गांव में रहने वाले 35 साल के आदमी को कैंसर हो जाए तो पहला सवाल यही उठता है — पैसे कहां से आएंगे? डॉ. स्वप्निल माने पिछले 14 साल से इसी सवाल का जवाब ढूंढ रहे हैं। अगर आप पूछें कि Dr. Swapnil Mane कौन हैं, तो इसका जवाब इस Dr. Swapnil Mane इंटरव्यू में साफ मिलता है — द फाउंडर्स ड्रीम पॉडकास्ट पर होस्ट अभिषेक व्यास के साथ हुई बातचीत में उन्होंने बताया कि Sai Dham Foundation की शुरुआत कैसे हुई, और कैसे एक Tata Memorial Hospital के डॉक्टर ने शहर का आरामदायक करियर छोड़कर शिरडी के पास के एक गांव को अपना कार्यक्षेत्र बना लिया।
Sai Dham Foundation की शुरुआत कैसे हुई — बचपन की एक घटना से
डॉ. माने की कहानी 1992 से शुरू होती है, जब वे पांचवी कक्षा में शिरडी के पास सोगांव में पढ़ते थे। उनके पड़ोसी गोडसे काका को लंग कैंसर था, और पुणे के एक कॉर्पोरेट हॉस्पिटल ने इलाज का खर्चा बताया जो परिवार अफोर्ड नहीं कर सका। गोडसे काका की मौत उनकी आंखों के सामने हुई।
तो उसी समय मैंने प्रण लिया कि मैं डॉक्टर बनूंगा गरीबों का। मैं डॉक्टर बनूंगा सबका और अपने देश कार्य के लिए मेरा जीवन समर्पित करूंगा।
यही प्रण उन्हें Tata Memorial Hospital तक ले गया, जहां उन्होंने ट्रेनिंग ली और काम भी किया। लेकिन वहां भी उन्होंने देखा कि गांव से आने वाले कैंसर मरीजों को अस्पताल तक पहुंचने में ही कितनी दिक्कत होती है — लंबी कतारें, महीनों तक फुटपाथ पर रहने की मजबूरी। भारत की करीब 68% आबादी ग्रामीण इलाकों में बसती है, और डॉ. माने को लगा कि इन्हीं इलाकों में इलाज की सुविधा पहुंचानी जरूरी है। इसी सोच से राहुरी गांव में किराए की जगह पर 15 बेड का हॉस्पिटल शुरू हुआ, जिसे आज 14 साल हो चुके हैं।
16,000 मरीज, एक भी रुपया नहीं — फ्री ट्रीटमेंट मॉडल कैसे चलता है
Sai Dham Foundation के रिकॉर्ड के मुताबिक अब तक 16,000 कैंसर मरीजों का पूरी तरह मुफ्त इलाज हो चुका है। यह मॉडल प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना, महाराष्ट्र की महात्मा फुले जीवनदायी योजना, सीएम रिलीफ फंड और पीएम रिलीफ फंड जैसी सरकारी स्कीमों पर टिका है। जो मरीज इन स्कीमों में एलिजिबल नहीं होते, उनके लिए संस्था CSR फंडिंग का सहारा लेती है।
यह ग्रामीण कैंसर इलाज मॉडल अब सिर्फ महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है — 13 राज्यों और पांच देशों में काम कर रही है, और मुख्य फोकस टियर-3, टियर-4 शहरों और गांवों पर है। डॉ. माने बताते हैं कि हर राज्य में सरकारी और चैरिटेबल कैंसर हॉस्पिटल्स से कोलैबोरेशन है, ताकि दूर के मरीज को शिरडी आए बिना भी लोकल ट्रीटमेंट मिल सके। सन फार्मा जैसी कंपनियां खुद संस्था से जुड़ती हैं — संस्था CSR के जरिए 13 राज्यों में 12 वैन चलाती है, जो गांव-गांव जाकर स्क्रीनिंग करती हैं।
युवाओं में कैंसर क्यों बढ़ रहा है
पहले माना जाता था कि कैंसर 40-50 की उम्र के बाद होने वाली बीमारी है। लेकिन डॉ. माने का अनुभव अलग है।
पिछले सात-आठ सालों में ये यंग जनरेशन की बीमारी बन रही है धीरे-धीरे… ये जो जनरेशन मैंने देखा कि स्ट्रेस ज्यादा ले रही है, अबाउट द करियर, अबाउट एजुकेशन।
वे इसकी वजहें गिनाते हैं — जंक फूड में मौजूद पैराबिन्स, एस्ट्रोजन और फ्लैट्स, घंटों मोबाइल स्क्रीन पर बिताना, देर रात सोना और जल्दी न उठना, तंबाकू-सिगरेट और अनियंत्रित अल्कोहल। आजादी के आसपास भारत में मोटापे की दर करीब 15% थी, आज यह बढ़कर 60-65% हो चुकी है। और यह सिर्फ शहरों की समस्या नहीं है — डॉ. माने साफ कहते हैं कि टियर-3, टियर-4 शहरों और गांवों में भी जंक फूड और लाइफस्टाइल की यही समस्या फैल रही है।
गांव में कैंसर स्क्रीनिंग टेस्ट न कराने की वजह — जागरूकता की कमी
भारत में रोजाना 1500 से 1700 लोगों की मौत कैंसर से होती है — रोड एक्सीडेंट के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा कारण है। इसके बावजूद गांव में लोग टेस्ट कराने से बचते हैं।
हमें कुछ तकलीफ नहीं है तो कुछ बीमारी नहीं है, ये बहुत बड़ा मिथ है।
डॉ. माने बताते हैं कि कई गांवों में यह भी धारणा है कि डॉक्टर के पास जाने से ही डायग्नोसिस हो जाएगा और बीमारी की पुष्टि होते ही जिंदगी मुश्किल हो जाएगी, इसलिए लोग टेस्ट से ही कतराते हैं। इसी वजह से संस्था की टीम अब तक 1300 से ज्यादा गांवों में जाकर स्थानीय भाषा में अवेयरनेस सेशन कर चुकी है और करीब 10 लाख लोगों की स्क्रीनिंग कर चुकी है। उनका मानना है कि अगर पूरे देश में पांच साल तक लगातार जन जागृति और स्क्रीनिंग चले, तो नतीजे बड़े बदल सकते हैं।
अगर 5 साल तक अच्छे से स्क्रीनिंग किया जाए, अवेयरनेस किया जाए, जन जागृति की जाए, स्क्रीनिंग करी जाए हर एक पापुलेशन की तो 50 टका कैंसर के प्रमाण जो भारतवर्ष में कम हो जाएगा।
हर परिवार को साल में कराने चाहिए ये टेस्ट
बातचीत में डॉ. माने ने कुछ बुनियादी टेस्ट गिनाए जो हर परिवार साल में एक बार करा सकता है:
- महिलाओं के लिए: CA 125, पैप स्मीयर (सर्वाइकल कैंसर), CA 19-9, CEA और साल में एक सोनोग्राफी
- पुरुषों के लिए: PSA (प्रोस्टेट कैंसर), CA 19-9, ओरल एग्जामिनेशन और अल्ट्रासाउंड
- दोनों के लिए: पेट का टेस्ट, ट्यूमर मार्कर, CBC और फिजिकल एग्जामिनेशन
प्राइवेट में इन टेस्ट का खर्चा साल भर में 4,000-5,000 रुपये तक आता है, लेकिन सरकारी और चैरिटेबल अस्पतालों में यह मुफ्त होता है। डॉ. माने के मुताबिक स्टेज 1 और 2 में डायग्नोसिस होने पर कैंसर पूरी तरह ठीक हो सकता है, जबकि स्टेज 3-4 में सिर्फ कीमोथेरेपी और रेडिएशन से जिंदगी बढ़ाई जा सकती है — इसलिए जल्दी टेस्ट कराना ही सबसे बड़ा फर्क डालता है।
HPV वैक्सीन और सर्वाइकल कैंसर से बचाव
ग्रामीण इलाकों में महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर सबसे कॉमन है, जैसे शहरों में ब्रेस्ट कैंसर। डॉ. माने बताते हैं कि 9 से 15 साल की बच्चियों को HPV वैक्सीनेशन यानी HPV वैक्सीन की दो डोज़ देने से 80-90% तक बचाव संभव है। यह वैक्सीन दुनिया के विकसित देशों में करीब 15 साल से उपलब्ध है, लेकिन भारत में जागरूकता की कमी और सोशल मीडिया पर फैली गलत जानकारी की वजह से लोग हिचकिचाते रहे। संस्था अब तक 5 लाख लोगों को यह वैक्सीन लगा चुकी है। इस मुद्दे पर उनकी एक बात याद रखने लायक है:
ऐसा अमीर को बीमारी नहीं, बीमारी किसी को भी कभी भी जकड़ सकती है।
अवेयरनेस, स्क्रीनिंग, ट्रीटमेंट के आगे — रिसर्च और नया 100 बेड हॉस्पिटल
डॉ. माने का मानना है कि सिर्फ हॉस्पिटल खोलकर इलाज करने से देश से कैंसर नहीं हटाया जा सकता।
कैंसर को ट्रीटमेंट करके उसका इलाज नहीं हो सकता, यह हमारी श्रद्धा है। हमारी मान्यता है कि अवेयरनेस से स्क्रीनिंग, ट्रीटमेंट, रिहैबिलिटेशन और रिसर्च तक — पूरी होलिस्टिक अप्रोच चाहिए।
संस्था का R&D सेंटर दिल्ली के डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी से मान्यता प्राप्त है, और उनके नाम 28 पेटेंट, चार कॉपीराइट और 57 रिसर्च पब्लिकेशन हैं। इसी रिसर्च से कुछ सर्जरी तकनीकें ऐसी विकसित हुई हैं जो एक लाख रुपये की जगह करीब हजार रुपये में हो सकती हैं। अब संस्था शिरडी एयरपोर्ट के पास मिली 22 एकड़ जमीन पर 100 बेड का कैंसर हॉस्पिटल बना रही है, जो पूरे भारत के मरीजों के लिए काम करेगा।
इस तरह की उद्यमशीलता और सेवा भाव से भरी कहानियां उद्यमियों की कहानियाँ सेक्शन में और भी मिलती हैं, जहां अलग-अलग क्षेत्रों के फाउंडर अपने संघर्ष और फैसले साझा करते हैं। जो पाठक अपनी सोच और आदतें बदलकर बड़ा काम करना चाहते हैं, उनके लिए सेल्फ ग्रोथ कैटेगरी में भी काम की चीजें मिलेंगी।
सबसे बड़ी चुनौती — इलाज नहीं, लोगों की सोच
15 साल के काम में डॉ. माने के लिए सबसे मुश्किल चीज पैसे की कमी नहीं, बल्कि लोगों की मानसिकता रही।
टफ लगा लोगों का इग्नोरेंस, टफ लगा लोग घर से बाहर नहीं आना चाहते।
फिर भी उनकी अपनी रिसर्च स्टडी, जो इंडियन कैंसर जर्नल में तीन साल पहले प्रकाशित हुई थी, बताती है कि जिन जिलों में संस्था ने काम किया वहां करीब 50% लोगों की अवेयरनेस में फर्क आया और 70-80% लोगों की स्क्रीनिंग हुई। यही आंकड़ा उनकी सबसे बड़ी उम्मीद है — कि अगर हर जिले में एक डेडिकेटेड कैंसर वैन चले, तो अगले पांच सालों में देश का कैंसर बर्डन आधा किया जा सकता है।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Sai Dham Foundation की शुरुआत कैसे हुई?
डॉ. स्वप्निल माने ने Tata Memorial Hospital में काम करते हुए देखा कि ग्रामीण मरीजों को इलाज के लिए फुटपाथ पर महीनों रुकना पड़ता है, इसी अनुभव से उन्होंने शिरडी के पास राहुरी गांव में एक 15 बेड का हॉस्पिटल शुरू किया जो अब 14 साल से चल रहा है।
Sai Dham Foundation अब तक कितने मरीजों का इलाज कर चुका है?
संस्था के रिकॉर्ड के अनुसार अब तक 16,000 कैंसर मरीजों का पूरी तरह मुफ्त इलाज हो चुका है, जिसमें एक भी खर्चा मरीज को नहीं उठाना पड़ा।
कैंसर का मुफ्त इलाज किन योजनाओं से होता है?
डॉ. माने बताते हैं कि प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना, महाराष्ट्र की महात्मा फुले जीवनदायी योजना, सीएम रिलीफ फंड और पीएम रिलीफ फंड के जरिए ज्यादातर इलाज कवर होता है, बाकी बचे मरीजों को CSR फंडिंग से मदद मिलती है।
युवाओं में कैंसर क्यों बढ़ रहा है?
डॉक्टर के अनुसार करियर और एजुकेशन का स्ट्रेस, जंक फूड में मौजूद पैराबिन्स और एस्ट्रोजन, स्क्रीन एडिक्शन, देर रात सोना और तंबाकू-अल्कोहल जैसे नशे युवा पीढ़ी में कैंसर बढ़ने की बड़ी वजहें हैं।
सर्वाइकल कैंसर से बचाव कैसे हो सकता है?
9 से 15 साल की उम्र की बच्चियों को HPV वैक्सीन की दो डोज़ देने से सर्वाइकल कैंसर से 80-90% तक बचाव संभव है, यह वैक्सीन भारत में करीब 15 साल से उपलब्ध है।


