हर साल जब बोर्ड रिजल्ट आता है, लाखों स्टूडेंट्स एक ही सवाल लेकर बैठे होते हैं — आगे क्या? द फाउंडर्स ड्रीम पॉडकास्ट पर होस्ट अभिषेक व्यास ने इसी सवाल को लेकर Results Shiksha के फाउंडर और सीईओ सिद्धार्थ जलन से बातचीत की। इस एपिसोड में यह भी साफ होता है कि Results Shiksha की शुरुआत कैसे हुई और एक साधारण रिजल्ट-चेकिंग वेबसाइट किस तरह नॉर्थ ईस्ट इंडिया जैसे मुश्किल मार्केट्स में यूनिवर्सिटीज और स्टूडेंट्स के बीच भरोसे का पुल बन गई।
यह कहानी सिर्फ एक टेक प्रोडक्ट की नहीं है। यह एक ऐसे उद्यमी की कहानी है जिसने एक रोज़मर्रा की समस्या — “रिजल्ट कहां देखें” — को एक पूरे एजुकेशन इकोसिस्टम में बदल दिया।
Results Shiksha की शुरुआत कैसे हुई?
सिद्धार्थ बताते हैं कि यह आइडिया उनका खुद का नहीं था, बल्कि उनके पिता राजकुमार जलन ने 2005 में एक रियल प्रॉब्लम के तौर पर देखा था। उस समय Digilocker जैसा कोई कॉमन सॉल्यूशन मौजूद नहीं था, और रिजल्ट के दिन स्टूडेंट्स को सही जगह अपना रिजल्ट देखने में परेशानी होती थी।
शुरुआत एक टेक्निकल चैलेंज से हुई — हाई-ट्रैफिक दिनों पर सर्वर को क्रैश होने से बचाना। आज की तारीख में Results Shiksha सालाना करीब 100 मिलियन पेज व्यूज सर्व करता है, और राज्य सरकारों के साथ ऑफिशियल पार्टनरशिप के तहत काम करता है। सिद्धार्थ के शब्दों में:
“हमने ग्रेजुअली अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को इस तरह से बिल्ड करा कि वो स्केल अप कर सके… चाहे वह 4 लाख स्टूडेंट्स का डेटाबेस हो चाहे वो 40 लाख स्टूडेंट्स का डेटाबेस हो, सर्वर्स उन्हें हैंडल कर पाएं।”
यह बुनियाद बनने के बाद ही टीम ने समझा कि असली मौका रिजल्ट के दिन नहीं, बल्कि उसके बाद के 364 दिनों में छिपा है।
हाई वॉल्यूम नहीं, हाई इंटेंट मोमेंट
यहीं से इस बिजनेस की असली सोच शुरू होती है। एक स्टूडेंट जब रिजल्ट चेक करने आता है, वह सिर्फ एक नंबर देखने नहीं आता — वह एक बड़े स्ट्रेसफुल पल से गुजर रहा होता है, और उसके अगले कदम को लेकर उलझन में होता है। सिद्धार्थ इसे साफ शब्दों में बताते हैं:
“हमने इस मोमेंट को एक हाई वॉल्यूम मोमेंट की जगह एक हाई इंटेंट मोमेंट की तरह समझा कि आज जब एक स्टूडेंट रिजल्ट देख रहा है उसके तुरंत बाद वो क्या एक्शन लेगा।”
यही इनसाइट पूरे बिजनेस मॉडल की नींव बनी — रिजल्ट के दिन का ट्रैफिक एक शुरुआत भर है, असली काम उसके बाद करियर, एडमिशन और यूनिवर्सिटी सिलेक्शन में मदद करना है। यह सोच किसी भी नए उद्यमी के लिए एक अच्छा सबक है कि एक छोटे, रोज़मर्रा के मोमेंट में भी बड़ा अवसर छिपा हो सकता है — अगर आप उस मोमेंट के पीछे की भावना को समझें। जो लोग भारत में बिजनेस के अलग-अलग मॉडल समझना चाहते हैं, उनके लिए यह एक अच्छा उदाहरण है कि एक सर्विस प्रोडक्ट कैसे समय के साथ एक पूरे इकोसिस्टम में बदल सकता है।
विजिबिलिटी से आउटकम तक: एजुकेशन मार्केटिंग का बदलाव
सिद्धार्थ के मुताबिक एजुकेशन मार्केटिंग में बदलाव सिर्फ माध्यम का नहीं, माइंडसेट का रहा है। पहले यूनिवर्सिटीज न्यूज़पेपर ऐड्स, होर्डिंग्स और प्रिंट बैनर्स जैसी विजिबिलिटी पर खर्च करती थीं। धीरे-धीरे उन्हें समझ आया कि मापने लायक नतीजे चाहिए।
“इंस्टीट्यूट्स अर्लियर यूज़्ड टू पे फॉर विज़िबिलिटी, नाउ दे एसेंशियली वांट टू पे फॉर आउटकम्स।”
आज की एजुकेशन मार्केटिंग ब्रांडिंग, डेटा और हार्ड कोर काउंसिलिंग का मिश्रण है। टेक्नोलॉजी यहां यह बताने में मदद करती है कि कौन सा कैंपेन किस भौगोलिक क्षेत्र में, किस स्टूडेंट बेस पर और किन कोर्सेज के लिए काम कर रहा है।
ट्रस्ट ही असली USP रहा
जब मार्केट में तीन-चार रिजल्ट एग्रीगेटर मौजूद थे, तो Results Shiksha ने खुद को किसी पेड एडवर्टाइजमेंट से नहीं, बल्कि भरोसे से अलग बनाया। सिद्धार्थ बताते हैं कि रिजल्ट के बाद एकेडमिक काउंसिलिंग, लोन गाइडेंस और बेहतर इंस्टीट्यूट के सुझाव देने से स्टूडेंट्स और पेरेंट्स के बीच वर्ड ऑफ माउथ बना। वे कहते हैं कि कुछ राज्यों में — नॉर्थ ईस्ट, उत्तराखंड, वेस्ट बंगाल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना — आज Results Shiksha की क्रेडिबिलिटी सरकारी वेबसाइट्स से भी ज्यादा मानी जाती है।
नॉर्थ ईस्ट: एक नहीं, सात माइक्रो मार्केट्स
इस बातचीत का सबसे व्यावहारिक हिस्सा नॉर्थ ईस्ट इंडिया को लेकर है। सिद्धार्थ साफ कहते हैं कि हर यूनिवर्सिटी उनसे यही कहती है “हमें नॉर्थ ईस्ट से स्टूडेंट्स चाहिए”, लेकिन ज्यादातर इसे एक सिंगल मार्केट मानने की भूल करती हैं।
“नॉर्थ ईस्ट को एक सिंगल मार्केट समझना ही सबसे बड़ी भूल है… हम उसको एक रीजन की जगह सेवन होमोजेनियस मार्केट्स की तरह, माइक्रो मार्केट्स की तरह देखते हैं।”
उदाहरण के तौर पर, अरुणाचल प्रदेश के स्टूडेंट्स ठंडी जगहों को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि वे बचपन से वैसे मौसम में रहे हैं। नॉर्थ ईस्ट के स्टूडेंट्स का सबसे बड़ा डर घर से दूर जाकर घुलने-मिलने का रहता है, इसलिए लोकेशन से ज्यादा जरूरी है सही कोर्स और सही एनवायरमेंट चुनना। मेडिकल और पैरामेडिकल फील्ड्स की तरफ झुकाव इसलिए ज्यादा रहा है क्योंकि इनकी एंप्लॉयबिलिटी लंबे समय से भरोसेमंद रही है, जबकि एयरनॉटिकल या पेट्रोलियम इंजीनियरिंग जैसे स्पेशलाइज्ड कोर्सेज के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर और डिमांड दोनों चाहिए होती है।
यहां डिजिटल मार्केटिंग अकेले काम नहीं करती। सिद्धार्थ के मुताबिक डिजिटल रीच और लीड फनल बनाता है, लेकिन असली भरोसा वर्ड ऑफ माउथ और लोकल प्रेजेंस से बनता है — जैसे किसी सीनियर का उसी यूनिवर्सिटी में पढ़ना। यही वजह है कि नोएडा हेड ऑफिस और गुवाहाटी ब्रांच के अलावा, कंपनी का नॉर्थ ईस्ट के सातों राज्यों में 100 से ज्यादा पार्टनर नेटवर्क है, ताकि स्टूडेंट और पेरेंट से उनकी अपनी भाषा और कंफर्ट में बात हो सके।
काउंसलिंग, ईमानदारी और ड्रॉपआउट की असली वजह
सिद्धार्थ के मुताबिक गलत कोर्स चुनना ही ज्यादातर ड्रॉपआउट की जड़ है। पीयर प्रेशर, पेरेंट प्रेशर और “मेरा दोस्त भी वहीं जा रहा है” जैसी सोच के चलते करीब 90% स्टूडेंट्स पहले से तय डिसीजन लेकर आते हैं। टीम का काम यह जांचना है कि क्या स्टूडेंट उस कोर्स को एकेडमिकली और इमोशनली झेल पाएगा।
“जस्ट बिकॉज़ कोई कन्वर्शन करना हो या जस्ट बिकॉज़ कोई स्टूडेंट को कन्वर्ट करना हो, उसको गलत डायरेक्शन मत दो।”
सिद्धार्थ यह भी मानते हैं कि “स्कूल तो गवर्नमेंट चाहिए, स्कूल तो प्राइवेट चाहिए, लेकिन यूनिवर्सिटी गवर्नमेंट चाहिए” जैसी पुरानी सोच अब काम नहीं करती — आज कई प्राइवेट यूनिवर्सिटीज उतनी ही अच्छी हैं, और असली सवाल यह है कि स्टूडेंट कहां कंफर्टेबल है और कहां उसका सिलेक्शन संभव है। यही सोच किसी भी फाउंडर कम्युनिटी में भी काम आती है, जहां लोग सही निर्णय के लिए सही जानकारी और सही लोगों से सीखते हैं।
शिक्षामित्र: चुनाव से लेकर लोन और सपोर्ट तक
Results Shiksha का फ्लैगशिप प्रोडक्ट शिक्षामित्र नॉर्थ ईस्ट के हिसाब से कस्टमाइज किया गया है, जिसकी टैगलाइन है — “बिल्ट फॉर द नॉर्थ ईस्ट, वर्क्स एवरीवेयर।” यह विजिबिलिटी से शुरू होकर इंगेजमेंट, काउंसिलिंग और कन्वर्जन तक पूरा फनल कवर करता है, ताकि यूनिवर्सिटीज को खुद फिजिकल ऑफिस या टीम खड़ी न करनी पड़े।
लेकिन सेवा यहीं खत्म नहीं होती। सिद्धार्थ बताते हैं कि एडमिशन फीस भरने के बाद असली जर्नी शुरू होती है — अकोमोडेशन, लोन, और स्टूडेंट किस माहौल में रह रहा है, यह सब उतना ही जरूरी है। टीम तीन-छह-नौ महीने बाद भी स्टूडेंट और पेरेंट्स के संपर्क में रहती है, और जरूरत पड़ने पर समस्या यूनिवर्सिटी मैनेजमेंट तक ले जाती है।
- यूनिवर्सिटी चुनने से पहले प्लेसमेंट रिकॉर्ड्स और पिछले नॉर्थ ईस्ट स्टूडेंट्स का फीडबैक देखा जाता है।
- एक शहर में सिर्फ एक यूनिवर्सिटी से पार्टनरशिप रखी जाती है ताकि कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट न बने।
- अगर स्टूडेंट प्रपोज्ड यूनिवर्सिटी से असहमत हो, तो भी उसे सपोर्ट दिया जाता है।
- लोन, एडमिशन और एकेडमिक काउंसिलिंग एक ही जगह से मिलते हैं।
सिद्धार्थ का मानना है कि प्लेसमेंट तभी मिलता है जब स्टूडेंट का होलिस्टिक डेवलपमेंट हुआ हो, क्योंकि कंपनियों को आज “स्टडीयस बच्चा नहीं, स्किल्ड बच्चा” चाहिए।
सीखने लायक बातें
यह एपिसोड सिर्फ एक एजुकेशन स्टार्टअप की कहानी नहीं है, यह किसी भी भारतीय उद्यमी के लिए एक प्रैक्टिकल गाइड भी है कि एक समस्या को गहराई से समझकर, उसे धीरे-धीरे एक बड़े इकोसिस्टम में कैसे बदला जाता है। स्टार्टअप कैसे शुरू करें, इसका सीधा जवाब सिद्धार्थ की जर्नी में छिपा है — एक रियल प्रॉब्लम पकड़ो, भरोसा बनाओ, और स्केल करते वक्त क्वालिटी मत छोड़ो।
सिद्धार्थ अंत में नॉर्थ ईस्ट के स्टूडेंट्स के बारे में कहते हैं कि यह इलाका भारत की सबसे ज्यादा साक्षरता दर वाले क्षेत्रों में से एक है, और वहां के स्टूडेंट्स आज भी बहुत एंबिशियस हैं — बस उन तक सही जानकारी और सही भरोसा पहुंचने की जरूरत है।
होस्ट अभिषेक व्यास के साथ पूरी बातचीत देखिए द फाउंडर्स ड्रीम यूट्यूब चैनल पर, और हर हफ़्ते नए फाउंडर इंटरव्यू के लिए सब्सक्राइब कीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Results Shiksha क्या करता है?
Results Shiksha पहले एग्जाम रिजल्ट्स दिखाने वाला प्लेटफॉर्म था, जो अब 20 से ज्यादा गवर्नमेंट बोर्ड्स और यूनिवर्सिटीज के साथ मिलकर स्टूडेंट्स को रिजल्ट के बाद करियर काउंसलिंग, एडमिशन और लोन तक की मदद देता है।
Results Shiksha की शुरुआत कैसे हुई?
सिद्धार्थ जलन के पिता राजकुमार जलन ने 2005 में देखा कि रिजल्ट के दिन स्टूडेंट्स को सही जानकारी पाने में दिक्कत होती है, उसी समस्या को हल करने के लिए यह प्लेटफॉर्म शुरू हुआ।
सिद्धार्थ जलन कौन हैं?
सिद्धार्थ जलन Results Shiksha के फाउंडर और सीईओ हैं, जिन्होंने एग्जाम रिजल्ट्स के डिजिटल प्लेटफॉर्म को लाखों स्टूडेंट्स के लिए हायर एजुकेशन के गेटवे में बदला।
शिक्षामित्र प्रोडक्ट क्या है?
शिक्षामित्र Results Shiksha का फ्लैगशिप प्रोडक्ट है जो नॉर्थ ईस्ट के सात राज्यों के हिसाब से कस्टमाइज़ किया गया है और यूनिवर्सिटीज को विजिबिलिटी, इंगेजमेंट, काउंसिलिंग और कन्वर्जन तक का पूरा इकोसिस्टम देता है।
नॉर्थ ईस्ट के स्टूडेंट्स किन फील्ड्स में ज्यादा जाते हैं?
सिद्धार्थ जलन के अनुसार नॉर्थ ईस्ट के स्टूडेंट्स का झुकाव मेडिकल और पैरामेडिकल फील्ड्स की तरफ ज्यादा रहा है, क्योंकि इन कोर्सेज की एंप्लॉयबिलिटी पुराने समय से अच्छी रही है।


