॉप्टर पैरेंटिंग तक की खुली चर्चा हुई।
साइलेंट डिवोर्स क्या है और आजकल इतना क्यों हो रहा है
Dr. Surbhi Agarwal शुरुआत में ही इस समस्या को बहुत सीधे शब्दों में रखती हैं। उनके मुताबिक जहां लोग कानूनी तौर पर तलाक नहीं ले पाते, वहां रिश्ता चुपचाप खत्म हो जाता है।
डिवोर्स लीगली नहीं होता तो साइलेंट डिवोर्स पे चले जाते हैं। एक ही रूम में बैठे हैं पर एक की तो स्क्रीन चल रही है और एक का टीवी पर रिमोट चल रहा है।
वे बताती हैं कि इसका असर सिर्फ पति-पत्नी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि धीरे-धीरे परिवार, बच्चों और आखिर में पूरे समाज तक पहुंच जाता है। उनका मानना है कि रिश्ता बनाए रखने के लिए दोनों को रिलेशनशिप हार्मोनी और माइंडसेट एलाइनमेंट पर काम करना चाहिए, न कि एक-दूसरे को बदलने की कोशिश करनी चाहिए।
एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स की असली वजह क्या है
जब अभिषेक व्यास ने पूछा कि लोग शादी के बाहर रिश्ते क्यों तलाशने लगते हैं, तो Dr. Surbhi का जवाब सीधा था — असंतुष्टि। यह असंतुष्टि सिर्फ फिजिकल नहीं, इमोशनल भी होती है।
मुझे लगता है जो एज अ लाइफ कोच मैं लोगों में देख रही हूं, इमोशनली अवेलेबल ना होना पार्टनर का यह सबसे बड़ी प्रॉब्लम है। जब हम इमोशनली अवेलेबल नहीं होते, क्वालिटी टाइम स्पेंड नहीं करते हैं, तो ऑब्वियसली हम बाहर उन चीजों को ढूंढते हैं।
वे इसे रिश्ते में आने वाली “बोरियत” से जोड़ती हैं — शुरुआत में हर छोटी बात पर तारीफ मिलती है, लेकिन धीरे-धीरे खाना बनाना पत्नी की “ड्यूटी” बन जाता है और गिफ्ट लाना पति की, कोई ग्रेटिट्यूड एक्सप्रेस नहीं होती। यही गैप बाहर वैलिडेशन ढूंढने की वजह बनता है।
पुरानी और नई पीढ़ी का फर्क
Dr. Surbhi साफ करती हैं कि पुरानी पीढ़ी में एडजस्टमेंट परिवार की परंपरा और इज्जत के बोझ तले चलता था, जबकि आज ब्रॉडनेस बढ़ी है और परिवार छोटे हैं, इसलिए पेशेंस और एडजस्टमेंट की क्षमता कम हो गई है। उनके शब्दों में न पुराना तरीका पूरी तरह सही है, न आज का — यह सिर्फ पर्सपेक्टिव की बात है।
पार्टनर को सुधारने की बजाय एक्सेप्ट करना सीखिए
बातचीत का एक अहम हिस्सा यह था कि रिश्ते में कमियां होने पर क्या करना चाहिए। Dr. Surbhi की सलाह है कि पार्टनर की कमियों को सुधारने की जगह उन्हें स्वीकार करना ज्यादा जरूरी है, हालांकि वे एक साफ लक्ष्मण रेखा भी खींचती हैं — एक्स्ट्रा मैरिटल जैसी कमी को एक्सेप्ट करने की बात नहीं है, वहां फैसला लेना जरूरी है।
आप दोनों हाथों में लड्डू नहीं ले सकते… टेक द डिसीजन। कोर्ट आपके साथ है, दुनिया आपके साथ है।
अगर आप खुद की सोच और आदतों पर काम करके ऐसे रिश्तों की उलझनों से बाहर निकलना चाहते हैं, तो सेल्फ ग्रोथ पर टीएफडी के इस सेक्शन में इससे जुड़ी और गहराई से समझ मिलती है।
सोशल मीडिया का ट्रेलर इफेक्ट और कंपैरिजन ट्रैप
एपिसोड की सबसे यादगार बात यह उदाहरण है जो Dr. Surbhi अपने क्लाइंट्स को समझाने के लिए इस्तेमाल करती हैं — सोशल मीडिया सिनेमा के ट्रेलर जैसा है।
कोई भी डायरेक्टर अपनी मूवी का जब ट्रेलर दिखाता है तो वो बेस्ट पार्ट दिखाता है। तो सोशल मीडिया इज जस्ट ओनली अ ट्रेलर ऑफ योर लाइफ।
उनका कहना है कि लोग किसी कपल की छुट्टी वाली तस्वीरें देखकर अपनी शादी की तुलना करने लगते हैं, जबकि कैमरा कभी वो स्ट्रगल नहीं दिखाता जो उस फोटो के पीछे छिपी होती है — घटिया होटल, बिगड़ा हुआ मूड, या पैर में आया क्रैम्प। वे यह भी मानती हैं कि कंपैरिजन सिर्फ पति-पत्नी तक सीमित नहीं, यह इंसान का “एकाधिकार” है और बच्चों में भी उतना ही दिखता है।
दिलचस्प बात यह है कि लोग सोशल मीडिया पर लाइक और कमेंट तो चाहते हैं, लेकिन असली इमोशनल कनेक्शन नहीं ढूंढते। यह पहलू कंटेंट क्रिएटर्स और पॉडकास्टर्स के लिए भी सोचने वाली बात है — अगर आप खुद ऐसे विषयों पर बातचीत शुरू करना चाहते हैं तो सेल्फ ग्रोथ की यह कैटेगरी मदद कर सकती है।
हेलीकॉप्टर पैरेंटिंग और बच्चों की इमोशनल रेजिलियंस
बातचीत पैरेंटिंग की तरफ मुड़ी तो Dr. Surbhi ने हेलीकॉप्टर पैरेंटिंग को बहुत व्यावहारिक तरीके से समझाया — पेरेंट्स बच्चे की हर छोटी चीज, दोस्ती से लेकर ट्यूशन तक, खुद डिसाइड करने लगते हैं।
जब हर चीज वही डिसाइड कर रहे हैं तो बच्चे में कॉन्फिडेंस कैसे डेवलप होगा? हम उनका कॉन्फिडेंस बिल्कुल हटा देते हैं।
इसका सबसे बड़ा नुकसान वे बताती हैं “फेलियर का टेरर” — क्योंकि बच्चे को कभी असफलता झेलनी ही नहीं पड़ती, इसलिए जब वह असली दुनिया में, जैसे किसी कॉरपोरेट जॉब में, रिजेक्शन झेलता है तो टूट जाता है। उनकी सलाह साफ है — पेरेंट्स अपने अधूरे सपनों का बोझ बच्चों पर न डालें।
अपनी उम्मीदों का ठीकरा बच्चों के सर पर मत डालो। बच्चों को उड़ने दो। उनको पंख दो। अपना आकाश वो खुद चुनेंगे।
उनका इमोशनल रेजिलियंस प्रोग्राम भी इसी सोच पर बना है — यह ट्रीटमेंट नहीं, लाइफस्टाइल है। जैसा वे कहती हैं, काउंसलिंग किसी बारिश में भीगते इंसान को छाता देना है, जबकि इमोशनल रेजिलियंस उसे यह एहसास कराना है कि उसके पास पहले से अपना छाता है और वह बारिश में डांस भी कर सकता है।
टॉक्सिक रिलेशनशिप से बाहर कैसे निकलें
जो लोग किसी टॉक्सिक रिश्ते में फंसे महसूस करते हैं, उनके लिए Dr. Surbhi की सलाह सीधी और बिना लाग-लपेट की है।
उम्मीद सबसे बड़ी साइकोलॉजिकल ड्रग है। उम्मीद का दामन छोड़ दो सारे काम हो जाएंगे… जो आपको बार-बार तोड़ रहा है, वह कभी भी आपको कंप्लीट नहीं कर सकते।
व्यावहारिक कदमों में वे बताती हैं:
- इमोशनल और फाइनेंशियल डिपेंडेंसी दोनों को धीरे-धीरे कम करना
- अपनी खुद की स्किल्स को पहचानना और डेवलप करना
- टॉक्सिक व्यक्ति से कॉन्टैक्ट को धीरे-धीरे कम करते हुए पूरी तरह दूरी बनाना
इंटिमेसी और इमोशनल कनेक्शन को लेकर उनका जवाब साफ था कि दोनों में से किसी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता — दिमाग और दिल दोनों को साथ चलना ही होगा।
Dr. Surbhi Agarwal की यह पूरी बातचीत साइलेंट डिवोर्स, एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स और पैरेंटिंग को लेकर एक ईमानदार आईना है — बिना किसी जजमेंट के, ठीक वैसे ही जैसे वे अपने क्लाइंट्स को सुनती हैं। होस्ट अभिषेक व्यास के साथ पूरी बातचीत देखिए द फाउंडर्स ड्रीम यूट्यूब चैनल पर, और हर हफ़्ते नए फाउंडर इंटरव्यू के लिए सब्सक्राइब कीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
साइलेंट डिवोर्स क्या होता है?
Dr. Surbhi Agarwal के अनुसार साइलेंट डिवोर्स तब होता है जब कानूनी रूप से तलाक नहीं होता लेकिन पति-पत्नी एक ही कमरे में बैठकर भी भावनात्मक रूप से पूरी तरह अलग हो चुके होते हैं, जैसे एक की स्क्रीन चल रही है और दूसरे का टीवी रिमोट।
एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स की सबसे बड़ी वजह क्या है?
गेस्ट के मुताबिक सबसे बड़ी वजह पार्टनर का इमोशनली अवेलेबल न होना और क्वालिटी टाइम न देना है, जिसकी वजह से लोग बाहर इमोशनल सपोर्ट और वैलिडेशन ढूंढने लगते हैं।
हेलीकॉप्टर पैरेंटिंग बच्चों को कैसे नुकसान पहुंचाती है?
जब पेरेंट्स बच्चे की हर छोटी-बड़ी चीज खुद डिसाइड करते हैं तो बच्चे में डिसीजन लेने की क्षमता और कॉन्फिडेंस विकसित नहीं होता, और असफलता का डर उन्हें रियल वर्ल्ड में तोड़ देता है।
टॉक्सिक रिलेशनशिप से बाहर निकलने का पहला कदम क्या है?
Dr. Surbhi Agarwal कहती हैं कि सबसे पहले उम्मीद छोड़नी होती है, क्योंकि उम्मीद सबसे बड़ी साइकोलॉजिकल ड्रग है, उसके बाद इमोशनल और फाइनेंशियल डिपेंडेंसी कम करके अपनी स्किल्स पर काम करना चाहिए।
सोशल मीडिया रिश्तों की तुलना को कैसे बढ़ावा देता है?
गेस्ट के अनुसार सोशल मीडिया किसी की जिंदगी का सिर्फ ट्रेलर दिखाता है, बेस्ट पार्ट, जबकि स्ट्रगल और फ्लॉप पार्ट कभी कैमरे में नहीं आता, इसी वजह से लोग अपनी असल जिंदगी की तुलना दूसरों की हाईलाइट रील से करके लोनली फील करते हैं।



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