Manish Chaturvedi on The Founder's Dream podcast

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क्या किसी स्टार्टअप की करोड़ों की वैल्यूएशन असल कमाई पर टिकी होती है, या सिर्फ एक अच्छी कहानी पर? द फाउंडर्स ड्रीम, एक लोकप्रिय बिजनेस पॉडकास्ट हिंदी में, के होस्ट अभिषेक व्यास ने यही सवाल सबसे पहले पूछा, और जवाब देने वाले थे Indus Strategy Advisors के फाउंडर एंड सीईओ Manish Chaturvedi — जिनका करीब दो दशकों का अनुभव कैपिटल मार्केट्स में रहा है। पूरी बातचीत में स्टार्टअप वैल्यूएशन की हकीकत, इन्वेस्टर पिच के झूठ, कंप्लायंस की अहमियत और फंडरेजिंग की असली समझ पर खुलकर चर्चा हुई।

स्टार्टअप वैल्यूएशन असल में किस चीज़ पर टिकी होती है

Manish साफ कहते हैं कि वैल्यूएशन सिर्फ कैश फ्लो का हिसाब नहीं है। यह कई चीज़ों का मिश्रण है, जिसमें कंपनी की कहानी यानी नैरेटिव और बिजनेस आइडिया की ताकत का भी बड़ा हिस्सा होता है। डेट इन्वेस्टर का नजरिया अलग होता है — उसे सिर्फ यह देखना है कि पैसा वापस मिलेगा या नहीं, इसलिए वह सीधे कैश फ्लो पर जाता है।

लेकिन इक्विटी इन्वेस्टर का काम ज्यादा पेचीदा है। उनके शब्दों में:

“वैल्यूएशन हम बोलते हैं इट्स अ मिक्स ऑफ़ इट्स अ आर्ट। इट्स नॉट अ साइंस। कैश फ्लो इज़ अ साइंस वाली चीज़ है।”

इस आर्ट को समझने के लिए मैक्रो और माइक्रो दोनों लेवल पर इंडस्ट्री को पढ़ना जरूरी है। उदाहरण के तौर पर उन्होंने एआई सेक्टर का जिक्र किया — अमेरिका जहां हर साल सैकड़ों बिलियन डॉलर एआई में झोंक रहा है, वहां भारत का निवेश उस स्केल से बहुत दूर है। यानी सिर्फ ट्रेंड देखकर नहीं, बल्कि पर कैपिटा इन्वेस्टमेंट, पॉपुलेशन और रिस्क किस तरह बुना गया है, यह समझना ही असली आर्ट है।

इन्वेस्टर पिच का सबसे बड़ा सफेद झूठ — हॉकी स्टिक ग्रोथ

जब पूछा गया कि फाउंडर्स इन्वेस्टर पिच में सबसे ज्यादा कौन सा झूठ बोलते हैं, तो जवाब बिना देर किए आया — हॉकी स्टिक ग्रोथ। मतलब हर साल सीधी बढ़ती हुई रेवेन्यू लाइन दिखाना।

“जब अगर ये बोले कि मेरे फोरकास्ट जो हैं वो तो ईयर ऑन ईयर बढ़ते जाएंगे, बढ़ते जाएंगे। स्ट्रेट लाइन है। तो लाइफ की लाइन भी स्ट्रेट नहीं होती… स्ट्रेट लाइन इज़ डेड।”

उनका कहना है कि फोरकास्ट में अनिश्चितता को शामिल ना करना बेईमानी के बराबर है। एक अच्छा प्रोजेक्शन उतार-चढ़ाव को स्वीकार करता है, सीधी लाइन से इन्वेस्टर को लुभाना नहीं। यह बात हर उस फाउंडर के लिए सीखने लायक है जो अभी यह समझने की कोशिश कर रहा है कि स्टार्टअप कैसे शुरू करें और सोचता है कि बड़े नंबर दिखाना ही काफी है।

कंप्लायंस की अनदेखी स्टार्टअप को कैसे डुबो देती है

स्पीड के पीछे भागते हुए कई स्टार्टअप्स गवर्नमेंट कंप्लायंस को नजरअंदाज कर देते हैं। Manish इसे सबसे बड़ी गलती मानते हैं।

“कंप्लायंस इज दी बैकबोन। पीपल गेट शटर्ड… बिकॉज़ ऑफ़ कंप्लायंसेस इट गॉन बस्ट।”

उन्होंने देश के एक जाने-माने एजुकेशन सेक्टर यूनिकॉर्न का हवाला दिया (नाम लिए बिना) जो कंप्लायंस की चूक की वजह से बुरी तरह गिर गया। उनका सुझाव है कि कंपनी की शुरुआत से ही — चाहे वो LLP हो, वन पर्सन कंपनी हो या प्राइवेट लिमिटेड — हर स्टेज पर एक चीफ कंप्लायंस ऑफिसर या आउटसोर्स्ड सीएफओ सर्विस रखी जाए। टीडीएस, जीएसटी रजिस्ट्रेशन, इंटरनल ऑडिट मैकेनिज्म — ये सब शुरुआत से ही ट्रैक होने चाहिए, बाद में नहीं।

CA होना अच्छा बिजनेसमैन होने की गारंटी नहीं

खुद एक चार्टर्ड अकाउंटेंट होने के बावजूद Manish इस मिथक को तोड़ते हैं कि CA बनना सफल उद्यमी बनने की सीढ़ी है।

“बिजनेसमैन एंड चार्टर्ड अकाउंटेंट कहीं कोई कोरिलेशन नहीं है। चार्टर्ड अकाउंटेंसी आपको एक तरीके का टेक्निकल नॉलेज देती है। और बिजनेस करने के लिए आपको बिजनेस एक्यूमन होना चाहिए।”

उनका तर्क सीधा है — देश में लाखों CA हैं, लेकिन सभी बड़े बिजनेसमैन नहीं बने। टेक्निकल फ्रेमवर्क की समझ अलग चीज़ है, और एंटरप्रेन्योरशिप स्किल बिलकुल अलग।

इक्विटी बनाम डेट: सही मिक्स कैसे तय करें

फाउंडर्स अक्सर उलझते हैं कि इक्विटी लें या डेट। Manish का जवाब है कि यह दोनों हाथ में हाथ डालकर चलते हैं — हर बैलेंस शीट का एक ऑप्टिमल मिक्स होता है। इक्विटी महंगी भी है (क्योंकि प्रॉफिट शेयर करना पड़ता है) और इन्वेस्टर के लिए रिस्की भी, क्योंकि रिकोर्स नहीं है। डेट सस्ता तो है, लेकिन बैलेंस शीट सपोर्ट ना करे तो बैंकरप्सी तक की नौबत आ सकती है।

उन्होंने लॉन्ग टर्म इंफ्रा प्रोजेक्ट्स का उदाहरण दिया जहां 80% डेट और 20% इक्विटी पर काम चलता है, जबकि एआई या आईटी जैसे सेक्टर्स में जहां कैश फ्लो की सर्टेनिटी देर से आती है, वहां पहले इक्विटी या वेंचर डेट मॉडल ही चलता है। सीधी सलाह यह है — जहां रिस्क ज्यादा दिखे वहां इक्विटी फॉलो करो, और जहां कैश फ्लो की विजिबिलिटी बनने लगे वहां धीरे-धीरे डेट की तरफ शिफ्ट करो।

कमजोर कैपिटल स्टोरी को कैसे ठीक करें

अगर बिजनेस परफॉर्म कर रहा है लेकिन कैपिटल स्टोरी कमजोर है, तो Manish पहले यह कहते हैं कि यह एक “गुड प्रॉब्लम” है। असल समाधान है इन्वेस्टर रिलेशनशिप पर काम करना, सही मार्केटिंग-ब्रांडिंग करना, और नंबर्स को साइड में रखकर पहले विज़न पर सहमति बनाना। जहां डिसएग्रीमेंट नैरो होने लगे, वहां सीसीपीएस (कन्वर्टेबल प्रेफरेंस शेयर्स) जैसे इंस्ट्रूमेंट्स माइलस्टोन-बेस्ड अपसाइड-डाउनसाइड तय करने में मदद करते हैं।

इसी बातचीत में इंडिया-यूएई कॉरिडोर का भी जिक्र आया — ट्रेड तो तेज़ी से बढ़ा है, लेकिन मिडिल ईस्ट का कैपिटल अभी भी ज्यादातर बड़ी कंपनियों में जा रहा है, स्टार्टअप इकोसिस्टम में नहीं। उनका मानना है कि यह गैप मिडिल ईस्ट इन्वेस्टर्स के साथ भरोसा और “स्टाइल” समझने से पटेगा। जो लोग ऐसी ही अलग-अलग ग्रोथ स्ट्रैटेजी वाली फाउंडर की जर्नी पढ़ना चाहते हैं, उनके लिए द फाउंडर्स ड्रीम के बाकी एपिसोड भी काफी काम के हैं।

मुश्किल दौर और फाउंडर्स के लिए सलाह

2011 में कंपनी शुरू करने के बाद का सफर आसान नहीं रहा। जब पूछा गया कि सबसे मुश्किल पल कौन सा था, तो जवाब बिजनेस नंबर्स का नहीं, इंसानों का था।

“व्हेन पीपल… मैनेजिंग पीपल इज दी हार्डेस्ट। ह्यूमन कैपिटल इज द हार्डेस्ट थिंग।”

भरोसा करने के बाद भी भरोसा टूटना — यही सबसे भारी पल रहे। लेकिन उनका नजरिया साफ है कि सफलता और असफलता दोनों अस्थायी हैं, बस गिरने के बाद उठते रहना जरूरी है। आखिर में हर नए उद्यमी के लिए उनकी सलाह बेहद सीधी थी:

“फॉलो योर पैशन… मनी इज़ अ बाय प्रोडक्ट ऑफ योर पैशन, योर हार्ड वर्क, योर नॉलेज, योर एक्यूमन।”

उनका खुद का सफर इसी सोच पर टिका है — CA ट्रेनिंग के बाद ऑडिट या टैक्स के नेचुरल रास्ते पर ना जाकर सीधे इन्वेस्टमेंट बैंकिंग में उतर गए, बिना फैमिली बैकिंग के पहली पीढ़ी के उद्यमी बने, और 10 साल के अनुभव के बाद अपना वेंचर शुरू किया।

होस्ट अभिषेक व्यास के साथ पूरी बातचीत देखिए द फाउंडर्स ड्रीम यूट्यूब चैनल पर, और हर हफ़्ते नए फाउंडर इंटरव्यू के लिए सब्सक्राइब कीजिए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

स्टार्टअप वैल्यूएशन में कैश फ्लो का कितना रोल होता है?

Manish Chaturvedi के मुताबिक वैल्यूएशन सिर्फ कैश फ्लो पर नहीं टिकती, उसमें नैरेटिव यानी बिजनेस की कहानी और इंडस्ट्री ट्रेंड समझने की कला भी शामिल होती है, जबकि डेट इन्वेस्टर सिर्फ कैश फ्लो देखता है।

इन्वेस्टर पिच में सबसे बड़ा वाइट लाई क्या होता है?

गेस्ट के अनुसार सबसे बड़ा वाइट लाई हॉकी स्टिक ग्रोथ दिखाना है, जहां फाउंडर हर साल सीधी बढ़ती हुई रेवेन्यू लाइन दिखाते हैं जबकि असल बिजनेस में उतार-चढ़ाव स्वाभाविक होता है।

स्टार्टअप में कंप्लायंस क्यों जरूरी है?

Manish Chaturvedi बताते हैं कि कंप्लायंस कंपनी की शुरुआत से ही जरूरी होती है क्योंकि यह क्रेडिबिलिटी की बुनियाद है और इसकी अनदेखी से बड़ी कंपनियां भी डूब चुकी हैं।

क्या चार्टर्ड अकाउंटेंट होना अच्छा बिजनेसमैन बनाता है?

नहीं, गेस्ट के अनुसार चार्टर्ड अकाउंटेंसी टेक्निकल नॉलेज देती है लेकिन बिजनेस एक्यूमन और एंटरप्रेन्योरशिप स्किल बिलकुल अलग चीज़ है और इसका कोई सीधा संबंध नहीं है।

फाउंडर को इक्विटी लेनी चाहिए या डेट?

Manish Chaturvedi के मुताबिक यह बिजनेस के कैश फ्लो की विजिबिलिटी पर निर्भर करता है, जहां रिस्क ज्यादा हो वहां इक्विटी और जहां कैश फ्लो की सर्टेनिटी दिखे वहां धीरे-धीरे डेट की तरफ जाना चाहिए।

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About the Host

Abhishek Vyas, creator of The Founder’s Dream, India’s top Hindi business podcast, delivers powerful storytelling and viral conversations with leading founders and creators. His show helps guests share authentic journeys, expand their brands, and connect with millions of engaged listeners.

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