Gurmeet Bhatia on The Founder's Dream podcast

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45 की उम्र में रिटायरमेंट अब सिर्फ एक डरावना शब्द नहीं रहा, बल्कि कई कॉर्पोरेट प्रोफेशनल्स की हकीकत बनता जा रहा है। द फाउंडर्स ड्रीम (TFD podcast) के इस एपिसोड में होस्ट अभिषेक व्यास ने करियर कोच गुरमीत भाटिया से इसी मुद्दे पर खुलकर बात की — कि कंपनियां अनुभवी लोगों को क्यों किनारे कर रही हैं, AI इसमें क्या भूमिका निभा रहा है, और टैलेंटेड लोग भी करियर में क्यों अटक जाते हैं।

गुरमीत भाटिया ने टाटा मोटर्स और एक प्राइवेट इंश्योरेंस कंपनी में सीनियर भूमिकाएं निभाई हैं, और रतन टाटा व बी.वी.आर. सुब्बू जैसे लीडर्स के साथ सीधे काम किया है। आज वे एक एग्जीक्यूटिव करियर स्ट्रैटेजिस्ट के तौर पर मिड-करियर प्रोफेशनल्स को बिहेवियरल ट्रांसफॉर्मेशन के ज़रिए करियर दोबारा खड़ा करने में मदद करते हैं।

45 की उम्र में रिटायरमेंट क्यों बन रहा है कॉर्पोरेट हकीकत

गुरमीत भाटिया साफ कहते हैं कि यह कोई साजिश नहीं, बल्कि सीधा बिजनेस गणित है। कंपनियां अब मैनेजमेंट लेयर्स बढ़ाने के बजाय टेक्नोलॉजी लेयर्स पर भरोसा कर रही हैं, क्योंकि साधारण समन्वय (coordination) का काम आज ऑटोमेशन से हो जाता है।

“कंपनियां ऐसा किसी एजेंडे की वजह से नहीं, बल्कि बिजनेस समझ की वजह से कर रही हैं। आज सिंपल कोऑर्डिनेशन का काम टेक्नोलॉजी से हो सकता है।”

वे एक उदाहरण से समझाते हैं — किसी भी कंपनी में अगर 100 कर्मचारी हों, तो करीब 70 फ्रंटलाइन में, 25 मिडिल लेवल में और सिर्फ 5 टॉप पर होते हैं। लेकिन वेतन लागत देखें तो फ्रंटलाइन के 70 लोगों पर 35-40%, मिडिल के सिर्फ 25 लोगों पर भी करीब 40%, और टॉप के 5 लोगों पर 20% खर्च होता है। यानी एक मिड-मैनेजर की लागत एक फ्रंटलाइन कर्मचारी से चार-पांच गुना ज्यादा पड़ती है — इसीलिए जब भी डाउनसाइज़िंग होती है, निशाना सबसे पहले मिड मैनेजमेंट ही बनता है।

AI और ऑटोमेशन का करियर पर असर

अभिषेक व्यास ने जब पूछा कि यह उम्र 45 ही क्यों है, तो गुरमीत भाटिया ने बताया कि ज्यादातर लोग 38-40 की उम्र तक मिड मैनेजमेंट में पहुंचते हैं। अगर इस दौरान टॉप मैनेजमेंट के लिए खुद को तैयार नहीं किया गया, तो 45 तक वही भूमिका “रिडंडेंट” लगने लगती है, क्योंकि जो कम्युनिकेशन विंडो वे टॉप और फ्रंटलाइन के बीच निभाते थे, अब वह ऑटोमेशन से पूरी हो जाती है।

यही वजह है कि सिर्फ कंपनी के प्रति वफादारी अब काफी नहीं — अपनी स्किल्स और अनुकूलन क्षमता (adaptability) को लगातार अपडेट रखना ज़रूरी है। इस विषय पर 2026 में कौन-सी स्किल्स सफल बिज़नेस लीडर्स सीख रहे हैं, इस पर भी TFD का एक अलग एपिसोड है जो इसी बदलाव को आगे बढ़ाता है।

रतन टाटा और बी.वी.आर. सुब्बू से मिली सीख

गुरमीत भाटिया ने टाटा मोटर्स में इंडिका कार प्रोजेक्ट पर रतन टाटा के साथ सीधे काम किया। उन्होंने बताया कि रतन टाटा किसी फैसले को कभी सही या गलत नहीं कहते थे, बल्कि यह पूछते थे कि फैसला किन मान्यताओं पर आधारित है।

“वे यह नहीं कहते थे कि यह फैसला सही है या गलत। वे पूछते थे कि आपने यह फैसला किन मान्यताओं के आधार पर लिया है, और क्या आपने उन मान्यताओं को परखा है।”

इस तरीके से फैसला लेने वाला व्यक्ति खुद उसकी ज़िम्मेदारी उठाता था, न कि सिर्फ ऊपर से मिले निर्देश का पालन करता था। बाद में गुरमीत भाटिया ऑटोमोबाइल से इंश्योरेंस इंडस्ट्री में गए और फिर उद्यमी बनकर करियर कोचिंग में उतरे — उनका मानना है कि किसी भी इंडस्ट्री में बुनियादी सिद्धांत नहीं बदलते, सिर्फ चुनौतियां बदलती हैं।

टैलेंटेड लोग करियर में क्यों अटक जाते हैं

गुरमीत भाटिया का एक दिलचस्प अवलोकन यह है कि ज्यादा बुद्धिमान लोग अक्सर सामान्य लोगों से ज्यादा करियर में अटक जाते हैं।

“मैंने देखा है कि ज्यादा इंटेलिजेंट लोग ज्यादा अटक जाते हैं, क्योंकि वे अपनी ज़िंदगी में जो हो रहा है उसे तर्कसंगत ठहराने में बहुत माहिर होते हैं, और इसी वजह से बदलाव के प्रति उनका प्रतिरोध बढ़ जाता है।”

वे शाहरुख खान का उदाहरण देते हैं — एक सफल हीरो होने के बावजूद उन्होंने उसी भूमिका में टिके रहने के बजाय खुद को बार-बार नया रूप दिया, चाहे वह टीवी हो या OTT प्लेटफॉर्म। गुरमीत भाटिया कहते हैं कि यही सिद्धांत प्रोफेशनल्स पर भी लागू होता है — अगर आप सिर्फ “चीफ टेक्निकल ऑफिसर” की भूमिका में ही टिके रहते हैं, तो कल कोई और बेहतर कॉम्पिटेंस वाला व्यक्ति आपका बॉस बन सकता है।

छंटनी का असली असर: आर्थिक से ज्यादा भावनात्मक

अभिषेक व्यास ने पूछा कि अगर किसी 42 साल के प्रोफेशनल को अचानक इस्तीफा देने को कहा जाए, तो उसके परिवार और आत्म-सम्मान पर क्या असर पड़ता है। गुरमीत भाटिया का जवाब था:

“बहुत से लोग सोचते हैं कि छंटनी का मतलब सिर्फ आर्थिक नुकसान है। असल में आर्थिक असर से कहीं ज्यादा भावनात्मक असर मायने रखता है, क्योंकि जिस व्यक्ति की नौकरी जाती है, उसकी पहचान हिल जाती है और वह अपनी स्किल्स व क्षमताओं पर ही सवाल उठाने लगता है।”

उनके मुताबिक ऐसे समय में सबसे ज़रूरी है खुद पर भरोसा बनाए रखना और रीऑर्गनाइज़ेशन को अपने ऊपर एक निजी निर्णय की तरह न लेकर, एक “कोर्स करेक्शन” की तरह देखना। यही वजह है कि करियर कोचिंग की ज़रूरत पड़ती है — क्योंकि दोस्त, जीवनसाथी या पुराने बॉस के साथ यह बात खुलकर करना अक्सर मुश्किल होता है।

बिहेवियरल ट्रांसफॉर्मेशन: सिर्फ मोटिवेशन काफी नहीं

गुरमीत भाटिया मानते हैं कि फैंसी मोटिवेशनल ट्रेनिंग प्रोग्राम अक्सर काम नहीं करते, क्योंकि सोमवार को ऑफिस लौटते ही पुराना व्यवहार वापस आ जाता है।

“बिना बिहेवियरल ट्रांसफॉर्मेशन के मोटिवेशन एक महंगा मनोरंजन है।”

उनके अनुसार दिमाग हमेशा जानी-पहचानी चीज़ों को तरजीह देता है — यानी अनजानी ग्रोथ से ज्यादा पुराना, जाना-पहचाना दर्द भी उसे ज़्यादा सहज लगता है। न्यूरोसाइंस के मुताबिक अगर किसी पैटर्न को लगातार 60 दिन से ज्यादा दोहराया जाए, तो दिमाग के न्यूरल पैटर्न दोबारा बनने लगते हैं, और 90वें दिन तक नया व्यवहार ठोस रूप लेने लगता है। इसी आधार पर गुरमीत भाटिया अपना 90-दिन का वन-टू-वन ट्रांसफॉर्मेशन प्रोग्राम चलाते हैं, जिसमें जागरूकता, नर्वस रेगुलेशन, पहचान का पुनर्निर्माण, व्यवहार की रीवायरिंग और आखिर में नई पहचान का विस्तार — ये पांच चरण शामिल होते हैं।

मिड-करियर स्थगन से बाहर निकलने का रास्ता

अभिषेक व्यास के सवाल पर कि क्या वीकेंड कोर्स या कंपनी छोड़कर नई शुरुआत करना बेहतर है, गुरमीत भाटिया का जवाब स्पष्ट था — ड्रामेटिक कदम उठाने की ज़रूरत नहीं, बल्कि अंदर से छोटे-छोटे, लगातार कदम उठाने चाहिए। उनके मुताबिक रणनीतिक सोच दोबारा बनाने के तीन कदम हैं:

  • जटिल समस्याओं को सरल बनाने की आदत डालना
  • सिर्फ अपने काम तक सीमित न रहकर, बड़े बिज़नेस फैसलों में शामिल होना और अपनी राय इंडस्ट्री में भी रखना
  • हर काम से संगठन के लिए असली वैल्यू बनाना, ताकि आप इनविज़िबिलिटी से स्ट्रैटेजिक विज़िबिलिटी की ओर बढ़ें

वे यह भी कहते हैं कि करियर में एक प्रमोशन समय से पहले मिल जाना, लंबे समय में वेल्थ क्रिएशन पर कंपाउंडिंग असर डालता है — इसलिए करियर से जुड़े फैसलों को टालना महंगा पड़ सकता है। पॉडकास्ट और मीडिया के ज़रिए इस तरह की बातचीत आज कितना असर डाल रही है, इस पर TFD का एक और एपिसोड पॉडकास्ट्स पारंपरिक मीडिया को कैसे प्रभावित कर रहे हैं भी देखने लायक है।

गुरमीत भाटिया की सलाह आखिर में एक ही लाइन में सिमटती है — करियर में संकट आने का इंतज़ार मत करिए, प्रोएक्टिव होकर गाइडेंस लीजिए। जब तक आप खुद को नहीं बदलते, तब तक आप अटके ही रहेंगे।

होस्ट अभिषेक व्यास के साथ पूरी बातचीत देखिए द फाउंडर्स ड्रीम यूट्यूब चैनल पर, और हर हफ़्ते नए फाउंडर इंटरव्यू के लिए सब्सक्राइब कीजिए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

45 की उम्र में रिटायरमेंट क्यों बढ़ रहा है?

गुरमीत भाटिया के अनुसार कंपनियां अब मैनेजमेंट लेयर्स के बजाय टेक्नोलॉजी लेयर्स के ज़रिए विस्तार कर रही हैं, जिससे मिड मैनेजमेंट का साधारण समन्वय वाला काम ऑटोमेशन से हो जाता है और 40-45 की उम्र तक ऊपर न बढ़ पाने वाले लोग अतिरिक्त (redundant) लगने लगते हैं।

कंपनियां छंटनी में सबसे पहले किसे निशाना बनाती हैं?

गुरमीत भाटिया बताते हैं कि मिड मैनेजमेंट कर्मचारी, जो संख्या में कम होते हुए भी वेतन लागत का बड़ा हिस्सा खाते हैं, छंटनी में सबसे पहले प्रभावित होते हैं क्योंकि कंपनियां पेरोल कॉस्ट कम करना चाहती हैं।

करियर कोचिंग और मोटिवेशनल ट्रेनिंग में क्या फर्क है?

गुरमीत भाटिया के अनुसार मोटिवेशन बिना बिहेवियरल ट्रांसफॉर्मेशन के सिर्फ अस्थायी जोश देता है, जबकि करियर कोचिंग दिमाग के पुराने पैटर्न को दोबारा प्रोग्राम कर टिकाऊ बदलाव लाने पर काम करती है।

बिहेवियरल ट्रांसफॉर्मेशन में कितना समय लगता है?

गुरमीत भाटिया के मुताबिक लगातार 60 दिन से ज्यादा किसी पैटर्न को दोहराने पर दिमाग के न्यूरल पैटर्न दोबारा बनने लगते हैं, और 90वें दिन तक नए व्यवहार ठोस रूप लेने लगते हैं।

छंटनी का सबसे बड़ा असर क्या होता है?

गुरमीत भाटिया कहते हैं कि छंटनी का आर्थिक असर तो होता ही है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा असर भावनात्मक होता है क्योंकि व्यक्ति की पहचान और आत्म-सम्मान पर सवाल खड़े हो जाते हैं।

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About the Host

Abhishek Vyas, creator of The Founder’s Dream, India’s top Hindi business podcast, delivers powerful storytelling and viral conversations with leading founders and creators. His show helps guests share authentic journeys, expand their brands, and connect with millions of engaged listeners.

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