Rajnikant Patel on The Founder's Dream podcast

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भारत आज गैलियम के लिए लगभग पूरी तरह चीन पर निर्भर है — दुनिया में जितना भी गैलियम बनता है, उसका बड़ा हिस्सा चीन की चिप इंडस्ट्री के हाथ में है। इस निर्भरता को तोड़ने की कोशिश में लगे एक उद्यमी से होस्ट अभिषेक व्यास ने द फाउंडर्स ड्रीम पॉडकास्ट पर लंबी बातचीत की — यह बिजनेस पॉडकास्ट हिंदी में उद्यमियों की ऐसी ही कहानियाँ लेकर आता है। मेहमान थे रजनीकांत कांतभाई पटेल — एंटरप्रेन्योर और टेक्नोलॉजी इनोवेटर, जो कोयले की राख और इंडस्ट्रियल वेस्ट से गैलियम जैसे क्रिटिकल मिनरल्स निकालने की तकनीक पर काम कर रहे हैं।

यह बातचीत सिर्फ मिनरल्स तक सीमित नहीं रहती। यह एक भारतीय उद्यमी की कहानी है जिसमें फंडिंग की दिक्कतें, सरकारी परमिशन का जाल, और एक उद्यमी की वह जिद भी सामने आती है जो बिना फॉर्मल रिसर्च बैकग्राउंड के सिर्फ पढ़ने के शौक से क्रिटिकल मिनरल्स की दुनिया में उतर गया — यह फाउंडर की जर्नी बताती है कि स्टार्टअप कैसे शुरू करें, इसके लिए डिग्री नहीं बल्कि जिद चाहिए।

गैलियम: जिसके बिना आज कोई चिप नहीं बनती

रजनीकांत बताते हैं कि क्रिटिकल मिनरल्स में भी गैलियम सबसे ऊपर क्यों है। उनके शब्दों में:

गैलियम के सिवाय आज दुनिया में कुछ भी पॉसिबल नहीं है। गैलियम यूज़ होता है कंप्यूटर, 5G, जितना भी चिप बनता है, चिप में गैलियम चाहिए चाहिए और चाहिए।

सेंसर हों या रडार, गैलियम के बिना इनमें से कोई चीज़ काम नहीं करती। यही वजह है कि इसकी वैश्विक मांग बहुत ज्यादा है, लेकिन सप्लाई सीमित हाथों में है। रजनीकांत के मुताबिक अगर दुनिया में 100 किलो गैलियम बनता है तो उसमें से 98% चीन बनाता है — यानी बाकी पूरी दुनिया बमुश्किल 2% पर निर्भर है।

कोयले की राख से निकलता मिनरल — तकनीक कैसे काम करती है

रजनीकांत का सबसे पहला सैंपल कोयले की राख से आया। उन्होंने करीब 57 स्टेप के प्रोसेस से टेस्ट करवाया, जिसमें सबसे ज्यादा सीरियम मिला, उसके बाद गैलियम, सिलेनियम, थैलियम, रोडियम और इंडियम — कुल छह-सात क्रिटिकल मिनरल्स एक ही एनरिच मटेरियल में निकले। बाद में उन्होंने मार्बल-ग्रेनाइट कटिंग के वेस्ट और क्ले माइनिंग के वेस्ट से भी टेस्ट किए।

उनकी खास बात यह है कि पूरी दुनिया एसिड लीचिंग की पुरानी विधि पर चलती है, जिसमें 100 किलो वेस्ट को प्रोसेस करके जितना भी निकलना है निकलता है। रजनीकांत ने एक फिजिकल प्रोसेस डेवलप किया है जिसमें शुरुआत में ही बेकार मटेरियल अलग हो जाता है — अगर उनका काम का हिस्सा 30 किलो है तो सीधा 30 किलो ही आगे प्रोसेस होता है, बाकी 70 किलो पहले ही छंट जाता है। इससे वक्त और लागत दोनों बचते हैं।

एक टन कच्चे मटेरियल से करीब 119 ग्राम गैलियम निकलता है, जो एसिड लीचिंग के बाद शुद्ध होकर करीब 94 ग्राम रह जाता है। यह मात्रा सुनने में छोटी लगती है, लेकिन रजनीकांत के मुताबिक इतने गैलियम से छोटी चिप्स की करीब 2 लाख यूनिट, IoT डिवाइस की करीब 500 यूनिट, और भारी चिप्स (CPU, API स्तर) की 1500 से 2000 यूनिट तक बन सकती हैं।

एक उद्यमी के सामने सरकारी परमिशन की दीवार

तकनीक तैयार होने के बाद भी इसे बड़े स्केल पर ले जाना आसान नहीं रहा। रजनीकांत इसे साफ शब्दों में बताते हैं:

सिंगल विंडो बोलते हैं सर, लेकिन सिंगल विंडो ढूंढने के लिए हमें 1000 विंडो में से गुजरना पड़ेगा, तभी हम कर सकते हैं सर।

सामान इंपोर्ट करने से लेकर प्रोसेस के हर अगले चरण तक, हर जगह अलग परमिशन चाहिए। इसके अलावा एक तकनीकी पेच भी सामने आया — जिस मटेरियल को वे एनरिच कर रहे हैं उसमें करीब 23 ppm यूरेनियम भी मौजूद है। यानी एक टन में से सिर्फ 23 ग्राम यूरेनियम, लेकिन इतनी मात्रा भी मामले को एटॉमिक एनर्जी के दायरे में ले आती है, जिसके लिए अलग नॉर्म लागू होते हैं। उन्होंने संबंधित सरकारी कंपनी से संपर्क किया कि बाकी मिनरल्स वे निकाल लें और यूरेनियम वाला हिस्सा सरकार ले ले, लेकिन अभी तक कोई जवाब नहीं आया।

सरकार ने सेकेंडरी सोर्स से क्रिटिकल मिनरल निकालने वालों के लिए 1500 करोड़ की स्कीम घोषित की है, जिसमें हर इनोवेटर को अधिकतम 20 करोड़ तक मिल सकता है। लेकिन शर्त यह है कि टेक्नोलॉजी तीन तय संस्थाओं में से किसी एक को ट्रांसफर करनी होगी, और पैसा सीधे इनोवेटर को नहीं बल्कि उस संस्था को मिलेगा। इसी वजह से रजनीकांत ने अभी तक यह ग्रांट नहीं ली। उन्होंने अपनी पूंजी से ही धीरे-धीरे 7 से 17 टन प्रति दिन क्षमता वाला सेटअप बनाया है, जिसमें अब तक करीब 20-30 करोड़ रुपये लग चुके हैं, और वे दिसंबर तक प्रोडक्शन शुरू करने की योजना बना रहे हैं।

ग्रीन अमोनिया, ग्रीन हाइड्रोजन और समुद्र से लिथियम

गैलियम के अलावा रजनीकांत की दो और रिसर्च चल रही हैं। ग्रीन अमोनिया वाली तकनीक शिपिंग इंडस्ट्री के लिए है, जहां बड़ी कार्गो कंपनियां दुनिया की सारी गाड़ियों से ज्यादा प्रदूषण अकेले फैलाती हैं। मौजूदा टेक्नोलॉजी में 5 टन क्षमता का प्लांट लगाने के लिए शुरुआती लागत 75 करोड़ रुपये से शुरू होती है। रजनीकांत ने एक नई तकनीक पर पेटेंट फाइल किया है जो डेढ़-दो टन क्षमता का प्लांट करीब 1 करोड़ रुपये में दे सकती है।

ग्रीन हाइड्रोजन में भी उन्होंने काम किया है। मौजूदा तरीके में 200 बार प्रेशर पर गैस बनाई जाती है, जिसमें ब्लास्ट का बड़ा खतरा रहता है। उनकी तकनीक सामान्य वातावरण के प्रेशर पर काम करती है और लागत मौजूदा तरीके की सिर्फ 10% रहती है। इसके अलावा समुद्र के पानी से लिथियम निकालने की तकनीक पर भी वे काम कर रहे हैं, जिसके लिए खास मेम्ब्रेन चाहिए — यह हिस्सा अभी थ्योरी में प्रूवन है, प्रैक्टिकल ट्रायल जारी है। उनका अनुमान है कि इससे भारत में बनने वाली बैटरी की लागत में बड़ी कमी आ सकती है, क्योंकि एक बैटरी में करीब 70% हिस्सा लिथियम का ही होता है।

डिफेंस इनोवेशन, सीमेंट टेक्नोलॉजी और अधूरा सफारी पार्क

रजनीकांत ने रेलवे के लिए एक हाई-कैपेसिटी इंजन तकनीक भी बनाई थी जो मौजूदा 5000 टन की जगह एक साथ 10,000 टन माल खींच सकती है और ईंधन खर्च भी बहुत कम कर देती है। लेकिन भारत में प्राइवेट कंपनी R&D नहीं रख सकती, इसलिए इस प्रोजेक्ट को फिलहाल रोक दिया गया है ताकि बाकी काम प्रभावित न हो।

डिफेंस के लिए उन्होंने “शिवा क्रांति” नाम की एक तकनीक पर थ्योरेटिकल काम पूरा कर प्रोविजनल पेटेंट फाइल किया है, जिसे वे पूरी तरह सार्वजनिक नहीं कर सकते। इसके अलावा उन्होंने ऐसी सीमेंट तकनीक बनाई है जिसमें रेत की जरूरत नहीं पड़ती और जो 1500 डिग्री तापमान झेल सकती है और 5-6 स्केल के भूकंप में भी इमारत को क्रैक होने से बचा सकती है। एक और इनोवेशन “सेफ डॉट” है, जो किसी व्यक्ति की बीमारी को स्कैन कर करीब 99% सटीकता से डिटेक्ट कर सकता है।

इन सबके बीच एक अधूरा सपना भी है — 2009 में उन्होंने गुजरात सरकार से भारत के पहले प्राइवेट सफारी पार्क के लिए मंजूरी मांगी थी, लेकिन 2026 तक भी मंजूरी नहीं मिली। उनकी फाइल जैसा ही एक प्रोजेक्ट बाद में किसी और ने बनवा लिया। रजनीकांत के पास आज भी 270 विंटेज गाड़ियां, करीब 1 लाख कॉइन और 2800 डाक टिकट का संग्रह है, जो उनके उस अधूरे म्यूज़ियम जोन की याद दिलाता है।

भारत के लिए सीख: टैलेंट है, सिस्टम की कमी है

इस पूरी बातचीत का सार रजनीकांत की इस बात में मिलता है:

हमारे देश में टैलेंट की कमी नहीं है, मैं बीकॉम का स्टूडेंट हूं फिर भी इतना सोचा है सर, लेकिन दिक्कत यह आ रही है कि जो भी नया इनोवेशन कर रहे हैं उसके लिए पैसा लगेगा और पैसा सरकार ही दे सकती है।

उनका सुझाव साफ है — सरकार ऊपर से चाहे कितनी भी अच्छी स्कीम लाए, अगर वह जमीनी इनोवेटर तक नहीं पहुंचती तो उसका फायदा नहीं मिलता। एक नया स्कीम सरकार ने रिसर्चर्स के लिए भी लाया है, लेकिन रजनीकांत बताते हैं कि फॉर्म में सिर्फ PhD डिग्री वालों को प्राथमिकता जैसी शर्तें जमीनी इनोवेटर्स को बाहर कर देती हैं।

जो लोग उद्यमिता और फाउंडर्स की ऐसी ही सच्ची सफलता की कहानी पढ़ना चाहते हैं, उनके लिए उद्यमियों की कहानियाँ सेक्शन में कई और इंटरव्यू मौजूद हैं। और जो लोग अपनी सोच व काम करने का तरीका बेहतर बनाना चाहते हैं, उनके लिए सेल्फ ग्रोथ पर भी उपयोगी कंटेंट है।

  • गैलियम कंप्यूटर चिप्स, 5G और डिफेंस रडार के लिए जरूरी है, और इसकी वैश्विक सप्लाई लगभग पूरी तरह चीन के हाथ में है।
  • इंडस्ट्रियल वेस्ट — कोयले की राख, मार्बल कटिंग वेस्ट, क्ले माइनिंग वेस्ट — में गैलियम समेत कई क्रिटिकल मिनरल्स छिपे हैं।
  • सरकारी परमिशन और यूरेनियम जैसे रेगुलेटरी पेच इस तकनीक को स्केल करने में सबसे बड़ी बाधा हैं।
  • ग्रीन अमोनिया, ग्रीन हाइड्रोजन और समुद्री लिथियम पर भी स्वदेशी तकनीक पर काम चल रहा है।

होस्ट अभिषेक व्यास के साथ पूरी बातचीत देखिए द फाउंडर्स ड्रीम यूट्यूब चैनल पर, और हर हफ़्ते नए फाउंडर इंटरव्यू के लिए सब्सक्राइब कीजिए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

रजनीकांत पटेल कौन हैं?

रजनीकांत पटेल एक उद्यमी और टेक्नोलॉजी इनोवेटर हैं जो इंडस्ट्रियल वेस्ट और स्लरी से गैलियम जैसे क्रिटिकल मिनरल्स निकालने की तकनीक पर काम कर रहे हैं, साथ ही वे रियल एस्टेट, फार्मा, केमिकल और डायमंड के बिजनेस भी चलाते हैं।

गैलियम इतना महत्वपूर्ण मिनरल क्यों है?

गैलियम का इस्तेमाल कंप्यूटर चिप्स, 5G टेक्नोलॉजी, सेंसर और डिफेंस रडार में होता है, और इसके बिना आज के दिन चिप्स या सेंसर बनाना मुमकिन नहीं है।

रजनीकांत पटेल किस कचरे से मिनरल्स निकाल रहे हैं?

वे कोयले की राख, मार्बल व ग्रेनाइट काटने से निकलने वाले वेस्ट, और क्ले माइनिंग के वेस्ट से गैलियम सहित कई क्रिटिकल मिनरल्स निकाल रहे हैं।

इस तकनीक को स्केल करने में सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

सबसे बड़ी चुनौती सामान इंपोर्ट करने और प्रोसेस आगे बढ़ाने के लिए सरकारी परमिशन लेना है, साथ ही एनरिच मटेरियल में यूरेनियम की मौजूदगी के कारण एटॉमिक एनर्जी के नॉर्म्स भी लागू हो जाते हैं।

क्या रजनीकांत पटेल को सरकारी मदद मिली है?

भारत सरकार ने सेकेंडरी सोर्स से क्रिटिकल मिनरल निकालने वालों के लिए स्कीम घोषित की है, लेकिन उसमें शर्त यह है कि टेक्नोलॉजी तीन तय संस्थाओं को ट्रांसफर करनी होगी, जिससे उन्होंने अभी तक सीधा फंड नहीं लिया है।

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About the Host

Abhishek Vyas, creator of The Founder’s Dream, India’s top Hindi business podcast, delivers powerful storytelling and viral conversations with leading founders and creators. His show helps guests share authentic journeys, expand their brands, and connect with millions of engaged listeners.

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