Sudhir K Dubey on The Founder's Dream podcast

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झारखंड के एक पहाड़ी गांव में पैदा हुए सुधीर के दुबे 13 साल की उम्र में बिना टिकट, जनरल डिब्बे में बैठकर दिल्ली भाग आए थे। आज वे इंसेंस इंटीरियर एंड एक्सटीरियर प्राइवेट लिमिटेड के फाउंडर हैं और 18 साल से इंटीरियर व कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री में काम कर रहे हैं। द फाउंडर्स ड्रीम पॉडकास्ट पर होस्ट अभिषेक व्यास के साथ हुई इस बातचीत में सुधीर ने अपनी संघर्ष से सफलता की कहानी और अपनी फाउंडर की जर्नी खुलकर बताई — गांव में लकड़ी काटकर गुजारा करने से लेकर AI के दौर में इंटीरियर डिज़ाइन के भविष्य तक।

संघर्ष से सफलता की कहानी: गांव से दिल्ली तक का सफर

सुधीर का कहना है कि उनके गांव में सबसे बड़ी नौकरी सरकारी टीचर की होती थी, बाकी कोई बुनियादी सुविधा तक नहीं थी। 12-13 साल की उम्र तक वे अपने साथियों के साथ जंगल से लकड़ी काटकर बेचते थे ताकि घर का खर्च चल सके।

एक फाउंडर पहले फाउंडर नहीं होता। स्ट्रगलर होता है।

दिल्ली पहुंचते ही उनकी जेब में पड़े पैसे और जूते-जुराबे चोरी हो गए। वे नंगे पांव फरीदाबाद अपने एक रिश्तेदार के पास पहुंचे, जहां से उनकी असली जर्नी शुरू हुई। रास्ते में उन्होंने प्रॉपर्टी डीलिंग, पेंट फैक्ट्री जैसे कई काम आज़माए, लेकिन हर जगह से सीखते हुए आगे बढ़ते रहे। यह सफर हर उस उद्यमी के लिए सीख है जो सोचता है कि कामयाबी बिना गिरे मिल जाती है।

आर्किटेक्ट और इंटीरियर डिज़ाइनर में फर्क क्या है

सुधीर इस इंडस्ट्री के बिजनेस मॉडल को बड़ी साफगोई से समझाते हैं। उनके मुताबिक आर्किटेक्ट का काम सिर्फ स्पेस मैनेज करके नक्शा बनाना है, जिसके बाद स्ट्रक्चर इंजीनियर बिल्डिंग को मजबूत बनाता है। इसके बाद घर को सुंदर और फंक्शनल बनाने का पूरा काम इंटीरियर डिज़ाइनर के हिस्से आता है। आज उनकी कंपनी में लाइसेंस्ड आर्किटेक्ट और स्ट्रक्चर इंजीनियर दोनों काम करते हैं, लेकिन डिज़ाइन का अंतिम कॉल सुधीर खुद लेते हैं क्योंकि उन्होंने यह काम ग्राउंड पर सीखा है। यही वजह है कि वे अपने आप को “ड्रीम होम मेकर” और “ड्रीम ऑफिस मेकर” कहते हैं, जो क्लाइंट के सपने को खुद अपने अंदर उतार लेते हैं।

₹5 लाख के बजट में ड्रीम होम — एक सच्चा किस्सा

एक कपल उनके पास आया था जिन्होंने अपार्टमेंट खरीदने में सारा पैसा लगा दिया था और सिर्फ ₹5 लाख का बजट बचा था। सुधीर ने उन्हें मना नहीं किया, बल्कि फ्री हैंड मांगा।

मैंने सर उन ₹5 लाख में उनको ऐसा घर बना के दिया… मैंने उनको ये भी बोला ₹5 लाख पे बहुत है, आपको और ज्यादा की जरूरत ही नहीं है।

उनका फॉर्मूला सीधा है — कोट हमेशा ₹1000 का भी मिलता है और ₹1 लाख का भी, रंग वही होता है। टेबल भी वे ₹3000 से लेकर ₹3 लाख तक, 25 अलग तरीकों से बना सकते हैं। फर्क सिर्फ मटेरियल और डिटेलिंग का होता है, और सही डिस्ट्रीब्यूशन वही कर सकता है जिसने छोटे-छोटे काम खुद हाथ से करके सीखे हों।

अमीर और मिडिल क्लास ग्राहक में असली फर्क

सुधीर साफ करते हैं कि अमीर और मिडिल क्लास के पास पैसा कम-ज्यादा नहीं, बल्कि सिर्फ वॉल्यूम का फर्क होता है। जो ₹10 करोड़ लेकर आता है उसका काम भी उसी हिसाब से डिस्ट्रीब्यूट होता है, और जो ₹35-40 लाख लेकर आता है उसका भी उसी हिसाब से। असली फर्क ऑटोमेशन जैसी सुविधाओं में दिखता है — वॉइस कमांड से पर्दे खुलना, टाइम सेट करके लाइट्स जलना। बाकी हर घर में पर्दे भी लगेंगे और डाइनिंग भी, बस “रिचनेस” का स्तर अलग होगा।

AI इंटीरियर डिज़ाइन को कितना बदल पाएगा

होस्ट अभिषेक व्यास ने सीधा सवाल पूछा — अगर AI को एक खाली कमरे की फोटो देकर डिज़ाइन मांगा जा सकता है, तो आर्किटेक्ट की जरूरत ही क्या बचती है? सुधीर का जवाब अनुभव पर आधारित था।

अभी तो हमारी इंडस्ट्री में पूरी तरह फेल है एआई, नहीं सही नहीं चल रहा अभी बिल्कुल भी नहीं सही चल रहा।

उन्होंने अपने एक US-बेस्ड क्लाइंट का किस्सा सुनाया, जिसने AI से ड्रॉइंग बनवाने की कोशिश में 15 दिन बर्बाद किए और आखिर में वही पुराना ट्रेडिशनल 3D Max वाला तरीका काम आया। उनका मानना है कि इंसान को इंसान ही कन्विंस करता है — भावनाओं और भरोसे के साथ — और AI अभी सिर्फ फोटो दिखाकर आम आदमी को खुश करने के काम आता है, असली प्रोजेक्ट बनाने में नहीं। यह नजरिया उन सभी डिज़ाइन और आर्किटेक्चर प्रोफेशनल्स के लिए दिलचस्प है जो आर्किटेक्चर में एंटरप्रेन्योर माइंडसेट बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

मासेस के लिए नया बिजनेस आइडिया: टॉक टू आर्क

सुधीर ने बताया कि उनके पास रोज़ ऐसे कॉल्स आते हैं जिनका बजट सिर्फ ₹2-3 लाख होता है, लेकिन अच्छे इंटीरियर डिज़ाइनर ₹10 लाख से कम का टिकट साइज नहीं लेते। इसी गैप को भरने के लिए उन्होंने “टॉक टू आर्क” नाम की नई कंपनी शुरू की है। इसमें एक ऐप के जरिए छोटे शहर का ग्राहक सिर्फ ₹40 प्रति मिनट के वीडियो कॉल पर दिल्ली, पटना या रांची में बैठे डिज़ाइनर से जुड़ता है और 7-8 मिनट में सलाह पा लेता है। इसके बाद हर शहर में मौजूद वेरिफाइड इलेक्ट्रिशियन, प्लंबर और कारपेंटर उस डिज़ाइन को लागू कर देते हैं।

यह आइडिया इस बात का उदाहरण है कि कैसे एक छोटा बिजनेस आइडिया बड़े स्केल की सोच से इंडस्ट्री का गैप भर सकता है। सुधीर इसे 1.5 लाख करोड़ रुपये की उस इंडस्ट्री में पहला मूवर मानते हैं जो अभी तक असंगठित छोटे वर्कर्स के हाथ में थी। अगर आप यह समझना चाहते हैं कि रियल एस्टेट और डिज़ाइन सेक्टर में इस तरह की सोच कैसे बड़ा बिजनेस बना देती है, तो राम कुमार की एंटरप्रेन्योर सक्सेस स्टोरी भी इसी दिशा में एक और उदाहरण है।

साइट सुपरवाइज़र की कमी और आगे की योजना

सुधीर का कहना है कि इंटीरियर और कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री में स्किल्ड साइट सुपरवाइज़र की भारी कमी है — जहां 10 लोगों की जरूरत है, वहां एक भी ठीक से उपलब्ध नहीं मिलता। इसे हल करने के लिए वे एक आईटीआई-टाइप प्राइवेट इंस्टीट्यूट शुरू करने की योजना बना रहे हैं, जहां बिना किसी तामझाम के सच्ची स्किल और सच्ची जॉब दी जाएगी।

उनका बड़ा लक्ष्य अपने गृह जिले पलामू (झारखंड) में एक हॉस्पिटल बनाना भी है, जो नक्सल-प्रभावित इलाकों में गिना जाता है और जहां बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी है। सुधीर की यह सोच बताती है कि कैसे एक उद्यमी अपने मुनाफे को समाज को वापस लौटाने की योजना भी साथ-साथ बनाता है।

इस एपिसोड से सीख

  • ईमानदारी और भरोसा ही लंबे समय में सबसे बड़ा बिजनेस एसेट बनता है।
  • सीमित बजट कोई बहाना नहीं, सही डिस्ट्रीब्यूशन से कम पैसों में भी अच्छा काम हो सकता है।
  • AI अभी टूल है, रिप्लेसमेंट नहीं — खासकर उन इंडस्ट्रीज में जहां भरोसा और डिटेलिंग मायने रखती है।
  • बड़ा मार्केट गैप ढूंढना और उसे किफायती तरीके से सर्व करना ही असली स्टार्टअप कैसे शुरू करें का जवाब है।
  • सफलता के बाद समाज को वापस देने की सोच उद्यमी की असली पहचान बनाती है।

सुधीर के दुबे की यह संघर्ष से सफलता की कहानी सिर्फ इंटीरियर डिज़ाइन इंडस्ट्री के बारे में नहीं है, यह हर उस उद्यमी के लिए सबक है जो सीमित साधनों से शुरुआत कर बड़ा सोचना चाहता है।

होस्ट अभिषेक व्यास के साथ पूरी बातचीत देखिए द फाउंडर्स ड्रीम यूट्यूब चैनल पर, और हर हफ़्ते नए फाउंडर इंटरव्यू के लिए सब्सक्राइब कीजिए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सुधीर के दुबे कौन हैं?

सुधीर के दुबे इंसेंस इंटीरियर एंड एक्सटीरियर प्राइवेट लिमिटेड के फाउंडर हैं और 18 साल से इंटीरियर व कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री में काम कर रहे हैं, वे ट्रांसपेरेंट और वैल्यू-ड्रिवन डिज़ाइन के लिए जाने जाते हैं।

इंटीरियर डिज़ाइनर और आर्किटेक्ट में क्या फर्क है?

सुधीर के मुताबिक आर्किटेक्ट सिर्फ स्पेस मैनेज करके नक्शा बनाता है, स्ट्रक्चर इंजीनियर उसे मजबूत बनाता है, और उसके बाद घर को खूबसूरत बनाने का पूरा काम इंटीरियर डिज़ाइनर का होता है।

क्या ₹5 लाख के बजट में ड्रीम होम बनाना मुमकिन है?

हां, सुधीर ने एक कपल के लिए सिर्फ ₹5 लाख में उनका ड्रीम होम इंटीरियर करके दिखाया, उनका कहना है कि सही डिस्ट्रीब्यूशन और फ्री हैंड मिलने पर कम बजट में भी अच्छा घर बन सकता है।

क्या AI इंटीरियर डिज़ाइनरों की जॉब खत्म कर देगा?

सुधीर के अनुभव में अभी AI टूल्स जैसे चैट जीपीटी सिर्फ फोटो दिखाने तक सीमित हैं और असली प्रोजेक्ट बनाने में अभी भी ग्लिच आते हैं, इसलिए फिलहाल इंसानी एक्सपर्टाइज़ की जरूरत बनी हुई है।

टॉक टू आर्क क्या है?

टॉक टू आर्क सुधीर की नई कंपनी है जो वीडियो कॉल के जरिए छोटे शहरों और कम बजट वाले लोगों को किफायती दाम पर इंटीरियर डिज़ाइन सलाह और वेरिफाइड लोकल वर्कर्स तक पहुंच देती है।

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About the Host

Abhishek Vyas, creator of The Founder’s Dream, India’s top Hindi business podcast, delivers powerful storytelling and viral conversations with leading founders and creators. His show helps guests share authentic journeys, expand their brands, and connect with millions of engaged listeners.

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