रिपोर्ट नॉर्मल आ जाए तो क्या इसका मतलब है कि आप हेल्दी हैं? इस सवाल से होस्ट अभिषेक व्यास ने द फाउंडर्स ड्रीम पॉडकास्ट के इस एपिसोड की शुरुआत की, और इसी सवाल ने पूरी बातचीत की दिशा तय कर दी। इस Dr. Sarran Dhillon इंटरव्यू में डॉ. सरन ढिल्लों, जो Dr. Sarran’s Homoeopathy Clinic की फाउंडर हैं और 25 साल से ज्यादा का क्लीनिकल अनुभव रखती हैं, बताती हैं कि बीमारी ना होना और सेहतमंद होना दो अलग चीजें हैं। बातचीत बच्चों की इम्युनिटी, मेंटल हेल्थ, महिलाओं की सेहत और होम्योपैथी को लेकर फैले मिथकों तक फैली हुई है।
Dr. Sarran Dhillon इंटरव्यू में होम्योपैथी को लेकर क्या कहा गया
डॉ. सरन शुरुआत में ही साफ करती हैं कि होम्योपैथी करीब 200 साल पुरानी हीलिंग सिस्टम है और इसका मकसद सिर्फ लक्षण दबाना नहीं, बल्कि एक डिजीज-फ्री, हेल्दी लाइफस्टाइल देना है। लेकिन उनके लिए हेल्थ की परिभाषा रिपोर्ट से कहीं आगे है।
वे माइंड, बॉडी और सोल के अलाइनमेंट को असली सेहत बताती हैं — जब सुबह उठने पर ताजगी महसूस हो, खाना ठीक से पच जाए और इमोशंस को आसानी से बैलेंस किया जा सके, तभी इंसान असल में हेल्दी है। इसी वजह से वे बार-बार दोहराती हैं कि पैथोलॉजिकल रिपोर्ट परफेक्ट होने के बावजूद इंसान भीतर से अच्छा महसूस न करे, तो इसका मतलब है कि असली रूट कॉज अभी तक एड्रेस नहीं हुआ है।
मेंटल हेल्थ और शरीर को अलग करके नहीं देखा जा सकता
इस एपिसोड का सबसे सीधा हिस्सा मेंटल हेल्थ पर है। डॉ. सरन के मुताबिक हर फिजिकल कंडीशन असल में मन से शुरू होती है और बाद में शरीर पर पैथोलॉजिकल रूप में सामने आती है।
मेंटल हेल्थ को सर हम फिजिकल हेल्थ से अलग कर ही नहीं सकते।
उनका कहना है कि लॉन्ग क्रॉनिक ग्रीफ, टूटा हुआ रिश्ता या दबी हुई इमोशनल तकलीफ — अगर समय पर एड्रेस न हो, तो यह धीरे-धीरे अस्थमा, माइग्रेन या रूमेटॉइड अर्थराइटिस जैसी ऑटोइम्यून कंडीशंस का रूप ले सकती है। इसीलिए वे हर पेशेंट की केस टेकिंग में उसके रिश्तों, स्ट्रेस और भावनाओं को उतनी ही गंभीरता से सुनती हैं जितनी फिजिकल सिम्टम्स को।
इस विषय पर सेल्फ ग्रोथ से जुड़ी और भी बातचीतें द फाउंडर्स ड्रीम पर उपलब्ध हैं, जहां इमोशनल बैलेंस और डेली डिसिप्लिन पर खुलकर चर्चा की गई है।
एक ही बीमारी, दो मरीज, अलग इलाज
डॉ. सरन एक उदाहरण देती हैं — दो मरीजों को रूमेटॉइड अर्थराइटिस है, डायग्नोसिस बिल्कुल एक जैसा। लेकिन एक मरीज बिस्तर से उठ नहीं पा रही, जबकि दूसरी अपने सारे काम सामान्य तरीके से कर रही है। एक के पीछे शायद पुराना ग्रीफ है, दूसरे के पीछे लंबा क्रॉनिक स्ट्रेस। इसी वजह से दोनों को एक जैसी दवा नहीं दी जा सकती।
- डायग्नोसिस एक होने पर भी हर पेशेंट का अनुभव अलग होता है।
- इलाज से पहले पेशेंट की लाइफस्टाइल, नींद, पाचन और इमोशनल पैटर्न को समझा जाता है।
- सही “सिमिलिमम” रेमेडी ढूंढने के लिए पेशेंट के साथ वक्त बिताना जरूरी है।
यही इंडिविजुअलाइज्ड केस टेकिंग होम्योपैथी के तरीके को बाकी इलाजों से अलग बनाती है — सिर्फ बीमारी का नाम नहीं, बल्कि बीमारी के पीछे का इंसान देखा जाता है।
बच्चों की इम्युनिटी को लेकर पेरेंट्स की सबसे बड़ी गलती
यह हिस्सा पेरेंट्स के लिए सबसे व्यावहारिक है। डॉ. सरन सीधा कहती हैं:
इम्यूनिटी बॉटल में नहीं आती।
उनके मुताबिक आजकल हर चीज बोतल में दी जा रही है — खाना भी, इम्युनिटी बूस्टर भी — जबकि पुरानी पीढ़ी ने हमें यह नहीं सिखाया था। वे मानती हैं कि फूड थोड़ा कॉम्प्रोमाइज्ड जरूर है, लेकिन फिर भी बच्चों को नेचुरल तरीके से हेल्दी खाना दिया जा सकता है।
एक अहम सलाह यह है कि कम से कम 5 साल की उम्र तक बच्चों को, जहां तक संभव हो, केमिकल ड्रग्स और कन्वेंशनल मेडिसिन से दूर रखा जाए ताकि ब्रेन और फिजिकल डेवलपमेंट सही तरीके से हो सके। वे यह भी जोड़ती हैं कि बच्चे जितने दिखते हैं उससे कहीं ज्यादा संवेदनशील होते हैं — प्रेग्नेंट महिला में अगर कुछ गड़बड़ हो तो उसका असर बच्चे पर भी पड़ता है, और 7 साल तक बच्चे की मनस्थिति इतनी टेंडर होती है कि पेरेंट्स को अपने सामने क्या बोला जा रहा है, इसका भी ध्यान रखना चाहिए।
बॉडी खुद इंटेलिजेंट है — सिर्फ सुनना सीखना है
डॉ. सरन शरीर को सिर्फ एक “हार्ड मास” नहीं मानतीं।
बॉडी इटसेल्फ इज वेरी इंटेलिजेंट मशीनरी।
उनका कहना है कि सिरदर्द, बाल झड़ना, जल्दी थकान या पाचन की गड़बड़ी — ये सब शरीर के छोटे “विस्पर” हैं जो समय रहते किसी बड़ी कंडीशन में बदलने से पहले इशारा दे देते हैं। समस्या तब होती है जब लोग इन संकेतों को इग्नोर करके “ग्लोरिफाई” करने लगते हैं — जैसे चार घंटे सोने को मेहनत का बैज बना लेना।
कुछ भी सडनली नहीं होता बॉडी में, ग्रेजुअली होता है, ओवर द इयर्स होता है।
यही वजह है कि डॉ. सरन सिरदर्द के लिए डिस्प्रिन या गैस के लिए इनो जैसे तुरंत राहत देने वाले उपायों पर सवाल उठाती हैं — वे फौरी राहत तो देते हैं, पर यह साफ नहीं होता कि वे शरीर में आगे क्या सेकेंडरी असर छोड़ रहे हैं।
होम्योपैथी बनाम एलोपैथी नहीं, कोलैबोरेशन
इस बातचीत में एक गलतफहमी बार-बार दूर की जाती है — कि होम्योपैथी और एलोपैथी एक-दूसरे की प्रतिस्पर्धी हैं। डॉ. सरन मानती हैं कि एक्सीडेंट, फ्रैक्चर या एनाफिलैक्टिक शॉक जैसी इमरजेंसी में कन्वेंशनल मेडिसिन ही सही समाधान है। लेकिन उसके बाद क्रॉनिक कंडीशन से हमेशा के लिए बाहर निकालने के लिए होम्योपैथी कारगर मानी जाती है।
वे डायबिटीज, थायरॉइड और अस्थमा जैसी स्थितियों का उदाहरण देते हुए कहती हैं कि मकसद मरीज को जिंदगी भर दवा पर निर्भर रखना नहीं, बल्कि सही इंडिविजुअलाइज्ड केस टेकिंग के जरिए उस डिपेंडेंस को धीरे-धीरे खत्म करना है। कैंसर के इलाज में भी वे कीमो या रेडियोथेरेपी के साथ होम्योपैथी को साथ चलाने की बात करती हैं, ताकि थकान, कमजोरी और भूख न लगने जैसे साइड इफेक्ट्स को संभाला जा सके।
डॉ. सरन का अपना व्यक्तिगत अनुभव भी इसी भरोसे की बुनियाद है — बचपन में रूमेटिक हार्ट डिजीज के चलते उन्हें स्टेरॉइड्स पर रखा गया था और कहा गया था कि यह जिंदगी भर चलेगा। माता-पिता ने एक होम्योपैथ से सलाह ली, और उसके बाद उन्हें दोबारा कभी वह दवा नहीं लेनी पड़ी। यही निजी अनुभव आगे चलकर उनके करियर की वजह बना, और इसी तरह की उद्यमियों की कहानियाँ द फाउंडर्स ड्रीम पर नियमित रूप से साझा की जाती हैं।
महिलाओं की सेहत — खुद को आखिरी में रखने की आदत
महिलाओं की सेहत पर डॉ. सरन कहती हैं कि महिला परिवार का “पिलर” होने के साथ-साथ सबसे ज्यादा फिजियोलॉजिकल बदलावों से भी गुजरती है — एडोलेसेंस, प्रेगनेंसी और मेनोपॉज़। इसके बावजूद महिलाएं अक्सर खुद को सेकेंडरी पोजीशन में रख देती हैं — थकान, कमजोरी या दर्द को “बाद में देख लेंगे” कहकर टाल देती हैं। यही आदत आगे चलकर बड़ी समस्याओं की जड़ बनती है।
इस Dr. Sarran Dhillon इंटरव्यू का एक अहम संदेश यही है कि छोटी तकलीफों को वक्त रहते सुनना, चाहे वह शरीर की हो या मन की, सबसे सस्ता और असरदार इलाज है।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Dr. Sarran Dhillon कौन हैं?
डॉ. सरन ढिल्लों एमडी होम्योपैथी हैं और 25 साल से ज्यादा के क्लीनिकल अनुभव के साथ Dr. Sarran’s Homoeopathy Clinic की फाउंडर हैं, जो क्रॉनिक कंडीशंस, महिलाओं की सेहत और मेंटल हेल्थ पर काम करती हैं।
होम्योपैथी में एक ही बीमारी के लिए सबको एक जैसी दवा क्यों नहीं दी जाती?
डॉ. सरन के मुताबिक एक ही डायग्नोसिस वाले दो मरीजों के पीछे के फैक्टर्स जैसे ग्रीफ, क्रॉनिक स्ट्रेस या लाइफस्टाइल अलग हो सकते हैं, इसलिए इंडिविजुअलाइज्ड केस टेकिंग के बाद ही सही दवा तय होती है।
बच्चों की इम्युनिटी को लेकर पेरेंट्स सबसे बड़ी गलती क्या करते हैं?
डॉ. सरन कहती हैं कि लोग इम्युनिटी को बोतल में तलाशते हैं, जबकि असल इम्युनिटी नींद, पोषण और लाइफस्टाइल डिसिप्लिन से बनती है, ना कि किसी सप्लीमेंट से।
क्या होम्योपैथी एलोपैथी की जगह ले सकती है?
नहीं, डॉक्टर सरन इसे प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि सहयोग मानती हैं — इमरजेंसी और सर्जरी जैसी स्थितियों में कन्वेंशनल मेडिसिन जरूरी है, जबकि क्रॉनिक कंडीशंस में होम्योपैथी ड्रग डिपेंडेंस कम करने में मदद करती है।
होम्योपैथी मेंटल हेल्थ में कैसे काम करती है?
डॉक्टर सरन बताती हैं कि बैक फ्लावर रेमेडीज़ और पेशेंट की सिमिलिमम मेडिसिन के कॉम्बिनेशन से डर, ग्रीफ, रिलेशनशिप इश्यूज़ और डिप्रेशन जैसी समस्याओं को बिना साइड इफेक्ट के संभाला जाता है।


