एक कंपनी ₹1 लाख की पूंजी से शुरू होकर ₹50 करोड़ के रेवेन्यू तक कैसे पहुंचती है? यह भारतीय उद्यमी की कहानी असल में एक ऐसी सफलता की कहानी है जिससे हर उद्यमी कुछ न कुछ सीख सकता है। इस बिजनेस पॉडकास्ट हिंदी एपिसोड — द फाउंडर्स ड्रीम — में होस्ट अभिषेक व्यास ने Almonds.ai के को-फाउंडर्स अपूर्व मोदी और अभिनव जैन से यही सवाल पूछा। जवाब में दोनों ने बिजनेस कैसे बढ़ाएं, इसका एक ऐसा फॉर्मूला शेयर किया जो न फंडिंग पर निर्भर है, न किसी शॉर्टकट पर — बल्कि कस्टमर ट्रस्ट, रिटेलर रिलेशनशिप और सही इंसेंटिव स्ट्रक्चर पर टिका है।
बिजनेस कैसे बढ़ाएं: ट्रस्ट से शुरू होता है हर बड़ा धंधा
अभिनव जैन बताते हैं कि उनका परिवार किसी बड़े बिजनेस बैकग्राउंड से नहीं आता। उनके पिता की आज भी कपड़े की दुकान है और पहले वे ट्रक भी चलाते थे। इसी अनुभव से उन्हें जो सबसे बड़ी सीख मिली, वह ट्रस्ट के बारे में थी।
“चाहे दुकान हो या फैक्ट्री हो या बड़ा धंधा हो। यदि कस्टमर आपके साथ खड़ा हुआ है तो उसको बड़ा बनाने से कोई नहीं रोक सकता।”
2017 में जब दोनों ने ₹1 लाख लगाकर कंपनी शुरू की थी, तब टारगेट रेवेन्यू नहीं बल्कि यह था कि कितने कस्टमर उनके साथ खड़े होंगे। अपूर्व इसे भारत के मार्केट साइज से जोड़कर समझाते हैं:
“यदि हम अपने देश में मिट्टी में भी नमक मिला के बेचेंगे तो वो एक बार टेस्ट करने के लिए खरीद लेगा और सवा सौ करोड़ जनता में से यदि 1% ने ₹10 से भी खरीद लिया तो 100 करोड़ का धंधा बनता है।”
यही वजह है कि वे बार-बार दोहराते हैं — पर्सिस्टेंस पर्सिस्टेंस पर्सिस्टेंस, लगे रहो, अड़े रहो, जब तक तोड़ेंगे नहीं तब तक छोड़ेंगे नहीं। यह सोच उनके फाउंडर की जर्नी की नींव बनी, जहां प्रॉब्लम-सॉल्यूशन फिट मिलने के बाद स्केल अपने आप आया।
रिटेलर काउंटर पर असली फैसला होता है
पॉडकास्ट में अपूर्व एक बेहद सीधा लेकिन ताकतवर उदाहरण देते हैं। दुकान पर कोल्ड ड्रिंक मांगते वक्त ज्यादातर लोग किसी खास ब्रांड का नाम नहीं लेते, बस “भैया एक ठंडा देना” कहते हैं — और रिटेलर वही पकड़ाता है जो उसके मन का होता है या जिसमें उसे ज्यादा मार्जिन मिल रहा होता है। यही पैटर्न इलेक्ट्रिकल, पेंट, मोबाइल एक्सेसरीज जैसी कई कैटेगरी में दोहराता है।
इसी बात को समझाने के लिए अपूर्व एक फील्ड विजिट का किस्सा सुनाते हैं, जहां एक जाना-पहचाना रिटेलर कस्टमर को अपनी पसंद का ब्रांड पकड़ा देता है, भले ही कस्टमर किसी बड़े, भारी-भरकम मार्केटिंग बजट वाले ब्रांड का नाम लेकर आया हो।
“आप सोच रहे हैं एक ब्रांड है जिसने बड़े-बड़े स्टार्स को एंडोर्स करने के लिए करोड़ों रुपए खर्च किए हुए हैं। यहां पर एक छोटा सा रिटेलर का काउंटर है… काउंटर द मोमेंट ऑफ ट्रुथ इज व्हाट आई ओन।”
यही वजह है कि ब्रांड्स के लिए रिटेलर, डीलर, डिस्ट्रीब्यूटर और पेंटर-इलेक्ट्रिशियन जैसे माइक्रो इन्फ्लुएंसर्स का भरोसा जीतना उतना ही जरूरी है जितना कस्टमर का भरोसा जीतना। अपूर्व इसे तीन चीजों से जोड़ते हैं — प्रोडक्ट क्वालिटी, मार्जिन, और आफ्टर-सेल्स सर्विस। अगर इनमें से एक भी कमजोर पड़े, तो रिटेलर दोबारा वह प्रोडक्ट नहीं बेचता, क्योंकि उसके लिए अपनी और अपनी दुकान की इज्जत ब्रांड से बड़ी है।
Almonds.ai: नाम, प्लेटफॉर्म और $1 मिलियन का ऑफर
कंपनी का पहला नाम टेक एलमंड सॉल्यूशंस था, जो 2019 में बदलकर Almonds.ai हो गया। अभिनव बताते हैं कि यह बदलाव इसलिए हुआ क्योंकि उस दौर में टीम को समझ आने लगा था कि डेटा के आधार पर ऑटोमेटेड सिस्टम्स धीरे-धीरे इंटेलिजेंट आउटकम देने लगेंगे — यानी AI सिर्फ एक बज़वर्ड नहीं, बल्कि अगली फाउंडेशनल लेयर है। दिलचस्प बात यह है कि एक अमेरिका बेस्ड कंपनी ने सिर्फ almonds.ai डोमेन खरीदने के लिए $1 मिलियन का ऑफर दिया था, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया।
प्लेटफॉर्म की शुरुआत व्हाइट-लेबल सॉल्यूशन “चैनल वर्स” से हुई, जहां हर ब्रांड अपने नाम से लॉयल्टी ऐप बना सकता था। लेकिन जल्द ही समझ आया कि एक पेंटर या मैकेनिक दस अलग-अलग ब्रांड ऐप डाउनलोड नहीं करेगा। इसी इनसाइट से “काउंटर” नाम का लॉयल्टी मार्केटप्लेस बना, जहां एक ही ऐप पर कई — यहां तक कि आपस में कट्टर कॉम्पिटिटर — ब्रांड्स अपने लॉयल्टी प्रोग्राम चला सकते हैं। अभिनव कहते हैं:
“इट इज़ नॉट अबाउट देयर ब्रांड। इट इज़ अबाउट द कन्वीनियंस टू द लास्ट माइल। यदि वो रिटेलर उस ऐप पर आएगा ही नहीं तो आपके ब्रांड का लोगो कितना भी सुंदर हो, उसे क्या फर्क पड़ रहा है।”
इस प्लेटफॉर्म की भरोसेमंदी का एक सबूत यह भी है कि Almonds.ai को पांच गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड मिले हैं, जिनमें एक इवेंट में 13 लाख लोग एक साथ प्लेटफॉर्म पर मौजूद थे।
इमोशन से बनती है असली लॉयल्टी
एपिसोड का सबसे दिलचस्प हिस्सा वह है जहां अभिनव बताते हैं कि सिर्फ पॉइंट्स और डिस्काउंट से लॉयल्टी नहीं बनती, इमोशन से बनती है। एक ब्रांड ने रिटेलर्स की पत्नियों के लिए “गृह लक्ष्मी” नाम का प्रोग्राम बनाया, जिसमें करीब 500 DIY क्लासेज होस्ट हुईं। 50,000 से ज्यादा महिलाओं ने जॉइन किया और उनमें से 5,000-8,000 को ऑफिशियल ट्रेनर का सर्टिफिकेट भी मिला।
“वो वाइफ जिंदगी भर उस ब्रांड की तारीफें करेगी, याद करेगी और रेकमेंड करेगी कि इस ब्रांड ने मुझे इस चीज का ट्रेनर बना दिया।”
अभिनव इसे पार्ले-जी के उस मशहूर बच्चे के उदाहरण से जोड़ते हैं, जो बिस्किट का नाम लेते ही दिमाग में आ जाता है — यानी इमोशन ही असली ब्रांड वैल्यू बनाता है। इसी सोच पर आधारित है Almonds.ai की टैगलाइन: हैप्पियर चैनल पार्टनर्स, हेल्थियर बॉटम लाइन। यह भी एक वजह है कि भारत का B2B लॉयल्टी मार्केट — ट्रांसक्रिप्ट के मुताबिक करीब ₹28,600 करोड़ का ऑडिटेबल मार्केट — लगातार बढ़ रहा है।
क्या AI सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट को रिप्लेस कर सकता है?
जब अभिषेक व्यास ने पूछा कि क्या आज AI की मदद से यही सॉफ्टवेयर कोई भी कंपनी महीने-दो महीने में बना सकती है, तो अपूर्व का जवाब साफ था — सॉफ्टवेयर बनाना आसान हो गया है, लेकिन असली चुनौती कुछ और है।
“आज सॉफ्टवेयर बनाना इजी है। बट क्या वो सॉफ्टवेयर सही तरीके से काम करेगा फॉर द राइट पीपल? वो फाइंड आउट करना रियल प्रॉब्लम है।”
अपूर्व इसे पॉडकास्ट आइडिया जनरेशन से जोड़ते हैं — AI 15,000 आइडिया दे सकता है, लेकिन कौन सा आइडिया असल में ऑडियंस को पसंद आएगा, यह सिर्फ असली एक्सपीरियंस से पता चलता है। उनके मुताबिक, 1 करोड़ से ज्यादा चैनल पार्टनर्स का जो एक्सपीरियंस Almonds.ai ने इकट्ठा किया है, वह कोई नया AI टूल रातोंरात कॉपी नहीं कर सकता।
लीगेसी ब्रांड्स के लिए बढ़ती चुनौती और ट्रेडर बनाम फाउंडर की सोच
बातचीत में यह भी सामने आया कि नए एंटरप्रेन्योर हर कैटेगरी में उतर रहे हैं — नए पंखे, नए पेंट, नए ब्रांड रोज लॉन्च हो रहे हैं, और इस वजह से पुराने, एस्टैब्लिश्ड ब्रांड्स के लिए मार्केट पहले से ज्यादा मुश्किल होता जा रहा है। इसी संदर्भ में Ratan Tata के हार्वर्ड इंटरव्यू का जिक्र आता है, जहां उन्होंने कहा था कि वे असल में सिर्फ एक बिजनेस में हैं — और वह है प्रॉफिट बनाने का बिजनेस। इसी सोच से जुड़ी बिजनेस से जुड़ी बड़ी सीखों और कोट्स की लिस्ट इस एपिसोड की थीम से मेल खाती है।
अपूर्व इसी बात को ट्रेडर और फाउंडर की सोच में फर्क के जरिए समझाते हैं — ट्रेडर इमीडिएट सेल्स देखता है, फाउंडर अगले 50 साल की लीगेसी। लेकिन दोनों को प्रॉफिट के साथ-साथ ग्रोथ पर बराबर फोकस रखना जरूरी है, क्योंकि भारत जैसे देश में सोशल सिक्योरिटी नहीं है और फंडिंग हमेशा मौजूद नहीं रहती। अभिनव एक दोस्त फाउंडर का किस्सा सुनाते हैं जिसने फंड रेज़ करने के बाद पैसा जलाया और अचानक “फ्यूल आउट” होने की हालत में पहुंच गया — यही वजह है कि वे शुरुआत से प्रॉफिटेबिलिटी पर जोर देने की सलाह देते हैं।
Almonds.ai अब UAE, कतर और जल्द सऊदी अरब में भी विस्तार कर रही है, जहां मॉडर्न ट्रेड सेटअप के लिए उन्होंने “InsightAI” नाम से नया प्रोडक्ट लॉन्च किया है। दुबई को वे अफ्रीका और पूरे ग्लोबल मार्केट के लिए एक गेटवे मानते हैं — इस तरह के ग्लोबल विस्तार में दिलचस्पी रखने वालों के लिए दुबई में बिजनेस शुरू करने से जुड़ी पूरी गाइड भी उपयोगी हो सकती है।
पॉडकास्ट के आखिर में टीम का अगला बड़ा लक्ष्य IPO है — 2027 में कोशिश, सपना 2029 का। लेकिन जिस तरह उन्होंने ₹1 लाख से इस मुकाम तक का सफर तय किया, उसमें सीख यही है कि बिजनेस कैसे बढ़ाएं इसका जवाब बड़े फंडिंग राउंड में नहीं, बल्कि रोज़ के भरोसे में छिपा है — कस्टमर का, रिटेलर का, और चैनल पार्टनर का।
- कस्टमर और चैनल पार्टनर का ट्रस्ट किसी भी बिजनेस का सबसे बड़ा स्केलिंग इंजन है।
- रिटेलर काउंटर असली “moment of truth” है — वहां क्वालिटी, मार्जिन और सर्विस तीनों मायने रखते हैं।
- लॉयल्टी प्रोग्राम में इमोशन जोड़ने से ब्रांड रिकॉल और रेफरल दोनों बढ़ते हैं।
- AI सॉफ्टवेयर बनाना आसान बना सकता है, लेकिन राइट पीपल के लिए राइट सॉल्यूशन ढूंढना अब भी इंसानी अनुभव का काम है।
- शुरुआत से ग्रोथ के साथ प्रॉफिटेबिलिटी पर फोकस रखना, सिर्फ फंडिंग पर निर्भर रहने से ज्यादा सुरक्षित है।
होस्ट अभिषेक व्यास के साथ पूरी बातचीत देखिए द फाउंडर्स ड्रीम यूट्यूब चैनल पर, और हर हफ़्ते नए फाउंडर इंटरव्यू के लिए सब्सक्राइब कीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Almonds.ai किस प्रॉब्लम को सॉल्व करती है?
Almonds.ai ब्रांड्स के लिए चैनल लॉयल्टी और रिवॉर्ड प्लेटफॉर्म है, जो डीलर, डिस्ट्रीब्यूटर, होलसेलर, रिटेलर और पेंटर-इलेक्ट्रिशियन जैसे माइक्रो इन्फ्लुएंसर्स को इंगेज और रिवॉर्ड करने में मदद करता है।
Almonds.ai कंपनी की शुरुआत कब और कैसे हुई?
अपूर्व मोदी और अभिनव जैन ने 2017 में ₹1 लाख की पूंजी से कंपनी शुरू की थी, जिसका पहला नाम टेक एलमंड सॉल्यूशंस था और 2019 से यह Almonds.ai के नाम से जानी जाती है।
क्या AI सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट को पूरी तरह रिप्लेस कर सकता है?
गेस्ट्स के मुताबिक AI से सॉफ्टवेयर बनाना आसान हो गया है, लेकिन यह सॉफ्टवेयर सही तरीके से सही लोगों के लिए काम करे, यह पता करना असली चुनौती है जिसे अनुभव और डेटा के बिना हल नहीं किया जा सकता।
भारत में B2B लॉयल्टी मार्केट कितना बड़ा है?
ट्रांसक्रिप्ट के मुताबिक भारत में ऑडिटेबल B2B लॉयल्टी मार्केट का साइज करीब ₹28,600 करोड़ है, और यह सिर्फ डिजिटली ट्रैक हुआ हिस्सा है।
रिटेलर का ट्रस्ट जीतना ब्रांड के लिए क्यों जरूरी है?
क्योंकि कस्टमर आखिरी फैसला अक्सर काउंटर पर खड़े रिटेलर की सलाह पर लेता है, इसलिए रिटेलर का भरोसा जीतना किसी भी ब्रांड की लॉन्ग टर्म ग्रोथ के लिए जरूरी हो जाता है।


