Chitra Garg on The Founder's Dream podcast

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134 से ज्यादा किताबें, 600 से ज्यादा आर्टिकल्स और एक ऐसा यूट्यूब चैनल जिसे ब्राज़ील और अर्जेंटीना तक से लोग देखते हैं — यह किसी टेक स्टार्टअप की ग्रोथ स्टोरी नहीं, बल्कि लेखिका चित्रा गर्ग की सफलता की प्रेरक कहानी है। द फाउंडर्स ड्रीम पॉडकास्ट पर होस्ट अभिषेक व्यास के साथ हुई इस Chitra Garg इंटरव्यू में उन्होंने अपनी राइटिंग जर्नी, हिंदी बनाम अंग्रेज़ी की बहस, पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर शंकर दयाल शर्मा से मुलाकात और महिलाओं के करियर बनाम मातृत्व जैसे मुद्दों पर बेबाकी से बात की।

यह एपिसोड किसी बिजनेस फंडिंग या प्रॉडक्ट लॉन्च की कहानी नहीं है, बल्कि एक ऐसी महिला की है जिसने 1974 में बिना किसी प्लानिंग के लिखना शुरू किया और धीरे-धीरे उसे पूरा करियर बना लिया। अगर आप जानना चाहते हैं कि Chitra Garg कौन हैं, तो Chitra Garg की सफलता की कहानी इसी सवाल का जवाब है — एक साधारण शुरुआत से लेकर 134 किताबों तक का सफर।

किताबें आज भी क्यों जरूरी हैं

डिजिटल कंटेंट के दौर में भी चित्रा गर्ग किताबों की अहमियत पर कोई समझौता नहीं करतीं। उनका तर्क सीधा और व्यावहारिक है — डिजिटल स्क्रीन पर पढ़ी हुई चीज़ भूल जाती है, लेकिन किताब में लिखा हुआ शब्द स्थायी रहता है।

बुक की इंपॉर्टेंस कभी भी कम नहीं हो सकती क्योंकि जो लिखा हुआ है आपके पास एक रिकॉर्ड बन गया है। कंप्यूटर में तो आपने कुछ देर देखा फिर वो आपके पास से हट गया।

वे आगे कहती हैं कि किताब पढ़ने का असर मोबाइल पर पढ़ी गई किसी कहानी से कहीं ज्यादा गहरा और टिकाऊ होता है। खुद उनकी एक किताब लिखने में तीन-चार महीने लगते हैं, और फाइनल होने तक वे उसे कम से कम दस बार पढ़ती हैं।

हिंदी में करियर बनाना आसान नहीं, पर रास्ते खुल रहे हैं

चित्रा गर्ग हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों में लिखती हैं, पर मदर टंग होने की वजह से हिंदी में ज्यादा कंफर्टेबल हैं। फिर भी वे मानती हैं कि हिंदी में करियर बनाना आसान नहीं — उनके हिंदी सिखाने वाले यूट्यूब चैनल को 1.5 लाख से ज्यादा सब्सक्राइबर्स और महीने में 45 हज़ार घंटे का व्यूटाइम मिलने के बावजूद गूगल उसे वह वैल्यू नहीं देता जो अंग्रेज़ी कंटेंट को मिलती है।

हिंदी जानने वाले देखते हैं तो Google भी उसको कोई वैल्यू नहीं करता। उसके कोई पैसे नहीं देता, नाम मात्र को मिलते हैं। लेकिन मैं अर्निंग के लिए नहीं कर रही, मैं अपने सेल्फ सेटिस्फेक्शन के लिए कर रही हूं।

इंग्लिश-हिंदी के डबल स्टैंडर्ड पर भी उनकी राय साफ है — इंग्लिश में गलती बोलने पर कोई शर्मिंदगी नहीं महसूस होती क्योंकि वह “फॉरेन लैंग्वेज” मानी जाती है, जबकि हिंदी गलत बोलने पर उसका मज़ाक बन जाता है।

हर आदमी अपने बच्चे को इंग्लिश बुला रहा है, सिखा रहे हैं। तो एक मानसिक गुलामी बन गई है। हम इंग्लिश को ही अच्छा समझ रहे हैं।

दिलचस्प यह है कि उनका लॉजिक टच चैनल शुरुआत में इंग्लिश भी सिखाता था, लेकिन सब्सक्राइबर्स की दिलचस्पी देखकर वह पूरी तरह हिंदी सिखाने का चैनल बन गया। इस चैनल के ज्यादातर सब्सक्राइबर्स 25 से 45 साल की उम्र के हैं, जिनमें हिंदी टीचर्स भी शामिल हैं जो खुद उनसे सीखकर आगे बच्चों को पढ़ाते हैं।

1996 की ताइक्वांडो किताब और राष्ट्रपति से मुलाकात

1996 में जब जूडो-कराटे पर तो किताबें मौजूद थीं, पर ताइक्वांडो के बारे में लोगों को बहुत कम पता था, तब चित्रा गर्ग ने अपने बेटे को ताइक्वांडो सीखते देखकर इस मार्शल आर्ट पर हिंदी में किताब लिखने का फैसला किया। यह हिंदी में लिखी गई ताइक्वांडो पर पहली किताब थी।

किताब छपने के बाद उन्होंने उस समय के राष्ट्रपति डॉक्टर शंकर दयाल शर्मा को खुद यह किताब सौंपने की ठानी — बिना किसी संपर्क, बिना किसी सिफारिश के।

मुझे बहुत जल्दी से एक्सेप्टेंस मिल गई, मुझे पर्सनली मिलने की मिल गई। मैं दो-तीन लोगों को साथ लेकर गई, उनका विमोचन किया और बहुत रिस्पेक्टफुली उस बुक को उन्होंने एक्सेप्ट किया।

यह घटना चित्रा गर्ग के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुई। इसी दौर में उन्होंने दूरदर्शन के लिए भी स्क्रिप्ट लिखना, प्रोग्राम प्रोड्यूस करना और डायरेक्ट करना शुरू किया। जो लोग उद्यमिता और संघर्ष से सफलता की कहानी तलाश रहे हैं, उनके लिए यह हिस्सा दिखाता है कि छोटे कस्बे से दिल्ली तक पहुंचकर, बिना किसी गॉडफादर के, सिर्फ अपने काम पर भरोसे से भी बड़ा मुकाम हासिल किया जा सकता है। ऐसी ही और उद्यमियों की कहानियाँ द फाउंडर्स ड्रीम पॉडकास्ट पर मिलती हैं।

करियर बनाम मातृत्व: महिलाओं के सामने असली सवाल

बातचीत का सबसे संवेदनशील हिस्सा तब आया जब अभिषेक व्यास ने पूछा कि आज की वर्किंग वुमन के सामने सबसे बड़ा सोशल बैरियर क्या है। चित्रा गर्ग ने इसे खुलकर “कंट्रोवर्शियल” मुद्दा बताते हुए अपनी बात रखी।

वर्किंग वुमन जो है वो अपने आप को एस्टैब्लिश करना चाहती हैं, बस, कुछ भी हो जाए। मैंने बहुत सारी लेडीज ऐसी देखी हैं जो बच्चा नहीं कर रही हैं क्योंकि बच्चे के साथ रिस्पांसिबिलिटी आ जाती है और फैमिली लाइफ चेंज हो जाती है।

उनका मानना है कि यह रास्ता गलत है, क्योंकि अगर हर कोई यही सोचे तो समाज और अगली पीढ़ी आगे कैसे बढ़ेगी। साथ ही वे यह भी बताती हैं कि बड़ी-बड़ी सेलिब्रिटीज़ भी अब समझने लगी हैं कि फैमिली लाइफ और बच्चे भी उतने ही ज़रूरी हैं जितना करियर।

खुद चित्रा गर्ग की अपनी ज़िंदगी में यह संतुलन कैसे बना, यह भी दिलचस्प है। उन्हें राजनीति में जाने का शौक था, कॉलेज में इलेक्शन लड़ा और लड़वाया भी, लेकिन शादी के बाद परिवार की ज़िम्मेदारियों के बीच यह सपना पीछे छूट गया।

राजनीति में जाने के लिए टाइम देना पड़ता है और आप परिवार को छोड़कर जाते हैं। जो मेरी फैमिली है वो पूरा टाइम मांगती है, चाहे बच्चे हों चाहे हस्बैंड।

फिर भी उन्होंने लिखना कभी नहीं छोड़ा — भले शादी के शुरुआती सालों में महीने में सिर्फ एक आर्टिकल लिख पातीं, पर पति और ससुराल के सहयोग से यह सिलसिला चलता रहा।

AI इंसान की जगह नहीं ले सकता

टेक्नोलॉजी पर बात करते हुए चित्रा गर्ग ने साफ कहा कि AI मदद का ज़रिया हो सकता है, पर इंसानी सोच का विकल्प नहीं।

AI से आप हेल्प ले सकते हो, लेकिन आप एक्सप्लेन खुद ही करोगे तभी सही एक्सप्लेन होगी। एआई इंसान की रिप्लेसमेंट नहीं कर सकता।

उनकी चिंता यह है कि अगर लोग हर छोटी चीज़ के लिए AI पर निर्भर हो गए, तो इंसान की सोचने-समझने की क्षमता सीमित हो जाएगी। वे खुद AI का इस्तेमाल तभी करती हैं जब किसी सब्जेक्ट पर मैटर नहीं मिल रहा हो, और उस स्थिति में भी सिर्फ आईडिया लेकर खुद लिखती हैं, सीधा कॉपी नहीं करतीं। यह सोच उन सभी के लिए काम की है जो सेल्फ ग्रोथ की दिशा में टेक्नोलॉजी का सही इस्तेमाल सीखना चाहते हैं।

चित्रा गर्ग की सफलता की प्रेरक कहानी से क्या सीखें

  • लिखने की आदत को बरकरार रखें, भले शुरुआत महीने में एक आर्टिकल से हो
  • अपनी मातृभाषा में काम करने से डरें नहीं, वैल्यू धीरे-धीरे बनती है
  • किसी बड़े मौके के लिए इंतज़ार न करें — खुद पहल करके आगे बढ़ें, जैसे राष्ट्रपति तक खुद पहुंचना
  • करियर और परिवार के बीच का फैसला सोच-समझकर लें, सिर्फ दबाव में नहीं
  • टेक्नोलॉजी और AI का इस्तेमाल मदद के लिए करें, निर्भरता के लिए नहीं

चित्रा गर्ग की सफलता की प्रेरक कहानी यही सिखाती है कि लगातार लिखते रहना, अपनी भाषा और पहचान पर भरोसा रखना, और परिवार व करियर के बीच ईमानदार संतुलन खोजना — यही असली उपलब्धि है।

होस्ट अभिषेक व्यास के साथ चित्रा गर्ग की पूरी बातचीत देखिए द फाउंडर्स ड्रीम यूट्यूब चैनल पर, और ऐसी ही प्रेरक कहानियों के लिए इस मोटिवेशनल पॉडकास्ट द फाउंडर्स ड्रीम पॉडकास्ट को सब्सक्राइब कीजिए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

चित्रा गर्ग कौन हैं?

चित्रा गर्ग एक अवार्ड विनिंग लेखिका, राइटर और कंटेंट क्रिएटर हैं जिन्होंने 134 से ज्यादा किताबें और 600 से ज्यादा आर्टिकल्स लिखे हैं और लॉजिक टच नाम से हिंदी सिखाने का यूट्यूब चैनल चलाती हैं।

चित्रा गर्ग ने अपनी पहली किताब कब लिखी थी?

उन्होंने अपना पहला आर्टिकल 1974 में लिखा था और 1995-96 में उनकी पहली किताब, हिंदी में ताइक्वांडो पर, पब्लिश हुई थी।

चित्रा गर्ग की किताब पूर्व राष्ट्रपति तक कैसे पहुंची?

वे खुद राष्ट्रपति भवन गईं, बिना किसी अप्रोच के लेटर लिखकर अपनी ताइक्वांडो किताब सौंपने की रिक्वेस्ट की और डॉक्टर शंकर दयाल शर्मा ने व्यक्तिगत रूप से मिलकर उस किताब का विमोचन किया।

चित्रा गर्ग महिलाओं के करियर और मातृत्व पर क्या सोचती हैं?

वे मानती हैं कि करियर एस्टैब्लिश करने के लिए बच्चा न करने का फैसला गलत है क्योंकि इससे समाज और लेगेसी आगे नहीं बढ़ पाती, हालांकि वे यह भी कहती हैं कि यह निर्णय काफी हद तक फैमिली सपोर्ट पर निर्भर करता है।

चित्रा गर्ग AI के बारे में क्या राय रखती हैं?

उनका कहना है कि AI से मदद ली जा सकती है लेकिन वह इंसान की जगह नहीं ले सकता, और अगर लोग AI पर बहुत ज्यादा निर्भर हो गए तो इंसान की सोचने-समझने की क्षमता कम हो जाएगी।

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About the Host

Abhishek Vyas, creator of The Founder’s Dream, India’s top Hindi business podcast, delivers powerful storytelling and viral conversations with leading founders and creators. His show helps guests share authentic journeys, expand their brands, and connect with millions of engaged listeners.

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