Sidhant Sehgal on The Founder's Dream podcast

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एस्ट्रोलॉजी पर ज्यादातर बातचीत या तो अंधविश्वास की तरफ झुक जाती है, या पूरी तरह खारिज कर दी जाती है। इस Sidhant Sehgal इंटरव्यू में होस्ट अभिषेक व्यास ने बीच का रास्ता पकड़ा — सीधे सवाल, बिना लाग-लपेट के जवाब। KP एस्ट्रोलॉजर और पॉलिटिकल एनालिस्ट सिद्धांत सहगल ने मांगलिक दोष, कालसर्प योग, जेमस्टोन रेमेडी और 2027 में भारत की राजनीति को लेकर जो कहा, वह ज्यादातर गोदी एस्ट्रोलॉजी चैनलों से अलग है।

Sidhant Sehgal कौन हैं: इंटरव्यू में एस्ट्रोलॉजी की हकीकत

Sidhant Sehgal कौन हैं, यह सवाल उनके करियर से ही साफ हो जाता है — सिद्धांत सहगल 1998 से प्रोफेशनल रूप से एस्ट्रोलॉजी में हैं, पढ़ाई उन्होंने 1986-87 के आसपास शुरू कर दी थी। वे वैदिक एस्ट्रोलॉजी और कृष्णमूर्ति पद्धति (KP) दोनों को एक साथ इस्तेमाल करते हैं, अलग-अलग नहीं। उनका साफ कहना है कि एस्ट्रोलॉजी में कोई थंब रूल नहीं चलता — हर कुंडली देश, काल और पात्र के हिसाब से अलग पढ़ी जाती है।

अगर आप एस्ट्रोलॉजी की बारीकियों में दिलचस्पी रखते हैं, तो सेल्फ-ग्रोथ से जुड़ी बातचीतों की लिस्ट में इस तरह की और इंटरव्यू मिल जाएंगे।

मांगलिक दोष सच है, कालसर्प योग नहीं

सिद्धांत सहगल के मुताबिक कुंडली से जुड़े ज्यादातर डर बिजनेस मॉडल की तरह बेचे जाते हैं। उन्होंने बेबाकी से कहा:

“ये मिलियन डॉलर का बिजनेस है।”

लेकिन इसके बाद वे फर्क साफ करते हैं। मांगलिक दोष को वे मानते हैं क्योंकि मंगल ऊर्जा, क्रोध और झगड़े का कारक है — अगर मंगल लग्न या सप्तम भाव में हो तो वैवाहिक जीवन में तनाव की संभावना बनती है। कालसर्प योग को वे नहीं मानते, क्योंकि उनके मुताबिक किसी भी पराशर शास्त्र या बृहत्पराशर शास्त्र में इसका वर्णन नहीं मिलता। उनका तर्क है कि पुरानी किताबों में राहु-केतु के साथ बाकी ग्रहों की पोजीशन को पाल योग, छत्र योग या नौका योग कहा जाता था — कालसर्प शब्द बाद में गढ़ा गया लगता है।

वे यह भी बताते हैं कि मांगलिक दोष को कभी लग्न से, कभी चंद्र लग्न से, कभी शुक्र से गिनना शुरू कर दिया जाता है, जिससे लगभग हर दूसरे व्यक्ति की कुंडली में यह दोष निकाला जा सकता है — यही बात इसे संदिग्ध बना देती है अगर इस्तेमाल सोच-समझकर न हो।

KP एस्ट्रोलॉजी बनाम वैदिक एस्ट्रोलॉजी: कैलकुलेशन का सिस्टम

वैदिक एस्ट्रोलॉजी में देखा जाता है कि ग्रह किस भाव में बैठा है। KP एस्ट्रोलॉजी में इससे आगे बढ़कर देखा जाता है कि ग्रह किस नक्षत्र में बैठा है, उस नक्षत्र का स्वामी कौन है, और वह स्वामी ग्रह किस भाव का मालिक है। सिद्धांत सहगल इसे पूरी तरह कैलकुलेशन आधारित सिस्टम मानते हैं, स्पिरिचुअल बिलीफ पर नहीं।

एक दिलचस्प तकनीकी बात वे बताते हैं — जुड़वा बच्चों के जन्म समय में भी कुछ मिनट का फर्क होता है, और KP में सब लॉर्ड 3 से 10 मिनट के भीतर बदल जाता है, इसलिए दो सेकंड के फर्क से भी भविष्यफल अलग हो सकता है। यही वजह है कि वे किसी भी एस्ट्रोलॉजर के 100% सटीक होने के दावे को मिसलीडिंग मानते हैं।

जेमस्टोन रेमेडी पर भरोसा, महंगे उपायों पर नहीं

रेमेडीज को लेकर उनका रुख बिल्कुल व्यावहारिक है। वे कहते हैं:

“सर मैं रेमेडीज के तौर पे तो एक्चुअली स्टोंस को बिलीव करता हूं।”

उनकी दलील यह है कि स्टोन का असर यूनिवर्सल है — यह किसी भी धर्म के व्यक्ति को दिया जा सकता है, जबकि मंत्र किसी खास आस्था से बंधा होता है। मंत्र जाप का फायदा वे मानते हैं, लेकिन अलग वजह से — नियमित मंत्र जाप असल में एक तरह का मेडिटेशन है, जिससे व्यक्ति में डिसिप्लिन बढ़ता है और इसी डिसिप्लिन से सफलता की संभावना बढ़ती है, न कि मंत्र से कुंडली की कमी खत्म होती है। उनका एक उदाहरण साफ करता है — जो व्यक्ति रोज 2-3 घंटे पूजा में लगाकर नौकरी नहीं ढूंढ रहा, वह पूजा-पाठ की लाइन में तो सफल हो सकता है, नौकरी की लाइन में नहीं।

इसी तरह की प्रैक्टिकल सोच सेल्फ-ग्रोथ से जुड़े अन्य इंटरव्यू में भी देखने को मिलती है, जहां कर्म और विज्ञान को साथ रखकर बात हुई है।

कर्म, नियति और फ्री विल — भविष्यवाणी फेल क्यों होती है

सिद्धांत सहगल खुद मानते हैं कि वे किसी भी भविष्यवाणी को 100% नहीं बल्कि 90% सक्सेस रेट के साथ करते हैं। वजह साफ है — क्रियामान कर्म, यानी व्यक्ति वर्तमान में क्या कर रहा है, इसका सीधा असर भविष्यफल पर पड़ता है। उनका कहना है:

“कुछ हद तक डेस्टिनी फिक्स है लेकिन वैसी फिक्स नहीं है जैसी कि लोग सोचते हैं।”

उदाहरण के तौर पर वे बताते हैं कि अगर किसी की कुंडली में अच्छा समय आना तय है, लेकिन बीच के सालों में उसके कर्म ठीक नहीं रहे, तो उस अच्छे समय की प्राप्ति भी कम हो जाती है। शादी के योग के बावजूद कई बार व्यक्ति खुद रिश्ता मना कर देता है — यहां भी फ्री विल काम करती है। एस्ट्रोलॉजी में पुनर्जन्म की अवधारणा को भी वे इसी तर्क से जोड़ते हैं — अगर नियति पूरी तरह फिक्स होती, तो पिछले जन्म के कर्मों का कोई मतलब ही नहीं रह जाता।

2027 में भारत की राजनीति: Sidhant Sehgal इंटरव्यू की सबसे चर्चित भविष्यवाणी

राजनीतिक भविष्यवाणियों के मामले में सिद्धांत सहगल का ट्रैक रिकॉर्ड इस बातचीत का सबसे दिलचस्प हिस्सा है। उन्होंने 2020 में ट्रंप की हार और 2024 में उनकी जीत, दोनों तब बताई थीं जब ज्यादातर एस्ट्रोलॉजर उल्टी भविष्यवाणी कर रहे थे। 2024 के लोकसभा चुनाव में जब 95% लोग 400-428 सीटों की बात कर रहे थे, उन्होंने सबसे बड़ी पार्टी के लिए सिर्फ 20-30 सीटें कम होने की बात कही थी — नतीजा करीब-करीब वैसा ही आया।

आगे की भविष्यवाणी को लेकर वे कहते हैं:

“2027 में आने वाले समय के लिए मैं एक बड़े रिवॉल्यूशन की भविष्यवाणी कर रहा हूं।”

उनके मुताबिक पिछले तीन साल से मिड टर्म इलेक्शन के चांस बन रहे हैं और 2027 में यह संभावना सबसे ज्यादा है। वे यह भी साफ करते हैं कि कोई “आउट ऑफ द बॉक्स” व्यक्ति अचानक प्रधानमंत्री बन जाएगा, यह बताना नामुमकिन है — इसके लिए कम से कम 20-50 कुंडलियां चाहिए होंगी, और अगर गठबंधन की सरकार बनती है तो 10 सांसदों वाला नेता भी पीएम बन सकता है, जिसकी भविष्यवाणी ज्योतिष से संभव नहीं।

नेता और बिजनेसमैन एस्ट्रोलॉजर के पास क्यों आते हैं

इस पर उनका जवाब बेहद ईमानदार है — ज्यादातर लोग अपने फैसले को वैलिडेट कराने आते हैं, नेगेटिव सुनना कोई नहीं चाहता। जो एस्ट्रोलॉजर नेगेटिव बोल देता है, वह उस परिवार का पसंदीदा एस्ट्रोलॉजर नहीं रह जाता — यही वजह है कि कई बार किसी नेता के “सीएम बनने” जैसी भविष्यवाणियां सिर्फ रिश्ते बनाए रखने के लिए भी की जाती हैं।

एस्ट्रोलॉजर बनने में समय क्यों लगता है

सिद्धांत सहगल का कहना है कि असली ज्योतिषी बनने के लिए कम से कम 5 साल चाहिए — सिर्फ 27 नक्षत्रों के नाम याद करने में ही 6 महीने से एक साल लग जाता है। वे इसकी तुलना डॉक्टर बनने से करते हैं — जैसे कोई 3 महीने के कोर्स से डॉक्टर नहीं बन सकता, वैसे ही एस्ट्रोलॉजी में शॉर्टकट नहीं चलता। यही वजह है कि उन्होंने 2022-23 से एस्ट्रोलॉजी सिखाना बंद कर दिया — ज्यादातर सीखने आने वाले सिर्फ शादी की तारीख निकालना या नौकरी का समय बताना सीखना चाहते हैं, गहराई में जाना नहीं।

  • मांगलिक दोष वास्तविक योग है, पर गणना का तरीका एक जैसा होना चाहिए
  • कालसर्प योग का शास्त्रों में कोई सीधा आधार नहीं मिलता
  • रेमेडी के तौर पर स्टोन को प्राथमिकता, महंगे अनुष्ठानों को नहीं
  • क्रियामान कर्म भविष्यफल को बदल सकता है, नियति पूरी तरह फिक्स नहीं
  • राजनीतिक भविष्यवाणी के लिए सिर्फ एक कुंडली काफी नहीं, कई कुंडलियां चाहिए

जो पाठक एस्ट्रोलॉजी और प्रैक्टिकल सोच के मेल में दिलचस्पी रखते हैं, उनके लिए एंटरप्रेन्योरियल जर्नी से जुड़े इंटरव्यू भी इसी विषय पर एक और नजरिया देते हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सिद्धांत सहगल कौन हैं?

सिद्धांत सहगल KP एस्ट्रोलॉजर, वैदिक एस्ट्रोलॉजी एक्सपर्ट और पॉलिटिकल एनालिस्ट हैं, जो 1998 से प्रोफेशनल रूप से एस्ट्रोलॉजी की प्रैक्टिस कर रहे हैं और 2014 से अपने यूट्यूब चैनल पर राजनीतिक भविष्यवाणियां भी करते हैं।

मांगलिक दोष और कालसर्प योग में क्या अंतर है?

सिद्धांत सहगल मानते हैं कि मांगलिक दोष मंगल ग्रह की ऊर्जा और क्रोध से जुड़ा वास्तविक योग है, जबकि कालसर्प योग किसी भी पराशर शास्त्र में वर्णित नहीं है, इसलिए वे इसे एक बनाया हुआ कॉन्सेप्ट मानते हैं।

KP एस्ट्रोलॉजी वैदिक एस्ट्रोलॉजी से कैसे अलग है?

वैदिक एस्ट्रोलॉजी में ग्रह किस भाव में बैठा है यह देखा जाता है, जबकि KP एस्ट्रोलॉजी में ग्रह किस नक्षत्र में बैठा है, उस नक्षत्र का स्वामी किस भाव का मालिक है, यह बारीक कैलकुलेशन की जाती है।

क्या जेमस्टोन या रत्न वाकई काम करते हैं?

सिद्धांत सहगल के अनुसार रेमेडी के तौर पर सिर्फ स्टोन को मानते हैं क्योंकि इसका असर यूनिवर्सल है, जबकि मंत्र जाप का फायदा आस्था और डिसिप्लिन बढ़ने से मिलता है, कुंडली की कमी खत्म नहीं होती।

2027 को लेकर सिद्धांत सहगल की भविष्यवाणी क्या है?

वे 2027 में मिड टर्म इलेक्शन के चांस ज्यादा बताते हैं और सत्ता व जनता के बीच संघर्ष बढ़ने के साथ एक बड़े रिवॉल्यूशन की भविष्यवाणी करते हैं, जो सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है।

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About the Host

Abhishek Vyas, creator of The Founder’s Dream, India’s top Hindi business podcast, delivers powerful storytelling and viral conversations with leading founders and creators. His show helps guests share authentic journeys, expand their brands, and connect with millions of engaged listeners.

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