क्या एक गाड़ी बेचना उतना आसान है जितना दिखता है — शोरूम खोलो, सेल्स पर्सन रखो और गाड़ियां बिकने लगेंगी? द फाउंडर्स ड्रीम पॉडकास्ट पर होस्ट अभिषेक व्यास के साथ इस Karan Asrani इंटरव्यू में कृष्णा ग्रुप ऑफ कंपनीज के डायरेक्टर और सीईओ करण असरानी ने इस सवाल का जवाब बड़ी ईमानदारी से दिया। Karan Asrani की सफलता की कहानी सिर्फ गाड़ियां बेचने की नहीं है — यह एक फ्रीडम फाइटर दादा से शुरू होकर सिनेमा, ऑक्टाय, रियलस्टेट और आज BMW जैसी लग्जरी ब्रांड की डीलरशिप तक पहुंचने की तीन पीढ़ियों की यात्रा है।
Karan Asrani की सफलता की कहानी: दादा की विरासत से शुरुआत
करण के दादाजी स्वतंत्रता सेनानी थे और मुंबई में एक डायमंड मर्चेंट के यहां ₹150 महीने की सैलरी पर काम करते थे। एक दिन फिल्म देखते हुए उन्हें गर्मी लगी और उन्होंने फैसला किया कि एक एयर कंडीशन सिनेमा होना चाहिए। पांच-छह पार्टनर्स के साथ मिलकर उन्होंने महाराष्ट्र का — और शायद भारत का — पहला AC थिएटर बनवाया, और बाद में थाने में चार-पांच सिनेमा हॉल खड़े कर दिए।
शिर्डी साईं बाबा के भक्त होने के चलते उन्होंने वहां रहने की दिक्कत देखकर शिर्डी का पहला होटल भी बनवाया। लेकिन दादाजी के जल्दी गुजर जाने के बाद परिवार पर एक बड़ा IT नोटिस आया — उस दौर में 50-60 लाख का। करण बताते हैं कि यह केस उनके पिता ने, जो उस समय लॉ की पढ़ाई कर रहे थे, खुद लड़ा और चार-पांच साल बाद जीता। यहीं से परिवार ऑक्टाय के बिजनेस में आया और फिर गाड़ियों की डीलरशिप में एंट्री हुई, जब एक डीलर ने उनसे कहा कि आप गाड़ियां डिस्प्ले क्यों नहीं करते।
संघर्ष जिसने जिम्मेदारी सिखाई
करण का बचपन शनिवार-रविवार डैड के ऑफिस में बीता, जहां वे कस्टमर इंटरैक्शन देखते और नकली फोन पर बात करने की एक्टिंग करते थे। यह घरेलू अवलोकन ही उनकी असली ट्रेनिंग बनी। उनके परिवार की यह यात्रा उन सभी के लिए एक उदाहरण है जो संघर्ष से सफलता की कहानी तलाशते हैं — यहां भी शुरुआत पैसे से नहीं, मेहनत और धैर्य से हुई।
मुझे एक बिहाइंड द माइंड एक ये था यू नो सेल्फ रियलाइजेशन कि जो भी हुआ है उसके पीछे संघर्ष कितना रहा है फैमिली का।
लग्जरी कार डीलरशिप का छुपा हुआ खर्च
करण साफ कहते हैं कि डीलरशिप बिजनेस दिखने में जितना आसान लगता है, असल में उतना नहीं है। शोरूम की जगह, सेल्स स्टाफ, लॉजिस्टिक्स, ड्राइवर्स की कॉस्ट, डिलीवरी सेरेमनी — यह सब मिलाकर एक बड़ी रकम बन जाती है, खासकर मुंबई जैसे शहर में जहां मैनपावर और रेंट दोनों महंगे हैं।
देयर इज अ कॉस्ट ऑफ लॉजिस्टिक। देयर इज़ अ कॉस्ट ऑफ ड्राइवर्स, देयर इज़ अ कॉस्ट ऑफ डिलीवरी सेरेमनी। तो है खर्चा तो है।
सबसे बड़ा खर्च इन्वेंटरी का होता है — गाड़ी जितने दिन स्टॉक में खड़ी रहती है, कॉस्ट उतनी ही बढ़ती है। करण के मुताबिक कुछ ब्रांड्स में 60-90 दिन स्टॉक रहना आम बात थी, लेकिन अगर 20-30 दिन के भीतर टर्नओवर नहीं हुआ तो यह धीमी मौत जैसा है।
दैट इज अ स्लो डेथ। अगर आपने 30 या 20 दिन के पहले टर्न आउट नहीं किया आपका देन फिर वो आपका खर्चा बढ़ता जाएगा।
यही वजह है कि डीलर कभी-कभी कस्टमर को ऑर्डर देकर महीनों बाद डिलीवरी का वादा करते हैं — हर OEM की प्रोडक्शन कैपेसिटी तय होती है, और अचानक डिमांड बढ़ने पर प्रोडक्शन लाइन बढ़ाने में भी महीनों लग जाते हैं।
EV का भविष्य और इलेक्ट्रिक व्हीकल की असलियत
करण की डीलरशिप में BMW समेत दो OEMs की गाड़ियां बिकती हैं, और वे EV को लेकर साफ नजरिया रखते हैं। अभी ज्यादातर घरों में EV दूसरी कार होती है, पहली नहीं — लेकिन उनका अंदाजा है कि अगले पांच से दस साल में यह बदल जाएगा।
मार्क माय वर्ड आफ्टर फाइव इयर्स फ्रॉम नाउ और मे बी 10 इयर्स अ डेकेड इंडिया में ईवी विल बी द फर्स्ट कार इन एव्री फैमिली।
कस्टमर्स में अभी भी “रेंज एंग्जायटी” है — डर कि गाड़ी बीच रास्ते बंद न हो जाए। करण के अनुभव में ऐसा उनकी डीलरशिप में लगभग कभी नहीं हुआ, हालांकि कुछ चाइनीज कंपनियों की बैटरी से जुड़ी शिकायतें उन्होंने सुनी हैं। EV चार्जिंग स्टेशन के बिजनेस को लेकर भी उनकी सलाह साफ है — सिर्फ जमीन खरीदकर चार्जर लगाना घाटे का सौदा है; चार्जिंग को मॉल, सोसाइटी या सिनेमा जैसी जगहों पर एक “टूल” की तरह इस्तेमाल करना चाहिए, जैसा उन्होंने अपने सिनेमा हॉल्स में Tata पावर के साथ मिलकर किया।
कस्टमर साइकोलॉजी और भरोसे का बिजनेस
करण मानते हैं कि आज का कस्टमर सेल्स पर्सन से ज्यादा जानकार है — मॉडल, वेरिएंट, कलर, प्राइस सब पहले से पता होता है। ऐसे में सेल्स पर्सन का रोल बदलकर “डिसीजन एडवाइजर” जैसा हो गया है। इसी वजह से वे पर्सनल ब्रांडिंग और कस्टमर एक्सपीरियंस को बेहद जरूरी मानते हैं।
यू कांट टेक योर बिज़नेस फॉर ग्रांटेड टुडे।
एक खराब अनुभव का असर सिर्फ उस एक सेल को नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क को प्रभावित करता है — करण बताते हैं कि एक नाराज कस्टमर अपने दोस्तों को भी मना कर देता है। इसीलिए उनकी टीम हर लीड को सिर्फ “लीड” नहीं, बल्कि एक पूरी “कस्टमर जर्नी” मानकर चलती है — घर पर टेस्ट ड्राइव, ट्रांसपेरेंट एस्केलेशन मैट्रिक्स और हर स्टेज पर ईमेल अपडेट। आलोचना को लेकर उनका नजरिया भी दिलचस्प है, जो किसी भी उद्यमी के लिए सीखने लायक है।
जो आपकी बुराई करे वो आपका सबसे अच्छा दोस्त है। यह हम मानते हैं।
नेक्स्ट जनरेशन और लेगसी को संभालना
अकेली संतान होने के नाते करण पर जो दबाव है, वह विरासत से ज्यादा भविष्य को लेकर है — आज के फैसले अगली पीढ़ी को सीधे प्रभावित करेंगे। वे मानते हैं कि आज की “जी” जनरेशन को बहुत ज्यादा कम्फर्ट में बड़ा किया गया, जिससे प्रेशर हैंडल करना मुश्किल लगता है, भले ही वे स्मार्ट हैं और अपना अलग रास्ता चुनना चाहते हैं।
अपने तीन बिजनेस — ऑटोमोबाइल, रियलस्टेट और सिनेमा — में करण का फोकस बराबर बंटा है। ऑटोमोबाइल कैश फ्लो देता है, रियलस्टेट भविष्य सुरक्षित करता है, और सिनेमा दादा की याद के लिए है। वे जानबूझकर महीने के ज्यादातर दिन ऑफिस नहीं जाते, क्योंकि उनका मानना है कि बिजनेस एक व्यक्ति पर नहीं, सिस्टम पर टिका होना चाहिए।
अगर लेगसी आगे बढ़ानी है तो एक मेरे दम पे नहीं चलनी चाहिए, एक ऑर्गेनाइजेशन अपने दम पे चलना चाहिए।
जो भी उद्यमी फैमिली बिजनेस में नई सोच लाना चाहते हैं, उनके लिए यह एपिसोड एक सफलता की प्रेरक कहानी है, जो बताती है कि लेगसी और इनोवेशन एक साथ चल सकते हैं — बशर्ते पुरानी सीख को नजरअंदाज न किया जाए। जो पाठक अपने Krishna Group of Companies की शुरुआत कैसे हुई जैसी असली फाउंडर जर्नीज़ पढ़ना चाहते हैं, उनके लिए यह बातचीत एक अच्छा स्टार्टिंग पॉइंट है।
होस्ट अभिषेक व्यास के साथ पूरी बातचीत देखिए द फाउंडर्स ड्रीम यूट्यूब चैनल पर, और हर हफ़्ते नए फाउंडर इंटरव्यू के लिए सब्सक्राइब कीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
करण असरानी कौन हैं?
करण असरानी कृष्णा ग्रुप ऑफ कंपनीज के डायरेक्टर और सीईओ हैं, जो सेकंड जनरेशन एंटरप्रेन्योर हैं और ऑटोमोबाइल डीलरशिप, सिनेमा और रियलस्टेट का बिजनेस संभालते हैं।
कृष्णा ग्रुप ऑफ कंपनीज की शुरुआत कैसे हुई?
करण के दादाजी फ्रीडम फाइटर थे और बाद में उन्होंने महाराष्ट्र का पहला एयर कंडीशन सिनेमा और शिर्डी का पहला होटल बनाया, जिसके बाद परिवार ऑक्टाय और फिर ऑटोमोबाइल डीलरशिप बिजनेस में आया।
लग्जरी कार डीलरशिप में सबसे बड़ा खर्च क्या होता है?
शोरूम की जगह, सेल्स स्टाफ, लॉजिस्टिक्स, डिलीवरी सेरेमनी और सबसे ज्यादा इन्वेंटरी कॉस्ट यानी गाड़ी को जितने दिन स्टॉक में रखा जाता है, वह सीधा खर्च बढ़ाती है।
क्या भारत में EV का भविष्य अच्छा है?
करण असरानी के मुताबिक अभी EV ज्यादातर परिवार की सेकंड कार होती है, लेकिन अगले पांच से दस साल में यह हर घर की पहली कार बन सकती है।


