Dr. Manisha Palaskar on The Founder's Dream podcast

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भारत हर साल बड़े-बड़े अस्पताल और ICU बना रहा है, लेकिन जिस प्राथमिक आरोग्य केंद्र पर 70% मरीजों का पहला भरोसा होना चाहिए, वहां ताला लगा मिलता है। यही सवाल द फाउंडर्स ड्रीम के होस्ट अभिषेक व्यास ने डॉ. मनीषा पलस्कर के सामने रखा, और उनका जवाब एक पूरी मुहिम की कहानी बन गया। इस Dr. Manisha Palaskar इंटरव्यू में, जो भारत के चर्चित बिजनेस पॉडकास्ट हिंदी शो “द फाउंडर्स ड्रीम” का हिस्सा है, हम समझेंगे कि Primary Health Care Foundation की शुरुआत कैसे हुई, और भारत की ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था में असल दरारें कहां हैं।

Primary Health Care Foundation की शुरुआत कैसे हुई

यह जानने से पहले कि Dr. Manisha Palaskar कौन हैं, उनकी शुरुआत की कहानी समझनी जरूरी है। डॉ. मनीषा पलस्कर की मेडिकल प्रैक्टिस पन्ना के एक प्रोजेक्ट से शुरू हुई। वहां उन्हें पता चला कि गांव का प्राथमिक आरोग्य केंद्र दोपहर 12 बजे के बाद बंद हो जाता था — डॉक्टर ताला लगाकर चले जाते थे क्योंकि मरीज आते ही नहीं थे, और मरीजों को भी पता था कि वहां डॉक्टर बैठता नहीं है। टीम को एक रूम मिला और उन्होंने वहीं प्रैक्टिस शुरू कर दी।

धीरे-धीरे गांव में कैंप लगने लगे, और नॉट-फॉर-प्रॉफिट टीम की OPD रोज़ 100 मरीज तक पहुंच गई। इसका असर यह हुआ कि वहां के सरकारी डॉक्टर और नर्स भी नियमित आने लगे। इसी अनुभव ने डॉ. मनीषा को यह एहसास दिलाया कि सिर्फ लेक्चर देने से कुछ नहीं बदलता, फील्ड में उतरना पड़ता है। कई प्राथमिक आरोग्य केंद्रों में उन्होंने दीवारों से गिरता मोल्ड और उसी हाल में होती सर्जरी तक देखी। यहीं से उन्होंने तय किया कि भारत का प्राइमरी हेल्थ केयर इंफ्रास्ट्रक्चर और हेल्थ वर्कर्स की क्षमता, दोनों पर काम करना है — और इसी सोच से Primary Health Care Foundation का जन्म हुआ।

हेल्थकेयर पिरामिड में सबसे नीचे की परत क्यों जरूरी है

डॉ. मनीषा हेल्थकेयर सिस्टम को एक पिरामिड की तरह देखती हैं, जिसका बेस प्राइमरी हेल्थ केयर है।

प्राइमरी हेल्थ केयर जो है वो कंप्लीट हेल्थ केयर पिरामिड का बेस है जिसमें 70% पेशेंट्स को पहले प्राइमरी हेल्थ केयर की जरूरत पड़ती है।

उनका तर्क सीधा है — ICU और टर्शरी हॉस्पिटल जरूरी हैं, लेकिन सवाल यह है कि मरीज को वहां तक पहुंचने की नौबत ही क्यों आए। हाइपरटेंशन का पता न चलने से ब्रेन हैमरेज, अनियंत्रित डायबिटीज से युवा उम्र में डायलिसिस — ऐसे कई उदाहरण उन्होंने दिए जहां समय पर स्क्रीनिंग होती तो बड़ा नुकसान टाला जा सकता था।

हम ऐसा क्यों करें कि भाई सिटीजन को हम पेशेंट बनाए और फिर पेशेंट बना के उनको ट्रीटमेंट दें।

रिएक्टिव नहीं, रिस्पॉन्सिव हेल्थकेयर की जरूरत

डॉ. मनीषा के मुताबिक भारत का हेल्थ सिस्टम ज़्यादातर रिएक्टिव है — बीमारी होने पर ही डॉक्टर के पास जाना। उदाहरण के तौर पर वे बताती हैं कि भारत डायबिटीज के मामलों में दुनिया में अव्वल नंबर पर है, क्योंकि प्री-डायबिटिक स्टेज पर स्क्रीनिंग नहीं हो पाती। उनका सुझाव है कि जैसे कंपनियां नए एंप्लॉई को ज्वाइन कराने से पहले हेल्थ चेकअप कराती हैं, वैसा ही रवैया हर नागरिक को अपनी निजी जिंदगी में अपनाना चाहिए। NCD (नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज) स्क्रीनिंग — डायबिटीज, हाइपरटेंशन, एनीमिया, कैंसर — के लिए सरकार ने बजट का 4% हिस्सा तय किया है, लेकिन इतनी बड़ी आबादी की स्क्रीनिंग के लिए लोकल हेल्थ वर्कर्स और लोकल लीडरशिप का साथ जरूरी है।

डॉक्टर-पेशेंट रेशियो और गांव-शहर की खाई

आंकड़े इस समस्या की गहराई साफ दिखाते हैं।

भारत में डॉक्टर पेशेंट रेशियो जो है 1000 पेशेंट के ऊपर से डॉक्टर्स हैं हमारे पास। WHO बोलता है एटलीस्ट एक होना चाहिए… 76% जो डॉक्टर्स हैं वो अर्बन एरिया में काम कर रहे हैं और ओनली 35 टू 36% रूरल एरिया में काम कर रहे हैं।

इसके साथ एक दूसरी समस्या है — इन्फ्रास्ट्रक्चर बन जाने के बाद भी उसकी परफॉर्मेंस की मॉनिटरिंग नहीं होती। डॉ. मनीषा का कहना है कि सरकार ने स्ट्रक्चर को फंड किया है, लेकिन परफॉर्मेंस को फंड नहीं किया। उनकी बड़ी मांग है कि हेल्थ को स्टेट सब्जेक्ट से हटाकर कॉनकरेंट लिस्ट में लाया जाए, ताकि बिहार, असम, महाराष्ट्र — हर जगह इलाज का स्तर एक जैसा हो।

सिस्टम के साथ काम करना, सिस्टम के खिलाफ नहीं

जब होस्ट अभिषेक व्यास ने पूछा कि क्या पन्ना के अनुभव के बाद सिस्टम से टकराव हुआ, तो डॉ. मनीषा का जवाब बेहद स्पष्ट था।

मुझे सिस्टम के अगेंस्ट नहीं जाना है। आई एम अ पार्ट ऑफ़ सिस्टम एंड दिस इज़ माय कंट्री एंड आई एम अ वेरी स्ट्रांग नेशनिस्ट। हमेशा सिस्टम के अगेंस्ट जाकर हम काम नहीं कर सकते।

उनका मॉडल है — पहले लोकल लीडरशिप (पॉलिटिकल या ब्यूरोक्रेटिक) की असली चुनौतियां समझना, फिर उसी हिसाब से प्रोग्राम डिज़ाइन करना और सरकार की मौजूदा पहल को सपोर्ट करना, न कि पैरेलल सिस्टम खड़ा करना। यही सोच उन जैसे कई फाउंडर्स को अलग बनाती है, जो मिशन के साथ-साथ सिस्टम को भी समझते हैं — ऐसे ही फाउंडर्स की सोच पर फाउंडर्स की एंटरप्रेन्योरियल जर्नी से जुड़े लेखों में भी विस्तार से बात की गई है।

हेल्थकेयर को सेवा मानने की जरूरत, प्रॉफिट नहीं

डॉ. मनीषा हेल्थकेयर प्रोफेशन को डिफेंस सर्विस जैसा मानती हैं — जहां पैसा नतीजा हो, मकसद नहीं।

अगर उनके लिए पैसा ये वर्ड आता है तो आराम से एमबीए कर लें, यूएस जाए, कोई सॉफ्टवेयर कंपनी में जॉब करें। अगर आपको हेल्थ केयर चूज़ करना है, आपके लिए पर्पस ही सर्व करना है एंड बाय प्रोडक्ट मनी है, तो आप हेल्थ केयर में आइए।

वे यह भी कहती हैं कि गांव के मेडिकल ऑफिसर की सोच बदलनी होगी — “मैं महीने की सैलरी के लिए काम कर रहा हूं” की जगह “मैं 30,000 की आबादी की जिम्मेदारी ले रहा हूं” वाली मानसिकता आनी चाहिए। यही सोच सफल फाउंडर्स और लीडर्स की आदतों में भी दिखती है, जिस पर सेल्फ-ग्रोथ से जुड़े लेखों में विस्तार से लिखा गया है।

CSR और NGO: पैसा है, सोच बदलनी बाकी है

डॉ. मनीषा के मुताबिक CSR और सरकार दोनों हेल्थकेयर पर काफी खर्च कर रहे हैं, फिर भी सस्टेनेबल इम्पैक्ट नहीं बन पा रहा। इसकी वजह है — कंपनियां अक्सर सिर्फ मैंडेट पूरा करने के लिए CSR खर्च करती हैं, रिज़ल्ट या “सोशल रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट” सोचकर नहीं। उनका सुझाव है कि जिस तरह बिज़नेस में ROI देखा जाता है, उसी तरह CSR प्रोजेक्ट्स में मॉनिटरिंग और इवैल्यूएशन पर भी उतना ही निवेश हो — क्योंकि आज ज्यादातर प्रपोजल में इसके लिए 1% से भी कम बजट रखा जाता है।

NGO सेक्टर में भी असमानता बढ़ी है — कुछ NGO हजार करोड़ के हो गए हैं, जबकि कई छोटे NGO निजी पैसे से काम चला रहे हैं। डॉ. मनीषा का मानना है कि हर बड़े इंडस्ट्रियलिस्ट या फाउंडेशन को देश की एक-एक समस्या (जैसे मालन्यूट्रिशन या एनीमिया) गोद लेकर सरकार के साथ मिलकर काम करना चाहिए — इससे अगले दो-तीन साल में हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़ा बदलाव संभव है।

तीन सबसे बड़ी कमियां — और आगे का रास्ता

डॉ. मनीषा प्राइमरी हेल्थ केयर के “रिपोर्ट कार्ड” में तीन बड़ी कमियां गिनाती हैं:

  • डॉक्टर-पेशेंट रेशियो में भारी असंतुलन, खासकर गांवों में
  • स्ट्रक्चर तो बना दिए गए, लेकिन उनकी परफॉर्मेंस की मॉनिटरिंग नहीं होती
  • हेल्थ का स्टेट सब्जेक्ट होना, जिससे राज्यों में इलाज की गुणवत्ता में बड़ा फर्क आता है

उनकी सलाह साफ है — पहले सिस्टम की बुनियाद मजबूत करो, नागरिक को मरीज बनने से रोको, तभी वर्ल्ड-क्लास हॉस्पिटल और टेक्नोलॉजी का फायदा मिलेगा। उनके शब्दों में डेटा और एनालिटिक्स पर भी जोर है — जैसे बैंकिंग सिस्टम रोबस्ट है, वैसे ही हेल्थ इंटेलिजेंस सिस्टम मजबूत क्यों नहीं हो सकता। पन्ना के एक बंद पड़े आरोग्य केंद्र से लेकर सैकड़ों गांवों तक पहुंचने वाली Dr. Manisha Palaskar की सफलता की कहानी यही बताती है कि सिस्टम के भीतर रहकर भी बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।

होस्ट अभिषेक व्यास के साथ यह पूरी बातचीत देखिए द फाउंडर्स ड्रीम पर, और हर हफ़्ते नए फाउंडर इंटरव्यू के लिए सब्सक्राइब कीजिए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

Primary Health Care Foundation की शुरुआत कैसे हुई?

Dr. Manisha Palaskar जब पन्ना में एक प्रोजेक्ट पर काम कर रही थीं, तब उन्होंने देखा कि गांव का प्राथमिक आरोग्य केंद्र दोपहर 12 बजे के बाद बंद हो जाता था क्योंकि डॉक्टर नहीं आते थे। उन्होंने वहीं एक रूम लेकर प्रैक्टिस शुरू की, धीरे-धीरे कैंप लगाए, ओपीडी 100 मरीज तक पहुंची और इसी अनुभव से Primary Health Care Foundation का जन्म हुआ।

Dr. Manisha Palaskar कौन हैं?

Dr. Manisha Palaskar एक पब्लिक हेल्थ लीडर, पॉलिसी एडवाइजर और हेल्थकेयर सिस्टम्स थिंकर हैं। वे Primary Health Care Foundation की फाउंडर हैं और Bodhless World Foundation में हेल्थ डायरेक्टर के तौर पर 500 से ज्यादा गांवों में मोबाइल मेडिकल यूनिट्स चला रही हैं।

भारत में डॉक्टर-पेशेंट रेशियो की क्या स्थिति है?

Dr. Manisha के अनुसार भारत में डॉक्टर-पेशेंट रेशियो 1000 मरीजों पर एक डॉक्टर से भी कम है, जबकि WHO का मानक कम से कम एक डॉक्टर प्रति 1000 मरीज है। इसके अलावा 76% डॉक्टर शहरी इलाकों में काम करते हैं और सिर्फ 35-36% ही ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा दे रहे हैं।

प्राइमरी हेल्थ केयर इतनी जरूरी क्यों है?

Dr. Manisha बताती हैं कि पूरे हेल्थकेयर पिरामिड में करीब 70% मरीजों को सबसे पहले प्राइमरी हेल्थ केयर की जरूरत पड़ती है। अगर इसे मजबूत कर दिया जाए तो लोगों को ICU या टर्शरी हॉस्पिटल तक जाने की नौबत ही नहीं आएगी।

क्या Primary Health Care Foundation सरकार के खिलाफ काम करता है?

नहीं। Dr. Manisha साफ कहती हैं कि वे सिस्टम का हिस्सा हैं और सरकार के साथ मिलकर, उसकी पहलों को कॉम्प्लीमेंट करते हुए काम करना चाहती हैं, न कि सिस्टम के खिलाफ जाकर।

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Abhishek Vyas, creator of The Founder’s Dream, India’s top Hindi business podcast, delivers powerful storytelling and viral conversations with leading founders and creators. His show helps guests share authentic journeys, expand their brands, and connect with millions of engaged listeners.

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